थम नहीं रहा कोरोना का कहर

हमें विश्वास है कि हम कोरोना के कहर से मुक्त होंगे और यह जंग जीत जाएंगे. लेकिन जो जमीनी सच्चाई है वह विचलित करने वाली है.  अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया जब कहते हैं कि “भारत में कोरोना संक्रमण का उच्चतम स्तर जून-जुलाई में हो सकती है.” तो उम्मीदें टूटने लगती है.

| संतोष कुमार

गंभीर समाचार 04 Jun 2020

हमें विश्वास है कि हम कोरोना के कहर से मुक्त होंगे और यह जंग जीत जाएंगे. लेकिन जो जमीनी सच्चाई है वह विचलित करने वाली है.  अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया जब कहते हैं कि “भारत में कोरोना संक्रमण का उच्चतम स्तर जून-जुलाई में हो सकती है.” तो उम्मीदें टूटने लगती है. लॉकडाउन के चौथे चरण में आर्थिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए ढील दी गई लेकिन इस चरण में कोविड19 से संक्रमितों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई. शहरों से प्रवासी मजदूरों के पलायन के बाद संक्रमण का फैलाव अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी होने लगा है. रिपोर्ट लिखे जाने तक (26 मई, 2020) देश में कुल कोरोना संक्रमितों की संख्या 145380 तक पहुंच गई थी, तथा मौत का आंकड़ा भी 4167 हो गया था, हालांकि इस संक्रमण से मुक्त हो कर 60491 लोग पूर्ण रूप से स्वस्थ भी हो चुके हैं. हालात ऐसे बन रहे हैं कि लॉकडाउन का पांचवां चरण भी आरंभ हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं. संक्रमण की दर तेजी से छलांग लगा रही है. लॉकडाउन के पहले चरण से लेकर चौथे चरण तक संक्रमण दर चार फीसदी से ज्यादा बनी हुई है. लॉकडाउन में ढील देते हुए जिस प्रकार ट्रेनों-बसों का परिचालन तथा हवाई सेवाओं को शुरू किया गया है  ऐसे में, आशंका है कि लॉकडाउन में यह ढील भारत को यूरोपीय देशों जैसी स्थिति न खड़ा कर दे. कुछ विशेषज्ञों की यह भी राय है कि जल्दी ही संक्रमण के मामले अमेरिका जैसे हो सकते हैं. हालांकि इस मामले पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का कहना है, “देश में 319 जिले पूरी तरह संक्रमण से मुक्त हैं. भारत में अमेरिका और इटली जैसी स्थिति उत्पन्न होने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती. उपचार के बाद ठीक होने वाले मरीजों की दर सुधरकर 31.15 फीसदी हो गई है जो पिछले 15 दिनों की दर के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा है. भारत में कोविड-19 की मृत्यु दर 3.2 फीसदी है जबकि विश्व में यह 6.9 फीसदी है. इससे हम यह कह सकते हैं कि संक्रमण का दायरा कम हो रहा है.”

हालांकि कोरोना के संक्रमण की केवल यही हकीकत नहीं है. दरअसल, भारत में टेस्टिंग बहुत कम हो रही है. असल में बिना लक्षण वाले मरीजों की पहचान बहुत जरूरी है. अभी हो यह रहा है कि किसी गली में एक संक्रमित पाया जा रहा है, तो पूरी गली को सील कर दिया जा रहा है. जबकि जरूरत वहां के अधिकतर लोगों की टेस्टिंग करने की है, क्योंकि भारत में घर में भी जिस तरह लोग रहने को मजबूर हैं, ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग आसान नहीं है. टेस्टिंग के जिस तरीके की बात की जा रही है, वैसा ही हाल उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रेड जोन का भी था जो अब ऑरेंज जोन में आ गया है. हेल्थ वर्कर वहां जाकर रैपिड टेस्टिंग नहीं कर रहे हैं. बल्कि वे लोगों से ही पूछ रहे हैं कि आपके घर में कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं है, जिसे सर्दी-जुखाम के लक्षण हैं, अगर ऐसा कोई व्यक्ति है तो हमें बताएं, हम उसकी जांच करेंगे. इसके विपरीत आइसीएमआर की रिपोर्ट दावा करती है कि देश में 80 फीसदी संक्रमित ऐसे हैं, जिनमें कोरोना के कोई लक्षण नहीं पाए गए हैं. साफ है ऐसे में बहुत से लोगों की टेस्टिंग नहीं हो पा रही है.  बिना लक्षण वाले मामले बढ़ने पर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी चिंता जता चुके हैं.

असल में भारत में 13 मार्च से बड़े पैमाने पर टेस्टिंग होनी शुरू हुई है. कोविड-19 डॉट ओआरजी की रिपोर्ट के अनुसार, जब 24 मार्च को लॉकडाउन के पहले चरण का ऐलान किया गया था, उस वक्त 22,694 लोगों की टेस्टिंग हुई थी, उसमें से 2.54 फीसदी यानी 571 लोग संक्रमित पाए गए थे. अब यह दर चार फीसदी को भी पार कर चुकी है. एक सवाल और उठ रहा है कि भारत में आबादी की तुलना में टेस्टिंग बहुत कम की जा रही है. चौंकाने वाली बात यह है कि प्रति 10 लाख आबादी पर भारत में टेस्टिंग की संख्या पाकिस्तान से भी कम है. भारत में जहां यह संख्या 1,275 है, वहीं पाकिस्तान में यह संख्या 1,438 है. इस पैमाने पर भारत काफी निचले पायदान पर है.

लेकिन दूसरे देशों खासकर यूरोप और अमेरिका में हो रही टेस्टिंग के आंकड़े हमसे काफी ऊपर हैं. मसलन, अमेरिका में प्रति दस लाख 30,017, स्पेन में 52,781, इटली में 44,221, जर्मनी में 32,891 और ईरान में 7,328 लोगों की टेस्टिंग की जा रही है. कम संख्या में टेस्टिंग का सीधा मतलब है कि संक्रमण के वास्तिवक मामले सामने नहीं आएंगे. ऊपर से बिना लक्षण वाले मरीजों का अलग खतरा है. इस तरह संक्रमण बढ़ सकता है.

इसी तरह सबसे ज्यादा संक्रमण पाए जाने वाले देशों की तुलना में भी भारत में कम टेस्टिंग हो रही है. वर्ल्डमीटर डॉट ओआरजी (13 मई दोपहर तक) के अनुसार, भारत में 17.59  लाख से ज्यादा लोगों की टेस्टिंग की जा चुकी है. वहीं अमेरिका में 99.35 लाख, रूस में 43 लाख, जर्मनी में 27.55 लाख और इटली में 26.73 लाख से ज्यादा लोगों की टेस्टिंग की गई है. इन सभी आंकड़ों से साफ है कि सबसे ज्यादा संक्रमण वाले देशों की आबादी के अनुपात में भारत में टेस्टिंग नहीं की जा रही है. ऐसे में अगर उस स्तर तक टेस्टिंग पहुंचती है तो स्थिति काफी चिंताजनक हो सकती है. टेस्ट न होने से यह भी आशंका घर करने लगी है कि संक्रमण स्टेज-3 यानी सामुदायिक फैलाव की स्थिति में पहुंच गया हो और हमें इसकी जानकारी ही नहीं हो. अगर ऐसा हुआ या होता है तो हमारे यहां स्वास्‍थ्य ढांचे की जो स्थिति है, उससे स्थिति डरावनी हो सकती है. विश्व स्वास्‍थ्य संगठन भी बार-बार यह कह रहा है कि लॉकडाउन के सीमित फायदे हैं, ज्यादा से ज्यादा टेस्ट और इलाज ही संक्रमण रोकने में कामयाब हो सकता है.

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