दीक्षांत के बिना अशांत शांति निकेतन

विविध , , मंगलवार , 31-10-2017


Disturbed without conviction, Shanti Niketan

प्रभात पाण्डेय

हाल ही में नॉबल पुरस्कारों की घोषणा के गुजरे ख़ुशनुमा मौसम में आँखों के सामने उस तमगे की अजीबोगरीब चमक का आ जाना स्वाभाविक था जो 1913 में साहित्य के लिए इस पुरस्कार का कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर का हासिल था. इस पुरस्कार की राशि से रवीन्द्रनाथ ने 1921 में ‘विश्व-भारती’ की स्थापना शांतिनिकेतन में की.

दरअसल, शांतिनिकेतन की कहानी की शुरुआत 1863 में होती है जब सिलइदाहा के जमींदार बाबू सितिकांत सिन्हा ने कलकत्ता से तकरीबन 170 किलोमीटर दूर बीरभूम जिला में बोलपुर के पास के एक गांव में सात एकड़ का एक भूखंड कविगुरु के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर को आश्रम वनाने के लिए दिया. देवेन्द्रनाथ हिंदू दार्शनिक एवं धर्म-सुधारक थे. 1848 में स्थापित ‘ब्रह्मसमाज’ के संस्थापकों में भी उनका नाम है. ब्रह्मसमाज की बैठकों में आज भी वेदों और उपनिषदों का पाठ होता है. 

सितिकांत सिन्हा द्वारा दिए भूखंड पर बने देवेन्द्रनाथ टैगेर के आश्रम परिसर में रवीन्द्रनाथ ने 1901 में एक सहशिक्षा विद्यालय खोला जिसमें शुरू के दिन मात्र पाँच छात्र थे. इसके साथ ही साथ रवीन्द्रनाथ वहीं एक ‘हिंदू मेला’ का भी आयोजन करने लगे, जो वहाँ के निवासियों में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ और राष्ट्रीय गतिविधियों का केंद्र बन गया. नतीजतन वहाँ महाविद्यालय बनाने के लिए पास के सटे सुरुल और तालजोर गांव के जमींदारों ने अपनी जमीन आश्रम को बेचनी शुरू कर दी. महाविद्यालय बना - विश्व-भारती महाविद्यालय – जिसका उद्घाटन 21 दिसम्बर 1921 को हुआ. तीस साल बाद 1951 में विश्व-भारती को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ. आज 66 साल बाद विश्व-भारती हजारों छात्र-छात्राओं के लिए ज्ञानोपार्जन का बरगद बनकर खड़ा है. वैसे भी खुले मैदान में पेड़ के नीचे माटी पर बैठकर पढ़ने-पढ़ाने का अनोखा विरासती रिवाज है. यहाँ आज भी छात्र-छात्राओं को अपने अध्यापकों के साथ पेड़ की छांव में पढ़ते हुए देखा जा सकता है.

अलावा इसके, एक और बात विश्व-भारती को देश के अन्य विश्वविद्यालयों की कतार से अलग खड़ा करती है. यह देश का अकेला विश्वविद्यालय है जिसके कुलपति देश के प्रधानमंत्री होते हैं. विश्व-भारती के दीक्षांत समारोहों में प्रधानमंत्री की उपस्थिति बतौर कुलपति अपेक्षित है.

लेकिन 9 अक्तूबर 2017 के ‘द टेलेग्राफ’ में छपी एक ख़बर के शीर्षक – वेट फॉर पीएम सिंक्स ट्रेडिशन - ने चौंका दिया. 

दरअसल, विश्व-भारती की परम्परा दीक्षांत समारोह में छात्र-छात्राओं को डिग्रियाँ देने की रही है. यह समारोह कुलपति की मौजूदगी में होता है. अगर कुलपति खुद नहीं आ सकते हैं तो उनके अधिकृत प्रतिनिधि की मौजूदगी में, जैसा कि दिसम्बर 2013 में हुआ था, यह कार्यक्रम संपन्न होता है. तत्कालीन कुलपति-सह-प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह उस दीक्षांत समारोह में नहीं आ सक रहे थे इसलिए उन्होंने पश्चिम बंगाल के तब के राज्यपाल एम के नारायणन को बतौर अपना प्रतिनिधि भेजा था. 2013 के बाद विश्व-भारती दीक्षांत समारोह आयोजित नहीं कर सकी है क्योंकि विश्वविद्यालय द्वारा कई बार केंद्र के मानव-संसाधन-विकास मंत्रालय तथा पीएमओ को लिखने के बावजूद वहाँ से कोई सूचना नहीं मिली कि प्रधानमंत्री के लिए कब आना संभव हो सकेगा. विश्वविद्यालय के स्थानापन्न उप-कुलपति स्वपन कुमार दत्त ने खुद इसी साल दिल्ली में अप्रैल में हुई मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री को इसकी याद दिलाई थी और प्रधानमंत्री ने कहा था कि उन्हें दीक्षांत समारोह का लंबित रहना पता है. लेकिन स्थिति नहीं बदली.

विश्व-भारती की परिक्षाओं के नतीजे अगस्त तक आते हैं और उसके बाद के कुछ महीने डिग्रियाँ तैयार करने में लग जाते हैं. इस तरह 2013 में उत्तीर्ण हुए छात्रों को भी उस साल के दिसम्बर में हुए दीक्षांत समारोह में डिग्रियाँ नहीं दी जा सकी थीं. फिलहाल तकरीबन 15 हजार छात्र-छात्राओं में डिग्रियाँ वितरित करने को हैं. लेकिन प्रधानमंत्री की तरफ से कोई सूचना न मिलने के कारण दीक्षांत समारोह की तारीख़ तय करना मुश्किल रहा. डिग्रियों के न मिलने के कारण छात्र-छात्राओं को आगे की पढ़ाई करने या नौकरी पाने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि कुछ कम्पनियाँ या विश्वविद्यालय अनंतिम डिग्रियाँ स्वीकार नहीं करते हैं. ऐसे में मानव-संसाधन-विकास मंत्रालय, यह स्पष्ट करते हुए कि यह बताने का अधिकार पीएमओ का ही है कि प्रधानमंत्री दीक्षांत समारोह के लिए कब उपलब्ध हो सकेंगे और मंत्रालय पीएमओ तक को इस विषय में कोई अनुस्मारक नहीं दे सकता, विश्वविद्यालय को बिना दीक्षांत समारोह आयोजित करते हुए ही छात्र-छात्राओं को डिग्रियाँ दे देने को कहा. 

नतीजतन सितम्बर से बगैर दीक्षांत समारोह के डिग्रियाँ दे दी जा रही हैं. इसमें तनिक भी शक नहीं कि ऐसा होना तमाम छात्र-छात्राओं को घोर निराश किया होगा. लेकिन ऐसा होना कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व-भारती की 66 साल की परम्परा का ध्वस्त हो जाना भी है. 

इसमें शक नहीं कि इतने बड़े देश का प्रधानमंत्री होना बेहिसाब जिम्मेवारियों को निभाने का संकल्प होता है, वह भी ‘अनेकता में एकता’ के मूल भाव के साथ बिना किसी धर्म, जाति और रंग के भेदभाव के. लोग कहते भी हैं कि पद-भार सम्हालने के दिन से ही हमारे प्रधानमंत्री प्रति दिन कम से कम 18 घंटा काम करते रहे हैं, वह भी बगैर किसी अवकाश के. यह पता नहीं कि ऐसा पहली बार हो रहा है या नहीं, लेकिन लोगों की निगाह में हमारे प्रधानमंत्री स्तुत्य एवं आदर्श हैं. साथ ही उनका इस क़दर कार्यरत रहना इस संभावना को दरकिनार नहीं कर सकता कि समयाभाव बाधक है उनके खुद विश्व-भारती के दीक्षांत समारोह में बतौर कुलपति मौजूद रहने में. ऐसे में प्रधानमंत्री इतना तो जरूर कर सकते थे कि प्रावधान के तहत, और जैसा कि तब के कुलपति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया था, किसी को बतौर अपना अधिकृत प्रतिनिधि भेज देते. तब  कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व-भारती की 66 साल की परम्परा भी धराशायी नहीं होती.

वैसे प्रधानमंत्री की रोज-रोज की जिम्मेवारियाँ भी अलग-अलग किस्म की होती हैं, मसलन पद से संबंधित, गैर-दफ्तरीय, दलीय इत्यादि. समय-प्रबंधन तभी प्रभावशाली होता है जब कार्य-सूची प्राथमिकता के आधार पर बने. हमारे प्रभावशाली प्रधानमंत्री की कार्य-सूची भी प्राथमिकता के आधार पर तैयार होती होगी, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन बतौर कुलपति विश्व-भारती के दीक्षांत समारोह को अनदेखा कर उनका अपनी दलीय जिम्मेवारियों को निभाने का सिलसिला कुछ और ही कहता है. शायद यह इन दलीय जिम्मेवारियों को प्राथमिकता ही देना कहा जाएगा कि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के लिए उन्होंने अपने दल की 31 चुनावी रैलियों को संबोधित किया. इस साल उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के मद्देनजर, गो कि पहले बात यह थी कि वे 10-12 रैलियों में जाएंगे, उनके द्वारा संबोधित रैलियों की संख्या 21 तक पहुंच गयी. हिंदूस्तान टाइम्स की वेबसाइट (26 जुलाई 2017) के मुताबिक आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार मई 2014 में पदभार सम्हालने से लेकर फरवरी 2017 तक सिर्फ भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्टर या छोटे विमानों द्वारा प्रधानमंत्री 128 बार गैर-अधिकारिक कार्यों के लिए दूरदराज इलाकों में गए. उनका यह जाना उन चुनावी रैलियों को संबोधित करने के लिए था जो इनके दल द्वारा उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, असम तथा पश्चिम बंगाल में आयोजित की गई थीं. पश्चिम बंगाल की रैलियाँ 21 मार्च 2017 को हावड़ा तथा बशीरहाट में उप-चुनावों से संबंधित थीं. प्रधानमंत्री का यह दलीय जिम्मेवारी निभाना सराहनीय है, लेकिन तब शायद और सराहनीय हो जाता अगर इसी दौरान 2014 से लंबित विश्व-भारती के दीक्षांत समारोह को भी उचित प्राथमिकता मिल गई होती और कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की 66 साल की परम्परा नहीं ढहती.

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री को विश्वविद्यालयों में जाने से परहेज है. 21 सितम्बर 2017 को वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय गए थे. बाद उसके 14 अक्तूबर 2017 को पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में शरीक हुए.  

1940 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने महात्मा गांधी को लिखा था – विश्व-भारती एक पोत की तरह है जिस पर हमारे जीवन का सर्वोत्तम खजाना लदा है, और मुझे आशा है कि हमारे देशवासियों से यह विशेष देखभाल की उम्मीद रख सकता है. 

शायद इस स्वप्न की टिमटिमाहट कविगुरु की आंखों में उस वक्त भी रही होगी जब उन्होंने 7 अगस्त 1941 को अंतिम सांस ली.

9 मई 2017 को सुबह-सुबह प्रधानमंत्री ने खुद ट्विट किया था - गुरुदेव टैगोर हमेशा अपने शक्तिशाली विचार और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के लिए याद रखे जाएंगे. उनकी जयंती पर उनको श्रद्धांजलि.

बहरहाल, आज किसी के लिए भी विश्व-भारती के मायूस परिवार की तरफ देखने की हिम्मत जुटा पाना कठिन है. सच तो यह है कि परम्पराओं के बनने में काफी समय लगता है जब कि उनके भरभरा जाने में एक पल भी नहीं लगता. 


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