गुलामी का अभिशप्त जीवन जी रहे असम के चाय मजदूर

विविध , , बृहस्पतिवार , 01-02-2018


Tea laborers living in Assams slain life

दिनकर कुमार

असम में कोई भी राजनीतिक दल चाय मजदूरों के वोट बैंक के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकता. राज्य के कुल 126 विधानसभा क्षेत्रों में से 35 में चाय मजदूर मतदाता के रूप में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. राज्य में किसी भी दल की सरकार बनती है तो उसमें चाय जनजाति के विधायकों की भी अहम भूमिका होती है. राजनीतिक रूप से ऐसी निर्णायक हैसियत होने के बावजूद राज्य के चाय मजदूरों को आज़ादी के सात दशक बाद भी गुलामों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. जब वे अपने हक की मांग करते हैं तो उनके ऊपर नृशंस हमले ही किये जाते हैं और उनको कुचलने की कोशिश की जाती है.

जिस तरह कांग्रेस के शासनकाल में चाय मजदूरों को शोषण और दमन का शिकार होना पड़ रहा था, उसी तरह अब भाजपा के राज में उन्हें अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है. राज्य सरकार के श्रम विभाग की कमजोरी के चलते चाय मजदूरों को अपने मौलिक अधिकारों से भी वंचित होकर जीना पड़ रहा है. यह किसी विडंबना से कम नहीं कि जब राज्य के मौजूदा श्रममंत्री चाय मजदूरों के प्रतिनिधि हैं, तब चाय मजदूरों पर ढाए जा रहे जुल्मों-सितम को रोक पाने में वह असफल रहे हैं. चाय मजदूरों को कुचलने की घटनाएँ पहले की तुलना में बढ़ती ही जा रही है. 

पिछले दिनों गोलाघाट जिले के बोगीधला चाय बागान में जब चाय मजदूर अपने हक की मांग करने गए तो उन पर बेरहमी के साथ गोलियां बरसा दी गई. दर्जनों मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गए. इस घटना के साथ ही चाय बागान मालिकों और श्रम विभाग के बीच सांठगांठ भी उजागर हो गई है. गौरतलब है कि बीते 13 दिसम्बर को बोगीधला चाय बागान के मजदूर अपनी मांगें लेकर बागान के मालिक के आवास पर पहुंचे थे. पिछली दुर्गापूजा के समय मालिकों ने चाय मजदूरों को बीस फीसदी बोनस नहीं दिया था. पूजा के बाद श्रम विभाग, बागान प्रबंधन और चाय मजदूर संगठन के बीच बातचीत में इस बात पर सहमति बनी थी कि 12 दिसंबर से पहले प्रबन्धन बोनस का कुछ हिस्सा मजदूरों को देगा. लेकिन निर्धारित तिथि तक बोनस के रुपये नहीं मिलने पर चाय मजदूर 13 दिसंबर को गुहार लगाने के लिए मालिकों के आवास तक पहुँच गए और बोनस तथा मजूरी की मांग करने लगे. इस बात से क्रुद्ध होकर बागान के मालिक सुधीर राय और समीर राय ने मजदूरों पर गोलियाँ बरसवा दी. इस तरह 15 मजदूर घायल हो गए. इनमें कई घायलों की हालत संकटजनक थी और उनको इलाज के लिए जोरहाट मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती किया गया. इस घटना को लेकर राज्य भर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई. पुलिस ने चाय बागान मालिक सुधीर राय और समीर राय को गिरफ्तार कर लिया. मजूरी की मांग करने पर गोली मारने की इस घटना के खिलाफ राज्य के चाय बागानों में मजदूरों ने खुलकर विरोध प्रदर्शन किया.

इस घटना से यह तथ्य सामने आया कि श्रम विभाग की ढिलाई के चलते बोगीधला चाय बागान का प्रबन्धन मजदूरों को लम्बे समय से उनके हक से वंचित करता आ रहा था. यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी होती है कि वह चाय मजदूरों को समय पर मजूरी दिलवाए. श्रम विभाग ही मजदूरों को मजूरी, बोनस और भविष्य निधि का समय पर भुगतान सुनिश्चित करता है और जो बागान प्रबन्धन ऐसा नहीं करते उनके खिलाफ वह कार्रवाई भी करता है. चाय मजदूरों का आरोप है कि राज्य की भाजपा सरकार के श्रम मंत्री पल्लब लोचन दास भले ही चाय मजदूरों के वोट से जीतकर आये हैं, लेकिन वे मजदूरों की जगह मालिकों के हितों की अधिक परवाह करते हैं. बागान मालिकों से सांठगांठ के चलते ही वह श्रमिक विरोधी रवैया अपनाते रहे हैं. 

राज्य भर में चाय बागानों के मजदूरों को समय पर न मजूरी मिल रही है न राशन. दस से ज्यादा चाय बागानों को उनके मालिकों ने घाटा दिखाकर बंद कर रखा है, जिसकी वजह से सैकड़ों मजदूरों के सामने फाकाकशी की नौबत आ चुकी है. बराक घाटी के चाय बागान में भूख और बीमारी के चलते मजदूरों की मौत होती रही है. भुवनवैली चाय बागान में कई मजदूर भूख के चलते मर गए थे. राज्य के 294 चाय बागानों में मजदूरों के लिए कोई चिकित्सालय नहीं है. राज्य के चाय बागानों में अभी भी स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टर के 228 पद, नर्स के 115 पद, फार्मासिस्ट के 124 पद और स्वास्थ्य सहायक के 163 पद खाली हैं. इससे साफ़ जाहिर होता है कि चाय मजदूरों को मजूरी और बोनस से तो वंचित होना ही पड़ रहा है, उन्हें उचित इलाज की सुविधा भी नहीं मिल पा रही है.

इसी तरह असम सरकार के उपक्रम असम चाय निगम के अधीन बागानों में भी लम्बे समय तक मजदूरों को राशन से वंचित रखा गया था. जब सरकार का रवैया ऐसा हो तो बागान मालिकों को श्रम कानूनों का उल्लंघन करने में आसानी होती है. राज्य में चाय मजदूरों की तादाद 7,55,029 है. इनमें 3,85,612 स्थायी श्रमिक हैं और 3,69,417 अस्थायी श्रमिक हैं. यानी आधे चाय मजदूर अस्थायी हैं जो स्थायी मजदूर के समान ही मेहनत करते हैं, फिर भी उन्हें तमाम सुविधाओं से उनको वंचित रखा गया है.

बोगीधला चाय बागान की घटना के बाद विभिन्न चाय बागानों के मजदूर अपनी व्यथा को लेकर प्रदर्शन करते रहे हैं. जिन बागानों में तालाबंदी कर दी गई है, उन बागानों के मजदूरों के सामने जीविका का संकट पैदा हो गया है. 

राज्य में हक की मांग करने वाले चाय मजदूरों का बर्बरता पूर्वक दमन पहले भी किया जाता रहा है. 29 सितम्बर 2003 को तिनसुकिया जिले के खोवांग चाय बागान के मजदूर जब बीस फीसदी बोनस की मांग कर रहे थे तब पुलिस ने गोली चलाकर पांच मजदूरों को मार डाला था. वर्ष 2013 में शोषण के शिकार मजदूरों ने तिनसुकिया जिले में ही एक बागान मालिक मृदुल भट्टाचार्य को पत्नी समेत जलाकर मार दिया था.

असल में चाय मजदूरों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखने का जो सिलसिला अंग्रेजों के जमाने में शुरू हुआ था, वह आजाद देश में भी जारी है. वर्तमान समय में चाय मजदूरों का प्रतिनिधित्व दो सांसद और कई विधायक कर रहे हैं. लेकिन वे मजदूरों के अभिशप्त जीवन को बदलने की कोई कोशिश करते नजर नहीं आ रहे हैं. 


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