सज़ाओं की हमारी आचार-संहिता

विविध , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Our Code of Conduct for punishments

विजय किशोर मानव

आज बचपन की घटनाएं याद करता हूं तो बड़ा फर्क दिखाई देता है तब और अब में. तब करीब-करीब हर बात के लिए सज़ा तय थी. शरारतों की सज़ा, न पढ़ने की सज़ा, पढ़ाई में गलतियों की सज़ा या फिर पढ़ाई में फिसड्डी रह जाने की सज़ा कुछ अलग थी. तो, किसी से मुंहजोरी करने की, किसी का सामान चुराने की, जानवरों को मार डालने की सज़ा कुछ और थी. ये सज़ाएं मिलती थीं गलती के अनुपात में. यानी गलती कम तो सज़ा कम और गलती ज्यादा तो सज़ा भी ज़्यादा. इन गलतियों पर सज़ा का फरमान तो ऐसे ही जारी होता था जैसे वे सचमुच की सज़ाएं हों, अपील भी करीब-करीब नहीं ही होती थी. लेकिन, हर सज़ा एक रचनात्मकता लिए होती थी. 

बौद्धों में एक परंपरा थी. यदि किसी ने कोई भूल या ग़लती की तो उसे महात्मा बुद्ध की सीखें पत्थरों पर उकेरने की सज़ा दी जाती. ज़ाहिर है कि यह सज़ा गलती के अनुपात में होती थी. इसी के अनुसार किसी को दो-चार दिन तो किसी को महीनों-वर्षों तक यही करना होता था. बौद्धों की यह परंपरा असल में उस दौर की सामाजिक परंपरा थी. पढ़ाई की गलतियों की सज़ा के तौर पर शिक्षक,  छात्रों से उस गलती को ठीक करके सैकड़ों बार लिखवाते. फिसड्डी रह जाने पर या पिछड़ने पर मेधावी छात्र से सज़ा दिलवाने की भी परंपरा थी. ताकि फिसड्डी छा़त्रों को ग्लानि का अनुभव कराया जा सके. इसी तरह शरारतों पर मुर्गा बनाकर या उठक-बैठक कराकर अनिवार्य व्यायाम के ज़रिये सज़ा दिलाने जैसी परंपराएं हमारे समाज में करीब-करीब हर क्षेत्र और वर्ग में व्याप्त थीं. अप्रत्यक्ष रूप से ये सज़ाएं, सज़ा पाने वाले के लिए हित और लाभ करने वाली थीं. 

मैं सातवीं या आठवीं कक्षा में पढ़ता होऊंगा. एक सुबह मैने किसी के रोने का स्वर सुना शायद कोई महिला थी.  वह बड़े ही कातर स्वर में कुछ विलाप सा करते हुए रोए जा रही थी. मां जैसे जानती थीं कि वह क्यों आई है, क्यों रो रही है और क्या मांग रही है. मां के बहुत रोकने पर भी हम नहीं माने और कई बच्चे उसे घेर कर तमाशबीनों की तरह देखने लगे. समझ आया कि वह रोते हुए उद्घोष कर रही थी कि उसने गाय मार डाली है. बाद में मां ने बताया कि वह प्रायश्चित्त करने हत्याहरण (नैमिषारण्य) जा रही है. प्रायश्चित्त के सामाजिक नियमों के तहत इसे अपने अपराध का उद्घोष करते हुए भिक्षा मांगकर एकत्र धन से ही भोजन और यात्रा का ख़र्च उठाना है. तभी वह समाज के लिए स्वीकार्य होगी. यह नियम स्त्री-पुरुष सभी के लिए था. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जानवर से लेकर मनुष्य तक की हत्या का अपराध किसी के न देखने पर भी व्यक्ति स्वतरू ही स्वीकार कर लेता था और समाज द्वारा निर्धारित सज़ा भुगतने चल देता था. क़ानून और अदालत यहां कहीं बीच में नहीं थे. असल में यह व्यक्ति और समाज को पवित्र बनाए रखने का अपने आप चलते रहने वाला मेकैनिज़्म था. यह हमारी मूल्यवान चीज़ों और जीव-जन्तुओं की रक्षा के साथ ही कुछ भी गलत करने से डरते रहकर, अपने आप को बेदाग़ नागरिक बनाए रखने की व्यवस्था थी. 

आज हालत डरावनी लगती है. जीव-जन्तु, नदी-तालाब-समुद्र से लेकर हवा और खाने-पीने में विष घोलते आदमी में भीतर और बाहर की आंखें बुझ सी गई हैं. अपनी चवन्नी के आगे, सगे से लेकर राजा और प्रजा तक किसी की जान लेना भुनगा मारने जैसा हो गया है. कहीं कोई अफसोस, कोई प्रायश्चित्त नहीं. बल्कि अब तो हत्या करके उसी लाश पर बहशियों की तरह नंगा नाच करने का चलन आम होता जा रहा है. अप्रत्यक्ष होने के कारण सोशल मीडिया पर कुंठाएं खुलकर खेलती हैं. किराए पर प्रायोजित शाब्दिक और वैचारिक अराजकता भी इसी खोल में छिपी रहती है. राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हों या वैचारिक विरोधी, हम बातचीत तक में हिंसक हो उठते हैं. इतिहासों तक से रूठे हैं तमाम लोग. ऐतिहासिक घटनाओं, पात्रों और निर्णयों पर हमारी प्रतिक्रिया, वर्तमान में आग लगाने और मरने-मारने पर जा ठहरती है. अपने विचारों को लेकर हमारी कट्टरता भीड़ जुटाकर लोगों को मार डालने से ही संतुष्ट होती है. दमनकारी हिंसक और कत्लेआम करने वाले लुटेरों की छाया हम पर शायद इसीलिए प्रभावी होती जा रही है क्यांेकि हमें याद नहीं रह गया है कि मारना किसी को भी मरने के रास्ते पर ले जाता है. ग़लत और सही का विवेक न रहे तो हम परंपराओं और संस्कारों की अनदेखी करते हैं. तब फिर भला हमें अपने ही घर-परिवार और समाज में व्याप्त सज़ाओं की यह आचार-संहिता क्यों कर दिखाई देगी. यह उल्लेख अपने बीते कल को ग्लोरीफाई करने के लिए नहीं है. लेकिन इतिहास और परंपरा,  हमारे सुखी भविष्य के सबक सीखने के लिए तो ज़रूरी हैं ही. 

युधिष्ठिर से यक्ष, प्रश्न पूछता रहा और वह उत्तर देते रहे. एक-दो नहीं एक सौ इक्कीस प्रश्नों के उत्तर दिए युधिष्ठिर ने. अपने मरे पड़े भाइयों की लाशों के सामने बैठे धर्मराज ने अपना धैर्य एक बार भी नहीं खोया. यक्ष ने विश्व और ब्रह्माण्ड के, धर्म और नीति के, राज-काज और लोक-व्यवहार तथा ज्ञान-विज्ञान के सारे प्रश्न पूछे. सारे उत्तरों से संतुष्ट भी हुआ. लेकिन, अंतिम प्रश्न ज्ञानी राजा और धर्मराज युधिष्ठिर के आचरण को जानने के लिए था. राजा में ज्ञान के साथ आचरण भी तो होना चाहिए. सब कुछ जानने वाला भी तो आचरण में निकृष्ट और स्वार्थी हो सकता है. राजा युधिष्ठिर के उत्तर से संतुष्ट यक्ष ने कहा कि अब आप न केवल पानी पी सकते हैं बल्कि साथ ले भी जा सकते हैं और  साथ ही अपने एक भाई को जीवित करा सकते हैं. किसे जीवित करूं? यह यक्ष का गूढ़ प्रश्न था जो प्रश्न लगता ही नहीं. छोटे माद्रीपुत्र का जीवन मांगकर उन्होंने साबित किया कि वह उत्तर, सिर्फ ज्ञान के स्तर पर नहीं आचरण के स्तर पर दे रहे थे. तभी यक्ष ने प्रसन्न होकर सभी भाइयों का जीवन लौटाया. 

 सबके लिए स्पेस बनाने वाले शासक चाहिए तो सबको स्पेस देने वाले नागरिक भी चाहिए. एक देगा तभी दूसरे को मिलेगा,  यह दूसरा आप भी हो सकते हैं. यह आचरण में फिर से शामिल हो सकता है अगर हम अच्छा करके निर्भय और बुरा करते हुए भयभीत रहें. बुरा करने की जिम्मेदारी उठाएं. अभी तो यह कानूनन और ज़ोर-ज़बरदस्ती करके दिलाना पड़ता है. ज़रूर हम अपने ईश्वर को पहचानना भूल गए हैं. शायद एक बच्ची की कथा से आपको कोई प्रेरणा मिले-चार साल की एक छोटी बच्ची कई दिनों से अपने माता-पिता से ज़िद कर रही थी कि वे उसे अपने नवजात भाई के पास अकेला छोड़ दें. लेकिन, माता-पिता को तरह-तरह की आशंकाएं थीं. आखिर कई दिनों तक उसके व्यवहार पर नज़र रखने के बाद उन्होंने बच्ची को नवजात के साथ अकेले कमरे में छोड़ दिया. फिर छिपकर उसे देखते रहे. उन्होंने देखा कि बच्ची ने नवजात का चेहरा अपने चेहरे से सटाया और बोली-छोटे बच्चे मुझे बताओ भगवान कैसा दिखता है. अब मैं भूलने लगी हूं. 


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