ढोंगी बाबाओं की भक्त औरतें

स्त्री पक्ष , , शनिवार , 16-09-2017


Devotees Women of Dhongi Baba

क्षमा शर्मा

एक तरफ तो राम-रहीम की कारों का काफिला दिखाया जा रहा था और दूसरी तरफ उन औरतों पर कैमरे फोकस कर रहे थे जो रह-रहकर पत्थर मार रही थीं. कश्मीर में भी हम ऐसी पत्थरबाज लड़कियों और औरतों को देख चुके हैं. लेकिन राम-रहीम की समर्थक ये औरतें पत्थर क्यों मार रही थीं. आखिर राम-रहीम की शिकायत करने वाली लड़कियां ही थीं जिन्हें उसने दुष्कर्म का शिकार बनाया था और जो उसके आश्रम में साध्वी की तरह रहकर सेवा करती थीं. न जाने कितनी औरतों के साथ ऐसा किया गया होगा. मगर शिकायत करने की हिम्मत कुछ ही जुटा सकीं. राम-रहीम के प्रति लोगों की कितनी अंध श्रद्धा थी कि जब इन लड़कियों ने अपने घर वालों को इस बारे में जानकारी दी तो उन्होंने भी इस पर विश्वास नहीं किया था. उन्हें अपनी लड़कियों की बातों पर विश्वास न होकर एक ढोंगी और दुष्कर्मी पर ज्यादा विश्वास था जो बाबा का रूप धरे था. तो इन औरतों को आखिर उन लड़कियों से सहानुभूति क्यों नहीं हुई. लड़कियों ने बताया था कि उन्हें यह बाबा अपनी तथाकथित गुफा में बुलाकर दुष्कर्म का शिकार बनाता था. इसे लड़कियां अपनी कोड भाषा में 'पिता जी द्वारा माफी' दिया जाना कहती थीं. 

एक साक्षात्कार में राम-रहीम एक मशहूर एंकर से यह कहता पाया जाता था कि वह अपनी फिल्मों में ब्रह्मचर्य का संदेश युवाओं को देता है कि अगर वह ब्रह्मचारी हो सकता है तो वे क्यों नहीं. अच्छे भरे-पूरे परिवार वाला ब्रह्मचर्य की बात करें और इस पर इतराए भी. क्या खूब नाटक और झूठ था.

डेरा सच्चा सौदा में भगवान कहलाए जाने वाले राम-रहीम को बचाने बड़ी संख्या में औरतें आ गईं तो आश्चर्य भी क्या. आखिर सारे धर्मों, रीति-रिवाजों, अंधविश्वासों को बचाने का ठेका हमेशा से औरतों के जिम्मे जो ठहरा. लड़कियों के घर वाले ही उन्हें ऐसी जगहों पर छोड़ जाते थे. आशाराम के यहां भी तो ऐसी ही न जाने कितनी औरतें-लड़कियां थीं. वह और उसका बेटा नारायण स्वामी भी लड़कियों के साथ अनाचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. छोटी बच्चियों को भी नहीं बख्शा जाता था. 

ग्रामीण या शहरी पृष्ठभूमि की गरीब औरतें ऐसे बाबाओं के चंगुल में फंस जाएं तो आश्चर्य नहीं होता, मगर पढ़ी-लिखी अच्छे खाते-पीते मध्यवर्ग की औरतें इनके जादू में कैसे फंसती हैं. कैसे वे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलकर इन्हें हर हाल में बचाना चाहती हैं, यह देखकर जरूर आश्चर्य होता है. 

इस प्रसंग को देखकर सालों पुरानी दो घटनाएं याद आती हैं. एक है 1987 में रूप कंवर के सती हो जाने की घटना. यह लेखिका तब दिवराला गई थी, लेकिन वहां पहुंचने से पहले इसे, एक महिला पत्रकार शुभा वर्मा और जयपुर के मशहूर पत्रकार भंवर सुराणा को वहां जाने से रोक दिया गया था. क्योंकि प्रशासन और पुलिस की नजर में हम पढ़ी-लिखी औरतें थीं और सती के पूरे प्रसंग को पढ़ी-लिखी औरतों ने ही हवा दी थी. बात का बतंगड़ बनाया था. हम आधे रास्ते से ही लौट आए थे. तब भंवर सुराणा ने सुझाया था कि वहां अगर जाना है तो रूप बदलकर जाना होगा. अगले दिन भंवर जी ने सिर पर मोटा पग्गड़ बांधा था. हम दोनों महिलाओं ने हाथ भर-भरकर कांच की लाल-हरी चूड़ियां पहनी थीं. मांग में ढेर सारा सिंदूर भरा था. यही नहीं सिर पर पल्लू रखकर हलका घूंघट भी निकाला था जिससे कि साबित हो सके कि हम सती मैय्या के चौरा के दर्शन करने जा रहे हैं और सती माता के असली भक्त हैं. सचमुच भंवर जी का सुझाव कारगर साबित हुआ था. हमारी चूड़ियों, सिंदूर और घूंघट की ताकत इतनी थी कि किसी ने भी हमें रास्ते में नहीं रोका था. जो पुलिस कल आंखें दिखा रही थी, उसने हमारा रूप-रंग देखकर ही बिना कार रोके आगे जाने का इशारा कर दिया था.

दिवराला में हमें ऐसी सैकड़ों औरतें मिली थीं जो सती मैय्या के समाधि स्थल पर नारियल चढ़ाने आई थीं. आखिर इन औरतों को एक जिंदा जल मरने वाली औरत की चीखें क्यों नहीं सुनाई दीं. वे इस तरह से प्राण देने वाली औरत को महान और आदर्श मानकर नारियल, फूल और पूजा की सामग्री चढ़ाने क्यों आईं. उन दिनों वहां बहुत से राजनीतिक दल सती प्रथा का खुलेआम न केवल समर्थन कर रहे थे बल्कि कह रहे थे कि सरकार को हिन्दू धर्म की प्रथाओं और परंपराओं के बारे में बोलने का कोई हक नहीं. इनमें जनता दल के कल्याण सिंह कालवी और भाजपा की विजय राजे सिंधिया आगे थीं. विजय राजे ने तो यहां तक कहा था कि सती होना औरत का अपना अधिकार है. जब यह लेखिका कल्याण सिंह कालवी से मिलने गई, तो उन्होंने तीन रंगों की चुन्नियां दिखाईं जिन्हें राजस्थान में लड़कियों की शादी के अवसर पर दिया जाता था. शायद अब भी दिया जाता होगा. इनमें से एक चुन्नी सती होने के लिए होती है.  ये तर्क बिल्कुल वैसे ही थे जैसे तीन तलाक के फैसले के बारे में पिछले दिनों मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्यों तथा अन्य रूढ़िवादियों द्वारा दिए गए थे.  

पंचकुला, मुक्तसर, मलोट या सिरसा में जो कुछ हुआ, एक दुष्कर्मी और बदमाश को बचाने न केवल पुरुष बल्कि बड़ी संख्या में महिलाएं तो आई हीं, पुलिस वाले जिन पर कानून और व्यवस्था को बचाए रखने की  जिम्मेदारी होती है वे भी राम-रहीम को बचाते दिखे. हमारे नेताओं को तो कई दिन बाद याद आया कि राम-रहीम को सजा सुनाने की तारीफ करें. अब तक तो उन्हें लग रहा था कि कहीं राम-रहीम के खिलाफ एक शब्द भर बोले कि उनके वोट कटे. हर अच्छे-बुरे का फैसला वास्तविक अच्छाई-बुराई के मुकाबले वोट के गणित से तय होता है. इसी वोट बटोरू गणित को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों ने धर्मों के भीतर किसी भी तरह के सुधारवादी आंदोलन चलाने की कवायद तो न जाने कब से छोड़ दी, बल्कि वे इन नकली बाबाओं और खुद को भगवान घोषित करने वालों के आगे-पीछे भी अकसर दुम हिलाते नजर आते हैं.  

दूसरी घटना बहुत बचपन की है. उसके कुछ दृश्य याद हैं. यह आगरा की घटना है. बड़े भाई के एक पैर में पोलियो है. एक दिन मां ने उनसे जिद की कि पास ही में मलेरिया वाले बाबा आ रहे हैं. अगर वह एक बार उनके पांव को छू लेंगे, तो पांव ठीक हो जाएगा. भाई  बेहद शिक्षित और कालेज में पढ़ाते थे. उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी बातों पर कतई विश्वास नहीं है, इसलिए नहीं जाएंगे. लेकिन मां ने उनसे बहुत जिद की. अपनी खातिर चलने को कहा. बेचारे मन मारकर गए. वहां एक बड़े मैदान के बीचोबीच, चार बांस गाड़कर उसके ऊपर एक चारपाई रखी थी. बताया जा रहा था कि बाबा इसी पर बैठकर दर्शन देंगे. वहां औरतों और आदमियों की भारी भीड़ थी. मगर बाबा नहीं आए. लोग बेचारे दोपहर तक इंतजार करके, मायूस होकर लौट गए. बाद में यह बाबा भी किसी बड़े अपराध में पकड़ा गया था.   

बताया जाता है कि जब राजा राम मोहन राय सती प्रथा कि खिलाफ आंदोलन चला रहे थे तो सती समर्थकों ने बहुत सी औरतों से कहलवाया था कि वे सती होना चाहती हैं. आज तक भी बहुत सी औरतें धर्म के मामले में मक्खी पर मक्खी मारने वाली कहावत को ही तो चरितार्थ करती हैं. जो उन्हें बता दिया गया उसमें अपने तर्क वितर्क करने के मुकाबले जो बता दिया गया, जो दिखाया गया, वही सही है. आखिर वे ऐसा मानती हैं तो क्या गलत. इधर हमारा मीडिया आशाराम या राम-रहीम को सजा मिलने के बाद उन्हें खलनायक दिखा रहा है, मगर यही मीडिया तो है जो इन फरेबियों के आदर्श की चाशनी में लिपटे लम्बे-लम्बे इंटरव्यू दिखाता रहा है. इन्हें सचमुच भगवान का दर्जा देता रहा है. 


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??????? ???? ??? :: - 10-29-2017
क्षमा शर्मा जी के लेख मैं बराबर पढ़ता हूँ. सभी बड़ी विचारोत्तेजक होते हैं.