देखाई द न बालम सोनपुर के मेला

विविध , , रविवार , 17-12-2017


View of The Sonpur

राजन किशोर राजन

सोनपुर मेला जा रहा हूँ, एक बार फिर. इससे पूर्व कई-कई बार गया हूँ, कभी दिन, कभी रात में. दुनिया भी तो एक मेला ही है, फर्क यही कि यह हमेशा लगा रहता है जबकि यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान  के बाद शुरू होता है और महीने भर तक गुलजार रहता है. स्थानीय लोग इसे छत्तर मेला कहते हैं. 

एशिया के इस सबसे बड़े पशु मेले का इतिहास कुछ लोग उत्तर वैदिक काल से जोड़ते हैं. महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इसे शुंगकाल से माना है, जिसके कई अवशेष इस क्षेत्र के मठ-मंदिरों से प्राप्त हुए हैं. कहते हैं कि इस मेले में कभी मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे. मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य, अकबर और वीर कुँवर सिंह भी यहाँ हाथियों की खरीद करते थे. हथुआ, बेतिया, टेकारी तथा दरभंगा महाराज की तरफ से सोनपुर मेला के अंग्रेजी बाजार में नुमाइशें लगायी जाती थीं जिसमें कश्मीर, अफगानिस्तान, ईरान, लिवरपुल, मैनचेस्टर से आनेवाले बेशकीमती कपड़े एवं अन्य बहुमूल्य सामग्रियों की खरीद-बिक्री होती थी. 

बिहार के समृद्ध और गौरवशाली अतीत का साक्षी रहा यह मेला ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मेरूदंड रहा है. किंवदंतियों, जनश्रुतियों के माध्यम से इसके संबंध में अनगिनत जानकारियाँ, सैकड़ों कथाएं हैं, इसके विषय में सदियों से किंवदंती चली आ रही है कि यहाँ सूई से लेकर जहाज और चूहे से लेकर हाथी तक बिकता है. आज भले ही समय के साथ बहुत कुछ बदल गया, टूट गया, जुट गया पर आज भी यहाँ एक रुपए की मिठाई से लेकर करोड़ों की कार उपलब्ध है. यहाँ ऑटो-एक्सपो के कई पंडाल नजर आते हैं. वहीं बगल में गुड़ और शक्कर की जलेबी. इस बार मैं भी ओल की जलेबी ढूँढ़ रहा हूँ. तभी एक युवक दोनों हथेलियों को फैलाने को कह, उसमें डेटॉल डाल हाथ साफ रखने के फायदे गिनाता है साथ ही सोच बदलने की नसीहत देता है. मैं उसे बताता हूँ कि मैं पटना से आया हूँ तो मुस्कुराते हुए बताता है कि फोटो तो खींचा गया. 

सरकारी विभागों की मौजूदगी भी मेले में है. मेले में महिला पुलिस की भारी उपस्थिति देख आप नारी सशक्तीकरण के संबंध में कोई लेख भी लिख सकते हैं. जहाँ एक तरफ गाँव की कई महिलाएं खुरपी-हँसुआ खरीद रही हैं वहीं उनके ठीक बगल में महिला पुलिस आ-जा रही हैं. सोनपुर रेल मंडल, कला-संस्कृति विभाग आदि द्वारा मेले में सांस्कृतिक आयोजनों की धूम है. विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन भी हो रहा है. पर रात जैसे-जैसे बढ़ती है थियेटरों का जलवा कायम हो जाता है. सोनपुर मेला थियेटरों के कारण कई बरसों से बदनामी भी झेल रहा है. रात में आप मेला जा रहे हैं तो लोग यही समझेंगे कि आप थियेटर देखने जा रहे हैं और आपको देख आँखों-आँखों में मुस्कुरा देंगे. प्रशासन की सख्ती और बिहार में शराबबंदी ने इनका धंधा मंदा कर दिया है. इस बार काफी कठिनाइयों के बाद इन्हें लाइसेंस मिला है. व्यापारियों ने एक दिन की सामूहिक हड़ताल कर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया तब जा कर प्रशासन का हृदय पसीजा और मेले में लगे नौ थियेटर (पायलः एक नजर, शोभा सम्राट थियेटर, गुलाब विकास थियेटर आदि) और उससे जुड़े लगभग एक हजार कलाकारों ने राहत की साँस ली, साथ ही अनेकानेक रसिकों, मनचलों ने सरकार को दुआएं दीं. कहा जाता है कि पहले देश की जानी-मानी नृत्यांगनाएं और नाट्य-मंडलियाँ, इस मेले में आया करती थीं. आज भी यहाँ देश की जाने-माने कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं. हरि और हर यानी हरिहर क्षेत्र स्थित यह मेला विभिन्न धर्मों, संप्रदायों के मिलन की भूमि रही है. उस परंपरा को इस मेले ने आज भी थाम कर रखा है. साधुओं के साथ बौद्ध भिक्षुओं को मेला घूमते आप देख सकते हैं. मेले में मिथिला पेपर मेसी आर्ट की राज्यस्तरीय पुरस्कार विजेता ललिता देवी, मधुबनी जिले से आई हैं और वेणु शिल्प, सिक्की कला आदि की जीवंत प्रस्तुति कर रही हैं. दऊरी-मउनी बुनने वाले कलाकार भी मेले में हैं और लुप्त हो रहे इस कला को बचाने की प्रेरणा दे रहे हैं. 

आज जब भौतिक विकास सर्वोपरि है और मानवीय मूल्यों के लिए कोई स्थान नहीं है, इस मेले में अमीर-गरीब सभी को जलेबी खरीद कर खाते देख सुकून मिलता है. मेले ने अभी भी अपने गँवई अंदाज को बचाये रखा है. गाँव-घर की महिलाएं, महीनों इस मेले का इंतजार करती हैं. खुरपी, हँसुआ, कुदाल, टिकुली, सिन्दुर, चूड़ियाँ यहाँ सब कुछ मिल जाता है. विविध नस्ल के कुत्ते, बकरियाँ, पक्षी आज भी आकर्षण के केन्द्र हैं. बैल, घोड़े, हाथी आज भी खरीदे जाते हैं. नौका दौड़ से ले कई कार्यक्रम आज भी अतीत को जीवंत कर देते हैं.

लेकिन जब ठहरकर विचारेंगे तो लगेगा कि मेला एक युद्ध लड़ रहा है, अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सालों से संघर्ष कर रहा है. लोगों के उत्साह, बच्चों-महिलाओं-बुजुर्गों की भारी संख्या को देख भरोसा होता है कि यह मेला चलता रहेगा, जब तक गंडक नदी का पानी गंगा में मिलता रहेगा. राजेश जोशी की पंक्तियाँ हैं:- 

हमारे समय का एक ही सच है 

कि हर चीज फिसल रही है अपनी जगह से.

 ऐसे में भला यह मेला क्यों न फिसले पर तमाम इसलन-फिसलन को अलगाते-विलगाते मेला अपने रंग से अभिभूत करता है. 

ऐसी कौन बहुरिया होगी जो अपने पति से मनुहार न करती होगी ‘‘देखाई द न बालम, सोनपुर के मेला.’’ 


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