पराधीन सपनेहु सुख नाहीं

स्त्री पक्ष , , मंगलवार , 01-08-2017


Paradhin sapnehu sukh nahi

क्षमा शर्मा

जब छोटी थी तो स्कूल में पंद्रह अगस्त बहुत धूमधाम से मनाया जाता था.  देशभक्ति के जोशीले और सुरीले गीत गाए जाते थे. कविता प्रतियोगिता, रंगभरो प्रतियोगिता, नेताओं के जीवन की नाटिकाएं, आजादी से जुड़े चरित्रों से सम्बंधित फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताएं हुआ करती थीं. खेल प्रतियोगिता भी बड़ी संख्या में होती थीं.  कभी-कभार ऐसे कवि सम्मेलन भी आयोजित किए जाते थे जिनमें देशभक्ति से परिपूर्ण  कविताएं सुनाई जाती थीं. चीन और पाकिस्तान से लड़ाई हो चुकी थी, इसलिए इन दोनों देशों को देखने और बदला लेने की बातें अकसर कविताओं और भाषणों में बयान की जाती थीं. भाषण प्रतियोगिताएं भी खूब होती थीं. बच्चे इनमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे. ‘हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’ जैसे गाने गली-गली विशेष रूप से स्वतंत्रता दिवस के आयोजन के लिए लगाए गए लाउडस्पीकरों पर खूब बजते थे और एक अजीब किस्म के रोमांच से भर देते थे. 

पिता जी मुझे भी खूब जोशीले भाषण तैयार कराते थे, बार-बार उन्हें सुनते. मैं भी पूरे जोश से चिल्लाकर भाषण देती और खूब इनाम जीतकर लाती थी. पिता जी और मां से जब कोई आकर कहता कि आपकी लड़की तो बहुत अच्छा भाषण देती है तो वे फूले न समाते. सबको जीते गए इनाम दिखाते. पूरी रेलवे कालोनी में आज के शब्दों में मैं स्टार बन जाती. अगले दिन मक्खन निकालते वक्त कटोरी भरकर मक्खन चीनी मिलाकर मां मुझे खाने को देती. यह उसका प्यार जताने और तारीफ करने का नायाब तरीका था.    

पिता जी रेलवे में थे. हम लोग रेलवे कालोनी में ही रहते थे. रात-दिन रेलगाड़ियों और मालगाड़ियों की आवाजाही और लोगों की चहल-पहल, रेलवे स्टेशनों को हमेशा जगर-मगर और रौनक से भरे रहती थी. 

पंद्रह अगस्त के दिन स्टेशन पर भी खूब सजावट होती थी. रंग-बिरंगी झंडियों और गेंदे के फूलों की मालाओं  से पूरे स्टेशन को सजाया जाता था. उन दिनों कोयले से चलने वाले इंजन खूब सजे होते थे. उन पर टंगी फूल मालाएं हवा में चारों ओर लहराती दिखती थीं. बच्चे नए कपड़े पहनकर खूब सज-संवरकर निकलते थे. यानि कि आजादी का जश्न पूरे जोर-शोर से मनाया जाता था. अकसर पंद्रह अगस्त के दिन बारिश होने लगती थी. सब लोग भगवान से मनाते थे कि बारिश हो तो सही मगर कार्यक्रम होने के बाद हो. शाम के समय आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता था. पतंग जैसे आजादी का सबसे बड़ा प्रतीक थी. सब लोग अपने दरवाजों, आंगनों या छत पर चढ़कर पेच लड़ाए जाने और वो-काटा वो-काटा का मजा लेते थे. 

मां अकसर कहती थी कि अंगरेजों ने हमारे देश के लोगों पर कितने अत्याचार किए. वह यह भी बताती थी कि जिस दिन गांधी जी मरे थे तब आसमान काला हो गया था. अब इस बात में कितनी सच्चाई है, कह नहीं सकती. हो सकता है मां गांधी जी की मौत के दुख को इस तरह से बयान कर रही हो या उसे अपने दुख में आसमान काला दिखा हो या कि सचमुच आसमान काला हो गया हो. 

जो भी हो जैसे-जैसे समय बीता आजादी को लेकर आम आदमी के मन में खुद मुख्तार होने की जो आशा पली थी, वह धीरे-धीरे तिरोहित होने लगी. 

बचपन में आजादी का क्या मतलब है, यह अकसर समझ में नहीं आता था. आजादी का मतलब सबके लिए अलग-अलग भी था. कोई कहता था कि अब वह कहीं भी आ जा सकता है. कोई कहता कि अब वह मनचाही पढ़ाई कर सकता है. किसी के लिए देश में किसी गोरे का दिखाई न देना ही सबसे बड़ी आजादी थी.

लेकिन आजादी के कारण सबको मनचाहे चांद-सितारे मिल सकते हैं, वैसा न हो सका. ऐसा होता भी नहीं है कि सौ में से सौ लोगों की सभी आशाएं पूरी की जा सकें. दलितों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ. इसीलिए उसके बहुत से लीडरान ने इसे असली आजादी नहीं माना था. 

 

सबसे पहले मुझे औरतों के लिए आजादी का मतलब तब पता चला जब मैंने नौकरी शुरू की और अपनी पहली तनख्वाह मां के हाथ में लाकर दी. 

मां ने उन कुछ सौ रुपयों        को माथे से लगाया. फिर वापस करते हुए कहा-खूब कमाओ, फूलो-फलो. यानी कि उसे मालूम था कि औरतें कमाकर ही फल-फूल सकती हैं. जिसके पास अपने पांव पर खड़े होने और कमाने की शक्ति नहीं वह कुछ नहीं कर सकता.  फिर एक दिन उसने  ब्रजभाषा में कहा जिसका अर्थ था कि दुनिया में सबसे अच्छी बात अपने पांवों पर खड़ा होना है. अगर खुद कमाते हों तो किसी और के आगे हाथ फैलाना क्यों पड़े. मां अकसर तुलसी की औरतों के संदर्भ में कही गई वह चौपाई भी सुनाती - ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं.’   मां को इस बात का बहुत अफसोस था कि उसके जमाने में लड़कियों को ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता था, बचपन में ही शादी कर दी जाती थी. अगर मौका मिला होता तो वह जरूर पढ़ती और अपने पांव पर खड़ी हो जाती.

मां आज होती तो सौ साल की होती. उसने किसी से फेमिनिज्म का पाठ नहीं पढ़ा था मगर अपने पांवों पर खड़े होने की खुशी क्या होती है, हाथ में पैसा हो तो कितनी ताकत होती है और आत्मनिर्भरता ही औरत की असली आजादी होती है, इसे वह अच्छी तरह जानती थी. वह औरतों की नौकरी की इतनी प्रबल समर्थक थी कि उसकी पीढ़ी की औरतें अकसर उसका मजाक उड़ाती थीं. दो भाभियां, जिनमें से एक आठवीं पास थीं और दूसरी दसवीं, उनको मां ने अपने प्रयासों और मेहनत से उच्च शिक्षा दिलवाई. उन्हें जिद करके कालेज में एडमीशन दिलवाया और बड़े परिवार के काम-धंधे के साथ उनके बच्चों को भी पाला. एक भाभी जो गांव में रहती थीं, जब उन्होंने नौकरी करनी चाही तो मां ने  उस समय के गांव के वातावरण की भी कोई परवाह नहीं की. अकसर औरतें पल्लू मुंह में खोंसकर खी-खी करके उसका मजाक उड़ाती थीं कि इत्ता पैसा पोटली में बांधकर कहां जाओगी. बेटे तो बेटे, अब तो बहू और बेटियों की कमाई भी खा रही हो. 

मां जिसे आज का जमाना कहती थी जिसके कारण औरतें पढ़-लिख सकीं, आगे बढ़ सकीं, अपने पांवों पर खड़ी हो सकीं,वह मेरी नजर में आजादी के बाद का जमाना ही है और आजादी का असली हासिल भी है. औरतों को पढ़ने –लिखने, नौकरी का अधिकार हमारे लोकतंत्र ने दिया. हमारे यहां तो औरतों को वोट देने का अधिकार पाने के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा. जबकि अमेरिका जैसे देश में औरतों को वोट का हक पाने के लिए सत्तर साल तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा था. अपने यहां तो आम तौर पर मीडिया का साथ औरतों को मिला है, मगर अमेरिका में तो वोट का अधिकार पाने का जब संघर्ष चल रहा था तो औरतों का खासा मजाक उड़ाया जाता था. उनके ऊपर मजाक उड़ाते लेख और कार्टून बनाए जाते थे. कहा जाता था कि ये औरतें चौके-चूल्हे से अलग हटकर वोट देकर क्या करेंगी. 

अपने नेता को चुनने में औरत की भी कोई भूमिका हो सकती है, यह उसका वोट ही तय करता है और यह ताकत हमारे देश की हर औरत के पास है. यही नहीं अब तो किसी पार्टी का घोषणा पत्र बिना औरतों के अधिकारों की बातें किए पूरा नहीं होता. यही तो औरतों की असली ताकत है, आजादी का असली हासिल है. और देखा जाए तो औरतों की ताकत बढ़ती ही जा रही है. संविधान और लोकतंत्र ने उन्हें बराबरी के अधिकार दिए हैं. कानून ने स्त्री-पुरुष का कोई भेदभाव नहीं किया है. n


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