मिथकों में वाद्ययंत्र एवं उनकी रचना

विविध , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Musical instruments and their compositions in myths

जयश्री सिंह

पूर्वोत्तर की बोड़ो, आदि, मिजो, खासी, राभा, नंगामी, पैते तथा कोकबोराक जैसी प्रमुख जनजातियों के लोक साहित्य में विषयों की विविधता के साथ लोककथाओं का भंडार दिखाई देता है. ये लोककथाएँ मानव मनोरंजन मात्र की वस्तु नहीं अपितु इनमें गंभीर विषयों पर विचार किया गया है. लोककथाओं की कथावस्तु पर विचार करने मात्र से ही इनकी बौद्धिक क्षमता, ज्ञान-भंडार, वैचारिक स्तर, जीवन मूल्य एवं मानसिकता का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जा सकता है. 

इनमें कथावस्तु के स्रोतों के रूप में ब्रहमांड की उत्पत्ति, पृथ्वी और सृष्टि की रचना, मानव जाति एवं विविध जनजातियों की उत्पत्ति, संसार में बुराइयों का जन्म, प्रमुख देवी-देवता एवं पूजा का आरंभ, सूर्य-चंद्र, परंपरा-मूल्य, रूचि-कौशल, वाद्ययंत्रों की रचना, वीर एवं प्रेम गाथाएँ तथा मानवीय मनोविज्ञान से जुड़े अन्य कई विषयों को केंद्र में रख कर लोककथाओं का गठन किया गया है. 

इस समाज में पूजा और वाद्ययंत्रों का अटूट संबंध है. पूजा में वाद्ययंत्रों का विशेष महत्व है. वाद्ययंत्रों के बिना पूजा की कल्पना संभव नहीं. बांसुरी, सेर्जा, ढोल, झांझ जैसे वाद्ययंत्र एक प्रकार से पूजा-पाठ अथवा धार्मिक उत्सवों के पूरक बनकर आते हैं. इसलिए पूजा के आरंभ के साथ ही इन जनजातियों में वाद्ययंत्रों की रचना से जुड़े कई मिथक सामने आते हैं. इनमें प्रमुख रूप से बाँसुरी से जुड़ी कथाएँ बोड़ो और राभा दोनों जनजातियों में मिलती हैं. बाँसुरी को बोड़ों में सिफुंग तथा राभा में कार्हा नाम से जाना जाता है. बोड़ो मान्यता के अनुसार बहुत समय पहले गड़ेरियों का एक दल चरागाह में अपने मवेशी चराने आया करता था. जब तक मवेशी घास चरते वे सभी गड़ेरिये मिलकर तरह-तरह का खेल खेलते. जब खेल समाप्त करने का समय आता तो प्रत्येक गड़ेरिया वेदी पर एक टिड्डे की बलि चढ़ाकर भगवान की पूजा करता. अंत में उनके दल का नेता अपने हिस्से के टिड्डे की बलि देकर पूजा संपन्न करता. एक बार एक गडे़रिया दुर्भाग्यवश टिड्डा नहीं पकड़ पाया. इससे दल का नेता उस पर कुपित हो गया. उसने व्यंग्यपूर्ण मजाक में कहा कि टिड्डे की जगह उसी की बलि चढ़ा दी जाए. यह सुनते ही अन्य साथियों ने उसे पकड़कर उसकी बलि चढ़ा दी. जैसे ही उसका सिर धड़ से अलग हुआ सब ने जोर से हर्ष ध्वनि प्रकट की और भगवान की वेदी पर खूब नाचे. मान्यतानुसार उसी समय एक वृद्ध व्यक्ति के रूप में उनके सबसे बड़े देवता बोराई बाथौ वहाँ प्रकट हो गये. उस देवता ने उनसे पास वाली नदी के किनारे से सरकंडे की डंठल और एक केकड़ा लाने को कहा. आदेशानुसार उन्होंने दोनों चीजें प्रस्तुत की. देवता ने उस डंठल के एक सिरे पर एक छोटा सा छेद कर दिया तथा दूसरे सिरे पर केकडे़ को रखा. केकड़े के पकड़ते ही दूसरे सिरे पर पाँच छोटे-छोटे छिद्र बन गए. इसके बाद उसने दल के नेता को उस पहले छिद्र से बांसुरी बजाने को कहा. जैसे ही उसने फूँक लगाई, उसमें से एक मधुर संगीत-ध्वनि फूट पड़ी और बूढ़ा वहाँ से गायब हो गया. बोड़ो लोगों का विश्वास है कि इस प्रकार प्रकट होकर स्वयं उनके देवता ने उन्हें सिफुंग बनाने की विधि सिखाई.

राभा जनश्रुति के अनुसार सबसे बड़े देवता रिसी बॉय ने दैवी गुण संपन्न चार नवयुवकों की सृष्टि कर उन्हें पृथ्वी पर जा कर लोगों को संगीत शिक्षा देने का आदेश दिया. उन्होंने उन नवयुवकों को किसी भी प्रकार के आमोद-प्रमोद से बचे रहने के लिए सतर्क किया. उन सुंदर युवाओं ने भी उन्हें किसी मोह जाल में न फँसने व उनके आदेश का पालन करने का वचन दिया. वे पृथ्वी पर उतरे लेकिन मोह जाल में फँसे बिना न रह सके. उन्होंने नदी किनारे कुछ सुंदर कन्याओं को जल भरते हुए देखा. वे नवयुवतियाँ किसी ब्याह समारोह के लिए वहाँ पानी लेने आयीं थीं. उन कन्याओं के सौंदर्य सम्मोहन में वे अपनी सुधि खो बैठे. इस प्रकार रिसी बॉय के आदेश की अवलेहना के दोषी ये नौजवान दंड स्वरूप बाँस के पेड़ के रूप में परिवर्तित हो गये. माना जाता है कि उन्हीं चारों में से एक संगीत वाद्ययंत्र के प्रयोग में सिद्धहस्त था. उसी के शरीर से बने बाँस से कार्हा (बाँसुरी) नामक वाद्ययंत्र बना. राभा लोगों का मानना है कि यह यंत्र उन्हें उनके ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ है. बांसुरी (सिफुंग) इस समाज का सबसे प्राचीन एवं प्रचलित वाद्ययंत्र है. चाहे दुख हो या सुख, आनंद-उत्सव हो या पूजा-पाठ हर स्थिति में बांसुरी का प्रयोग देखने में आता है. 

खासी लोककथा ‘यू मनिक रायतोंग’ के अनुसार अपने कबीले के तबाह जो जाने के बाद जंगल में अकेला बचा युवक रायतोंग रात्रि के समय नहा धो कर अपनी पुश्तैनी पोषाक पहन लेता और सारी रात अपने सगे संबंधियों को याद करता हुआ अत्यंत करूण स्वर में बाँसुरी बजाता. ऐसे ही एक करूण प्रसंग से बोड़ो समाज में सेर्जा नामक वाद्ययंत्र की रचना की मार्मिक कथा मिलती है. धनसिं-मानसिं दोनों भाइयों में से बड़ा भाई धनसिं दूर देश का राजा बन गया. मानसिं अपने भाई को खोजता हुआ वहाँ पहुँचा लेकिन धनसिं उसे भूल चुका था. मानसिं का जीवन अपने भाई की गोशाला में मवेशियों के संग चरवाहे की तरह बीतने लगा. भाई के भूल जाने का उसे बड़ा दुख था. कई बार आधी रात में वह उठ बैठता और भगवान से प्रार्थना करता कि वे उसका दुख दूर कर दें. चरागाह में सिजौ का एक बड़ा पेड़ था. अपने मवेशियों के साथ वह इसी पेड़ के निकट सोता और दुख भरे गीत गाता. एक बार वह उस पेड़ के नीचे सो रहा था तभी उसने एक स्वप्न देखा. स्वप्न में सिजौ पेड़ उसे कह रहा था कि वह उसे काटकर चार तारों वाला एक वाद्यायंत्र बनाए और उसे बजा कर दूसरों को अपनी कहानी सुनाए. ऐसा करने से उसे उन कष्टों से मुक्ति मिल जायेगी. उसे तीन दिन लगातार यही स्वप्न आया. अगली सुबह वह कुल्हाड़ी लेकर सिजौ पेड़ के पास गया तथा उसे प्रणाम कर अपने दुख को काटने के लिए उस पेड़ को काट गिराया. उसने पेड़ की लकड़ी से वाद्ययंत्र बनाना आरंभ कर दिया. उस यंत्र को पूरा करने में उसे जो-जो वस्तुएँ लगती उसका निर्देश उसे हर रात सपने में मिलता रहता. उसने आदेश का पालन कर सारस पक्षी की गलथैली, उड़ने वाले घोड़े की पूँछ के बाल तथा वाद्ययंत्र में लगने वाला गोरय नामक एक छोटा भाग ओडाल नामक पेड़ की लकड़ी से तैयार कर लिया. वाद्ययंत्र के सभी भाग मिल जाने पर सेर्जा की रचना पूरी हो गयी. सेर्जा बजाकर मानसिं अपने दुःख भरे गीत गाने लगा. वह बचपन से लेकर अपनी वर्तमान दुखद स्थिति की दास्तान अत्यंत सुरीले एवं करूण स्वर में सुनाता और लोग सेर्जा वाद्य और उसकी मोहक आवाज के सम्मोहन में अपना आपा खो बैठते. जल्द ही उसे भाई के सामने गीत गाने का अवसर मिल गया. सेर्जा के माध्यम से गाये गीतों से भाई ने उसे पहचान लिया और उसे आधा राज्य प्रदान किया. बोड़ो लोगों का विश्वास है कि चार तारों वाले वाद्ययंत्र सेर्जा की रचना उसी मानसिं नामक व्यक्ति ने की.

इस प्रकार सेर्जा और सिफुंग ये दोनों वाद्ययंत्र पुराने समय से लेकर अभी तक प्रचलन में बने हुए हैं. इन वाद्ययंत्रों को बनाने तथा बजाने की कला उनके भगवान ने उन्हें प्रदान की है. इसलिए वे इन वाद्ययंत्रों को ईश्वर का कृपा प्रसाद मानते हैं और पूजा उत्सवों में इन वाद्ययंत्रों का प्रयोग कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-उत्सवों में अपने ईश्वर के समक्ष ये वाद्ययंत्र बजा कर एक प्रकार से वे अपने भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं. 


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