तीन तलाक निर्णय और धर्मनिरपेक्षता

स्त्री पक्ष , , सोमवार , 02-10-2017


tripal talaq Decisions and Secularism

इरफान इंजीनियर

उच्चतम न्यायालय की पांच जजों की एक संविधान पीठ ने, 3:2 के बहुमत से, सिविल रिट याचिका क्रमांक 118/2016 (सायरा बानो विरूद्ध भारतीय संघ व अन्य) में अपने निर्णय में तलाक-ए-बिद्दत या तुरत-फुरत तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित कर दिया. कुछ मुस्लिम पुरुष इस पद्धति से अपनी पत्नियों को तलाक देते रहे हैं. इस निर्णय का खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इससे मुस्लिम महिलाओं को एक बड़े कष्ट से मुक्ति मिलेगी. परंतु इससे मुस्लिम महिलाओं की समस्याएं पूरी तरह से समाप्त नहीं होंगी. इसका कारण यह है कि इस निर्णय के बाद भी, कुरआन के संदेश की पितृसत्तात्मक व्याख्या जारी रहेगी और सुन्नी फिक (इस्लामिक विधिशास्त्र) की विभिन्न शाखाओं, जिनमें हनफी, हंबली, मालिकी और शफ्यी शामिल हैं (जिन्हें संयुक्त रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ कहा जाता है), का दबदबा बना रहेगा. भले ही उनके नियम और कानून, भारतीय संविधान के भाग-3 में वर्णित नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हों, तब भी वे लागू होंगे. 

सायरा बानो प्रकरण में तीन अलग-अलग निर्णय सुनाए गए हैं परंतु तीनों में ही इस तर्क को सही बताया गया है कि चूंकि पर्सनल लॉ या पारिवारिक कानून, राज्य द्वारा निर्मित विधि नहीं हैं इसलिए उन्हें नागरिकों के मूल अधिकारों की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता. अपने संयुक्त निर्णय में भारत के मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर ने कहा कि पारिवारिक कानून, अर्थात वे कानून जो विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता, बच्चों की संरक्षा, ऐसे मामलों में उत्तराधिकार जहां संबंधित व्यक्ति बिना वसीयत किए मर गया हो, बच्चों को गोद लेने आदि से संबंधित हैं, की नागरिकों के मूल अधिकारों के संदर्भ में न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती.

मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति नज़ीर ने अपने निर्णय में कहा कि आस्था और धर्म से जुड़े कानूनों को रद्द करना, न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. निर्णय में कहा गया है कि,‘‘अगर तार्किकतावादियों द्वारा अलग-अलग आस्थाओं पर विभिन्न आधारों पर उठाई जा रही आपत्तियों को स्वीकार कर लिया जाता है तो इससे किस तरह की समस्याएं उभरेंगी, उनका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. धार्मिक आचरणों और पारिवारिक कानूनों को हमारे अंतःकरण की आवाज़ के आधार पर सही या गलत ठहराने के पहले हमें गंभीर सोच-विचार करना होगा. समाज का भला करने की प्रबल इच्छा होते हुए भी, न्यायपालिका को ऐसे मामलों में संयम से काम लेना होगा.’’ इसका अर्थ यह है कि पारिवारिक कानून, ‘‘अपने धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने ’’ के मौलिक अधिकार का हिस्सा हैं और उनके साथ कोई छेड़छाड़ तब तक नहीं की जा सकती जब तक कि वे संविधान के अनुच्छेद 25 में वर्णित लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के आधार पर लगाए जाने वाले युक्तियुक्त प्रतिबंधों के अधीन न आते हों. 

अपने संयुक्त निर्णय में रोहिंग्टन एफ नरीमन और उदय यू ललित ने इस सिद्धांत को चुनौती नहीं दी कि पारिवारिक कानून, न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं हैं. उन्होंने कहा कि तलाक-ए-बिद्दत, ‘द मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937‘, जिसे हमारे औपनिवेशिक शासकों ने लागू किया था, की धारा दो के अधीन वैध है. अतः तलाक-ए-बिद्दत, संविधान की धारा 13(1) के अंतर्गत ‘‘राज्य क्षेत्र में प्रवृत्त विधि‘‘ है और इसलिए, अगर वह संविधान के भाग तीन में वर्णित मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे रद्द किया जा सकता है. न्यायाधीशों का यह मत था कि न्यायालयों को तलाक-ए-बिद्दत को इस आधार पर रद्द करने का अधिकार है कि वह मनमानीपूर्ण और एकपक्षीय है. अपने निर्णय में न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने मुख्य न्यायाधीश व एस अब्दुल नज़ीर के इस मत से सहमति व्यक्त की कि तलाक-ए-बिद्दत को ‘‘राज्य क्षेत्र में प्रवृत्त विधि’’ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह पारंपरिक कानून और आचरण का भाग है. अतः, अवैध ठहराई गई तुरत-फुरत तलाक की व्यवस्था, पारिवारिक कानून का भाग है और अगर वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है. परंतु कुरियन ने मुख्य न्यायाधीश और नज़ीर के इस मत से असहमति व्यक्त की कि तलाक-ए-बिद्दत, पवित्र कुरान के सिद्धांतों के विपरीत है और इस कारण वह शरीयत अधिनियम 1937 के अधिकारातीत होते हुए संवैधानिक सुरक्षा की अधिकारी नहीं हैं. अतः उसे रद्द किया जा सकता है.

पारिवारिक कानूनों को पूर्ण सुरक्षा 

इस तरह, यह कहा जा सकता है कि संविधान पीठ के विद्वान न्यायाधीशों ने 5:0 के बहुमत से यह मत व्यक्त किया कि सभी समुदायों के पारिवारिक कानूनों का राज जारी रहेगा और वे संविधान के अनुच्छेद 25(1), जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, के अंतर्गत आते हैं. धार्मिक ग्रंथों के संरक्षक और अधिकांश समुदायों के परंपरागत रीति-रिवाज पितृसत्तात्मक हैं. इन रीति-रिवाजों को ईश्वर का भय दिखाकर और कब-जब जबरदस्ती लोगों पर लादा जाता है. लोगों को धमकाया जाता है कि अगर वे इन रीति-रिवाजों का पालन नहीं करेंगे तो उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा. धार्मिक ग्रंथों की पितृसत्तात्मक सोच पर आधारित व्याख्या हमेशा से इस ढंग से की जाती रही है कि उससे महिलाओं और बच्चों की स्थिति दोयम बनी रहे और उनका पोषण किया जा सके. पारिवारिक कानूनों के संरक्षक  - जिन्हें हम सांस्कृतिक उद्यमी या संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं के पहरेदार कह सकते हैं - कुछ अपवादों को छोड़कर पुरातनपंथी और रूढ़िवादी होते हैं.

अपने धर्म का आचरण करने, उसमें आस्था रखने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता सभी व्यक्तियों को प्राप्त है परंतु यदि पारिवारिक कानूनों को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत असीमित सुरक्षा दे दी जाएगी तो इससे सांस्कृतिक पहरेदारों की शक्ति में इजाफा होगा और उनके लिए समाज पर अपनी सोच लादना और आसान हो जाएगा. डॉ. अंबेडकर हमारे राजनैतिक प्रजातंत्र को सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना चाहते थे. सामाजिक प्रजातंत्र जीने का वह तरीका है जो सभी नागरिकों की समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित है. अंबेडकर ने हमें चेतावनी दी थी कि ‘‘26 जनवरी 1950 के दिन हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं. राजनीति में तो हमारे पास समानता होगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी. राजनीति में तो हम एक व्यक्ति एक वोट, एक वोट एक मूल्य के सिद्धांत को स्वीकार कर लेंगे पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में, अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं के चलते, एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को नकारते रहेंगे. हम कब तक ऐसे अंतर्विरोधों  में जीते रहेंगे? हम कब तक सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारना जारी रखेंगे? अगर हमने ऐसा लंबे समय तक किया, तो हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र की कीमत पर ही ऐसा कर रहे होंगे. हमें इस अंतर्विरोध को जल्द से जल्द मिटाना होगा, नहीं तो असमानताओं के शिकार लोग उस राजनीतिक लोकतंत्र की संरचना को उखाड़ फेंकेंगे जिसे इस संविधानसभा ने इतनी मेहनत से तैयार किया है.‘‘ 

यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने तुरत-फुरत मुंहजबानी तलाक को रद्द कर दिया है परंतु यह चिंता का विषय है कि पारिवारिक कानूनों को धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा मान लिया गया है. पूरे निर्णय में कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि न्यायालय ने लैंगिक न्याय का पक्ष लिया हो.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रतिक्रिया

अपनी प्रारंभिक प्रतिक्रिया में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने कहा कि न्यायालय ने उसके इस मत को स्वीकार कर लिया है कि पारिवारिक कानून, धार्मिक स्वतंत्रता का भाग हैं और उनके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. बोर्ड ने कहा कि न्यायालय ने उसके इस तर्क की पुष्टि की है. इस निर्णय के बाद भी विभिन्न इस्लामिक विधिशास्त्रों के उलेमा मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी के मालिक बने रहेंगे और अपना मत उन पर लादना जारी रखेंगे. यद्यपि तलाक-ए-बिद्दत को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया है तथापि अब भी मुस्लिम महिलाओं को तलाक-ए-एहसान (तीन माह के अंतर से दो बार तलाक शब्द का उच्चारण) व तलाक-ए-हसन (तीन महीने तक प्रत्येक माह में एक बार ऐसे समय जब महिला रजस्वला न हो, तलाक शब्द का उच्चारण) से तलाक दिया जा सकेगा. तलाक अब तुरत-फुरत नहीं हो सकेगा और तलाक देने में कम से कम तीन माह लगेंगे. 

यह सही है कि किसी भी व्यक्ति पर विवाह लादा नहीं जा सकता. अगर पति-पत्नी में संबंध इस हद तक खराब हो गए हों कि उनमें सुधार की कोई गुंजाइश न हो तो तलाक ही एकमात्र व सर्वोत्तम रास्ता है. परंतु तलाकशुदा महिलाओं को उनकी किस्मत के भरोसे बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता. एआईएमपीएलबी की दृष्टि में यद्यपि तलाक-ए-बिद्दत (जिसे वह धर्म की दृष्टि से गलत परंतु कानून की दृष्टि से सही मानता है) की बलि दे दी गई है परंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को बचा लिया गया है. 

धर्मनिरपेक्षता

सायरा बानो प्रकरण में निर्णय ने न्यायपालिका के लिए लक्ष्मण रेखा खींच दी है. पारिवारिक कानूनों को धर्म स्वातंत्र्य का अविभाज्य हिस्सा घोषित कर दिया गया है और अगर वे मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हों तब भी उनकी न्यायिक समीक्षा प्रतिबंधित कर दी गई है. संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत नागरिकों को प्रदान किया गया धार्मिक स्वतंत्रता का मूल अधिकार निम्न छह युक्तियुक्त प्रतिबंधों के अधीन हैः 1) लोक व्यवस्था 2) सदाचार 3) स्वास्थ्य 4) संविधान के भाग तीन के अन्य उपबंध 5) धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलापों का विनियमन या निर्बंधन व 6) सामाजिक कल्याण और सुधार. अंतिम दोनों प्रतिबंधों को लागू करने के लिए विधायिका को हस्तक्षेप करना होगा. हमारा यह विनम्र तर्क है कि यद्यपि न्यायपालिका पर यह जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों के धार्मिक स्वातंत्र्य के अधिकार की संरक्षा करे तथापि अनुच्छेद 25 की भाषा से यह स्पष्ट है कि धार्मिक स्वातंत्र्य का अधिकार, संविधान के भाग तीन के अन्य उपबंधों के अधीन है जिनमें अनुच्छेद 14, 15 और 16 शामिल हैं. ये अनुच्छेद विधि के समक्ष समता व धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध करते हैं. 

जहां तक पारिवारिक कानूनों का प्रश्न है, सायरा बानो निर्णय ने इन्हें मूल अधिकारों से संगत बनाने की जिम्मेदारी कार्यपालिका और विधायिका पर डाल दी है. समान नागरिक संहिता, वर्तमान सरकार के एजेंडे का हिस्सा है. इसके चलते अल्पसंख्यकों को यह डर है कि विधायिका उन पर ऐसा पारिवारिक कानून थोप देगी जो उनके जीने के तरीके के अनुरूप नहीं होंगे और जिनका उद्देश्य राष्ट्र का हिन्दूकरण करना होगा. पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने अदालत से कहा कि अगर वह तलाक-ए-बिद्दत को गैरकानूनी घोषित कर देती है तो केन्द्र सरकार नया कानून बनाने के लिए तैयार है. किसी प्रतिकूल पारिवारिक कानून को उन पर लाद दिए जाने के डर के कारण ही अल्पसंख्यक एक बने हुए हैं. उन्हें किसी भी परिवर्तन से डर लगता है, भले ही वह कितना ही वांछनीय और समुदाय के लिए कितना ही अच्छा क्यों न हो. 

सायरा बानो निर्णय से ऐसा लगता है कि न्यायपालिका की यह जिम्मेदारी है कि वह पारिवारिक कानूनों को लागू करने में धार्मिक-सांस्कृतिक पहरेदारों की मदद करे. न्यायपालिका, धार्मिक-सांस्कृतिक पहरेदारों द्वारा समुदाय के सदस्यों के मूल अधिकारों पर अतिक्रमण को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं करेगी. न्यायपालिका इस्लाम में चर्च को प्रोत्साहन देगी  जबकि धर्म में इसके लिए कोई स्थान नहीं है. इस्लाम में ईश्वर और श्रद्धालु के बीच किसी एजेंट के लिए कोई जगह नहीं है. कोई व्यक्ति कुरआन को समझने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की मदद ले सकता है परंतु वह केवल ईश्वर के प्रति जवाबदेह है, धार्मिक-सांस्कृतिक पहरेदारों के प्रति नहीं. सायरा बानो निर्णय ने इस्लाम के भोले-भाले मानने वालों को स्वनियुक्त चर्च के रहमोकरम पर छोड़ दिया है. इनमें एआईएमपीएलबी और विभिन्न फिक शामिल हैं, जो मुसलमानों पर अपना मत लादना चाहते हैं. इस्लाम में किसी व्यक्ति के लिए यह कतई आवश्यक नहीं है कि वह किसी भी धार्मिक विधिशास्त्र का पालन करे. उसे तो सिर्फ सीधे रास्ते (सीरत-उल-मुस्तकीम) पर चलना है. यह सीधा रास्ता क्या है, उसका निर्धारण संबंधित व्यक्ति स्वयं कर सकता है और वह केवल अल्लाह के प्रति जवाबदेह है. इस्लाम में समय के साथ कानूनों में परिवर्तन करने की गुंजाइश है. इसे इज्तेहाद कहा जाता है. विभिन्न फिकों के उलेमा ने इज्तेहाद के रास्ते को ही बंद कर दिया है और वे केवल अपने फिक को सभी पर लादना चाहते हैं. वे केवल तकलीद, अर्थात बिना अपना दिमाग लगाए चुपचाप किसी फिक की मान्यताओं को स्वीकार करना, की शान में कसीदे काढ़ते रहते हैं. 

जहां सायरो बानो निर्णय का इस अर्थ में स्वागत किया जाना चाहिए कि उसने तलाक-ए-बिद्दत की बेरहम प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया है वहीं यह चिंताजनक है कि उसने मुस्लिम पर्सनल लॉ को धर्म स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित कर दिया है. इस निर्णय ने मुसलमान नागरिक या तो धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों, जो तकलीद के हामी हैं, के रहमोकरम पर छोड़ दिया है या संसद के, जिसमें हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का बोलबाला है. उनके लिए एक तरफ कुंआ है तो दूसरी तरफ खाई. 

मुस्लिम पर्सनल लॉ विवाह, तलाक, बच्चों की संरक्षा, उत्तराधिकार व गुज़ारा भत्ता आदि महत्वपूर्ण मसलों में 17 करोड़ भारतीयों के जीवन को प्रभावित करता है. क्या हम इतने महत्वपूर्ण कानून को धर्म के स्वनियुक्त पहरेदारों की मर्ज़ी पर छोड़ सकते हैं? क्या इन कानूनों को समानता, न्याय और जीवन व स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत नहीं होना चाहिए?

हम मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ नहीं हैं. बल्कि हम किसी भी समुदाय के पर्सनल लॉ के खिलाफ नहीं हैं. इन सब में कुछ अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भीं. हम विविधता के हामी हैं परंतु हमारी यह मान्यता है कि अगर किसी भी पर्सनल लॉ का कोई भी प्रावधान नागरिकों के मूलाधिकारों का उल्लंघन करता हो तो उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए. सायरा बानो प्रकरण से हमें केवल आधी अधूरी जीत हासिल हुई है. हमें धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के खिलाफ संघर्ष जारी रखना है. यह संघर्ष तब तक जारी रखा जाना होगा जब तक या तो ये ठेकेदार समाज के हाशिए पर न पटक दिए जाएं या वे भी संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप कार्य करने के लिए राज़ी न हो जाएं. 


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