पुस्तक मेला या धर्म सम्मेलन?

विविध , , बृहस्पतिवार , 01-02-2018


Book fair or Religion Conference

नित्यानंद गायेन

नब्बे के दशक में, जब हम स्कूली विद्यार्थी थे, देश में आज की तरह बाबाओं की चर्चा सुर्ख़ियों में नहीं होती थी. हाँ, एक बाबा ज़रूर याद हैं – चंद्रास्वामी जिनका नाम राजीव गांधी हत्याकांड की जांच में भी सामने आया था. चंद्रास्वामी पर वित्तीय अनियमितता के भी आरोप लगे थे. वर्ष 1996 में उन्हें लंदन स्थित एक कारोबारी से जालसाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. 

बहरहाल, चंद्रास्वामी तो अब नहीं रहें किन्तु इस वक्त देश में बाबाओं की भरमार है जिनमें से बहुतेरों ने कांग्रेस के शासनकाल में ही अपना साम्राज्य फैलाया और बढ़ाया. लेकिन उस दौरान इन बाबाओं की इतनी चर्चा नहीं होती थी. हाँ, तब से अब तक लगभग सभी दलों के नेता बिना किसी भेदभाव के इन बाबाओं के यहाँ नतमस्तक होते रहे हैं. 

फिर वह दौर भी आया जब बाबा टीवी पर आने लगे ... उनके प्रवचनों में हजारों की संख्या में लोग, उनमें महिलाओं की भारी संख्या, साथ में बच्चें भी शामिल दिखने लगे. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में पूंजीवाद के लिए भारत का दरवाज़ा खुलने पर निजी टीवी चैनेलों की बाढ़ आ गई. अटल जी के कार्यकाल तक आते-आते देश में कई निजी चैनेल खुल गये - आस्था, श्रद्धा, संस्कार और न जाने किस-किस नाम से. घरेलू और कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ समय बिताने के लिए टीवी के आगे बैठ कर इन बाबाओं के प्रवचन सुनने लगीं. इस तरह टीवी पर भी इन बाबाओं का कारोबार मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बढ़ता रहा. 

टीवी पर योग सिखाते-सिखाते एक बाबा हजारों करोड़ के व्यापारी बन गए और इतने बड़े हो गए कि अब ‘राष्ट्र ऋषि’ की उपाधि भी देने लगे हैं. वैसे 2005 में इस बाबा के योग फार्मेसी के मजदूरों ने अपने शोषण के साथ दवाओं में जानवरों की हड्डियों के चूरा के साथ मानव अंगों को मिलाने का आरोप लगाया था. फार्मेसी ने 93 मजदूरों को निकाल दिया. तब वाम दलों को छोड़कर बाकि के लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस बाबा का समर्थन किया था. पर मजदूरों ने हार नहीं मानी और अपनी लड़ाई जारी रखी. सामाजिक कार्यकर्त्ता मसउद अख्तर कहते हैं कि 21 मई 2005 को हरिद्वार के श्रमायुक्त ने कंपनी प्रबंधन व मज़दूरों में समझौता करा दिया. समझौते के तहत जब दूसरे दिन मज़दूर सुबह काम पर गए तो उन्हें गेट से वापस भगा दिया गया. श्रम अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक मज़दूरों ने यह लड़ाई सीटू के नेतृत्व में लड़ी. हाई कोर्ट ने मज़दूरों को बड़ी राहत देते हुए योग फार्मेसी को आदेश दिया है कि वो 93 मज़दूरों को वापस काम पर रखे और 2005 से तेरह वर्षों का वेतन भी दे. किन्तु यह ख़बर इस बाबा से हर महीने करोड़ों का विज्ञापन लेने वाली मीडिया के गलियारों में बिला गई. एक और बाबा, जिनके दरबार में सभी बड़े नेता हाजिर होते रहे हैं, आसाराम हैं जो बलात्कार के आरोप में इन दिनों जेल में हैं. 

वैसे अब तक निश्चिंत और बेख़ौफ़ होकर अपना धंधा चलाते-बढ़ाते रहें बाबाओं की गिरफ्तारियां भी हो रहीं हैं और वे जेल भी भेजे जा रहे हैं जबकि इन बाबाओं ने भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे का खूब प्रचार और समर्थन किया. राम-रहीम अभी-अभी पकड़े गये और जेल में है. इनके करतूतों की जाँच का आदेश पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिया था. जांच के बाद जो भयावह खुलासा हुआ, वह सबके सामने है. अभी हाल ही में दिल्ली के द्वारका स्थित एक अध्यात्मिक विश्वविद्यालय में भी छापा पड़ा जहाँ से 40 लड़कियों को बचाया गया और इसके फरार बाबा की तलाश जारी है. 

इसके साथ ही दूसरी तरफ राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा हर साल आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले में पिछले तीन सालों से जेल में सज़ा काट रहें बाबाओं की संस्था के साथ-साथ अन्य समुदाय के धार्मिक संस्थाओं को भी स्टाल उपलब्ध करवाएं जा रहे हैं. जब बचपन के दिनों हम स्कूल की तरफ से इस मेले में जाया करते थे तब केवल पुस्तक प्रकाशकों के स्टाल होते थे. ऐसे में यह प्रश्न तो उठता ही है कि क्या तब बाबा लोग नहीं हुआ करते थे या देश में धार्मिक संस्थाएं नहीं होती थीं? 

वैसे प्रश्न इन धार्मिक संस्थाओं की उपस्थिति को लेकर नहीं है. मूल बात यह है कि चंद्रयान फिर मंगलयान की सफलता के बाद अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में सौ से ज्यादा उपग्रह एक बार में छोड़ने का रिकार्ड बनाने के बाद ऐसे धार्मिक संस्थाओं को इस क़दर बढ़ावा देना क्या दर्शाता है? दूसरी बात यह है कि अब जब देश में अपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से दूर रखने पर चर्चा चल रही है तब एक सरकारी संस्था द्वारा आयोजित पुस्तक मेले में जेल में सज़ा काट रहे कथित बाबाओं की संस्थाओं को स्टाल उपलब्ध कराना क्या संकेत देता है? पिछले साल तो मेले में धार्मिक जुलूस निकाला गया था शंख और करताल बजा कर. इस साल भी माहौल लगभग वैसा ही था. इन धार्मिक स्टालों पर भीड़ भी रही और इन स्टालों के प्रचार में किशोर युवतियां तक लगी हुई थीं जिन्हें पता है कि उस संस्था के संस्थापक बाबा क्यों जेल गये हैं. फिर भी वे मेले में घूम-घूम कर लोगों को बताती फिर रही थीं कि उनके पिता (बाबा) निर्दोष हैं और ईश्वर के अवतार हैं. हाँ, इस मेले में भगत सिंह, मार्क्स, और गाँधी साहित्य के प्रचार के लिए युवक-युवतियाँ नहीं दिखीं. और अंत में एक सूचना और - टीवी पर एक और नया चैलेन शुरू हो गया है ‘ज्योतिष दुनिया’ नाम से.


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