अनुकूलित सत्यों के दायरे टूटें तो बात बने

विशेष , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


The realities of customized truths are broken

कृष्ण प्रताप सिंह

इस तथ्य से शायद ही कोई असहमति व्यक्त करे कि शुरू में उम्मीद की जाती थी कि जैसे-जैसे समय बीतेगा, जम्मू कश्मीर में कड़वाहट से पैदा हुई समस्या स्वयं ही सुलझने की ओर बढ़ जायेगी. लेकिन अब, उस उम्मीद को नाउम्मीद करती हुई, जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वह और उलझती जा रही है तो इसका बड़ा कारण यह है कि उसके प्रायः सारे पक्ष अपने-अपने हिस्से के सच पर ही अड़े हुए हैं और पूरे सच से जुड़ना या बावस्ता होना ही नहीं चाहते. पिछले दिनों ऐसे अनुकूलित सत्यों की तब एक बार फिर झड़ी-सी लग गयी जब राज्य की पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार ने राज्य के कोई दस हजार पत्थरबाजों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की मंजूरी देकर कोई चार हजार को आम माफी की सिफारिश की. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने, जो राज्य की गृहमंत्री भी हैं, कहा कि ये फैसले एक समिति की संस्तुति के आधार पर परस्पर विश्वास बहाली के लिए किये गये हैं और सुरक्षा कारणों से इनके लाभान्वितों के नामों का खुलासा नहीं किया जा रहा. 

प्रसंगवश, राज्य में ऐसे कदमों की उम्मीद गत वर्ष अक्टूबर से ही की जा रही थी, जब केन्द्र सरकार ने आईबी के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को अपना वार्ताकार नियुक्त किया था और कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए वह उसके सभी पक्षों से बातचीत शुरू करना चाहती है. केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने तभी बताया था कि सद्भावना के आधार पर उन पत्थरबाजों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिये जायेंगे जिन्होंने पहली बार उसमें भागीदारी की होगी. थोड़े ही दिनों बाद इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह समिति गठित की गयी थी.

जानना चाहिए कि पिछले साल जुलाई में हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर घाटी में सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी की घटनाओं की लहर-सी आ गयी थी. तब उग्र प्रदर्शनों में सुरक्षाबलों से झड़पों में कई युवाओं की जान चली गई और कई पैलेटगन से अंधे हो गये थे. चूंकि इससे पैदा हुए हालात की पेचीदगी से निकलने का रास्ता ‘पत्थर का जवाब गोली से’ देकर नहीं निकाला जा सकता था, इसलिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने खुद राज्य सरकार से किशोरों के मामलों में सहानुभूति दिखाने को कहा था. याद कीजिए, तभी फुटबॉलर से आतंकी बनने वाले माजिद खान की ‘घर वापसी’ पर उसके खिलाफ केस नहीं दर्ज किया गया. 

लेकिन अनुकूलित सत्यों के कई पैरोकारों को ‘नामुराद’ पत्थरबाजों को इतनी-सी रियायत भी अच्छी नहीं लग रही. इन पैरोकारों में बड़ा हिस्सा उन महानुभावों का है, केन्द्र और राज्य की सत्ता में आने से पहले बीजेपी अपनी राजनीतिक संभावनाएं उजली करने के लिए जिनके हिस्से के सच को अपना बनाकर इस्तेमाल किया करती थी. तब इन महानुभावों द्वारा पत्थरबाजों का जीभर कर दानवीकरण किया और जम्मू कश्मीर से ज्यादा उसके बाहर उनका खौफ खड़ा किया जाता था. उनके बारे में इस तरह बातें की जाती थीं जैसे वे हमारा सुख-चैन छीनने के लिए किसी दूसरे ग्रह से और नहीं तो पाकिस्तानी होकर उतर आये प्राणी हों. उनमें किसी को सोचना गवारा नहीं था कि उनके साथ हुई वे कौन-सी नाइंसाफियां हैं, जिन्होंने उनको पत्थरबाज बना दिया है? वह कैसी नाराजगी है, जिसके कारण सुरक्षाबलों की गोलियों की परवाह न कर वे उन पर पत्थर फेंकने पर आमादा हो जाते हैं?

अब नियति का फेर यह कि बीजेपी के इन हमदर्दों के बोये जहर से देश के साथ बीजेपी की सरकारों को भी गुजरना पड़ रहा है. चूंकि इन सरकारों को हलाहल पीकर भी नीलकंठ बने रहने का अभ्यास नहीं है, सो वे कभी तोला, कभी माशा और कभी रत्ती होती हुई अंधेरे में तीर चलाती हुई समस्या में तरह-तरह से पांव फंसाये हुए हैं.

इसी का फल है कि कश्मीर के हालात अब न सैनिकों के लिए अच्छे रह गये हैं, न वहां की जनता के लिए. दोनों के मनों में एक-दूसरे के प्रति खड़ाकर दिया गया संदेह का पहाड़ है कि रास्ता छोड़ने को ही तैयार नहीं. इसलिए कि अपने-अपने हिस्से के सच के लिहाज से कोई सैनिकों पर पत्थर फेंकने को गलत ठहरा रहा है तो कोई सेना द्वारा किसी को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करने और पत्थर का जवाब पैलेटगन से देने को. लेकिन इन दोनों को गलत ठहराने का हौसला कोई नहीं प्रदर्शित कर रहा. 

नतीजा यह है कि कश्मीर समस्या को चुटकियां बजाती हलकर डालने के पराक्रम प्रदर्शन का वादा करके आयी नरेन्द्र मोदी सरकार के साढ़े तीन सालों में वहां आतंकी वारदातें तो बढ़ी ही हैं,  दो सौ से ज्यादा सैनिकों को अपनी शहादत से इसकी कीमत चुकानी पड़ी है. पिछले दिनों केंद्रीय गृहराज्य मंत्री द्वारा संसद में दी गयी जानकारी के अनुसार जनवरी, 2017 से 14 दिसंबर तक यानी सिर्फ एक वर्ष में 337 आतंकी हमलों में कुल 318 लोगों की मौत हुई. इस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस और सेना के 75 जवान शहीद हुए, जबकि 40 नागरिकों की जान गई.

अनुकूलित सत्यों से काम चलाने वालों को फिर भी यह स्वीकारना गवारा नहीं कि जान चाहे नागरिक की जाए या सैनिक की, उससे इंसानियत का ही नुकसान होता है. इसलिए चिंता का विषय यह होना चाहिए कि इन बेजा मौतों को कैसे रोका जाए? लेकिन इस चिंता में कहीं उनके राजनीतिक हित न गुम हो जाएं, इस डर से उनके द्वारा अभी भी सेना और नागरिकों को एक दूजे के विरोध में आमने-सामने खड़ा किया जा रहा है.

सरकारें हैं कि एक ओर सैनिकों की बहादुरी की वाहवाही लूट रही हैं तो दूसरी ओर उन्हें मौत के मुंह में धकेले जा रही हैं. एक ओर उनके बलिदान को महिमामंडित कर रही हैं तो दूसरी ओर सुविधाओं के लिए तरसा और सच्चाई उजागर करने पर दंडित करा रही हैं. उनके लोग शोपियां की उस घटना के अनुकूलन से भी बाज नहीं आ रहे जिसे लेकर राज्य पुलिस ने सेना के मेजर व जवानों के खिलाफ तो सेना ने काउंटर एफआईआर दर्ज करा रखी है. विडम्बना यह कि बड़े और संवेदनशील मुद्दों पर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो इसे लेकर चुप्पी साध ही रखी है, रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण भी चुप हैं. यह कहने के लिए वित्तमंत्री अरुण जेटली को मुंह खोलना पड़ा है कि यह सुनिश्चित करना केंद्र, राज्य सरकार, और मीडिया, सभी की जिम्मेदारी है कि सेना व नागरिकों के बीच संघर्ष नहीं हो. 

फिलहाल, किसी को नहीं मालूम वित्तमंत्री ने जो कहा उससे केन्द्र सरकार कितना इत्तिफाक रखती है. लेकिन जिन राज्यों में अफस्पा है. वहां से ज्यादतियों के अनेक प्रकरणों के उजागर होने, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और मानवाधिकारों के हनन को लेकर आवाजें उठने के बावजूद सेना को लेकर देशवासियों में जो गौरवबोध या कि प्रशंसा और आदर का भाव है, उसकी रक्षा के लिए भी ऐसे संघर्षों का टाला जाना बहुत जरूरी है. कश्मीर समस्या के हल के लिए तो है ही. दुर्भाग्य कि अपने हिस्से के सच की बन्दी जमातों को यह समझना फिर भी गवारा नहीं. 

ऐसे में केन्द्र और जम्मू कश्मीर दोनों की सरकारें समस्या के सारे अनुकूलनों, दूसरे शब्दों में कहें तो अर्धसत्यों, को मिलाकर कोई ‘पूरा, सब का या साझा’ सच सृजित कर सकें तो यह उनकी ओर से देश की बड़ी सेवा होगी. लेकिन अभी तो वे इसके लिए उत्सुक तक नहीं दिखाई दे रहीं. 

 


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