न्याय के नायकों का बागीपन!

विशेष , , बृहस्पतिवार , 01-02-2018


Rebel of justice heroes

श्रीराजेश

वर्तमान राष्ट्रवादी सरकार के रहते जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों को पहली बार मीडिया के सामने आकर कहना पड़ा- 'लोकतंत्र खतरे में है.' तब राष्ट्रवाद का नारा खोखला सा लगने लगता है. लोकतंत्र में ‘लोक’ और ‘तंत्र’ के खतरें का भय दिखा कर जब राजनीति सत्ता में आती है, तब ‘लोक’ और ‘तंत्र’ दोनों को यह भरोसा हो गया होता है कि अब लोकतंत्र सुरक्षित है, लेकिन 12 जनवरी, 2018 की उस शाम देश के 130 करोड़ भारतवासियों को फिर से बता गया कि जी, नहीं. लोकतंत्र अब भी खतरें में है. यह शाम दिगर शामों से कुछ निश्चित ही अलग थी और देश के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ रही थी कि न्याय के मंदिर ‘सुप्रीम कोर्ट’ के न्यायमूर्तियों को भी न्याय की उम्मीद में जन अदालत का सहारा लेना पड़ सकता है. यह देश के इतिहास में पहला वाकया है जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को कोर्ट के बाहर अपनी बात कहने के लिए आना पड़ा. लोकतंत्र में असहमति सीमेंट का काम करती है लेकिन बगैर रेत के सीमेंट की पकड़ भी ढ़ीली ही होती है. तब सवाल उठता है कि इन न्यायाधीशों के उक्त कथन कि – ‘लोकतंत्र खतरें में हैं’ को किस रूप में लिया जाना चाहिए. 

सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीश जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ जब एक साथ मीडिया से मुखातिब हुए तो केसरिया सत्ता के राष्ट्रवाद से लेकर लोकतंत्र के पहरूआ होने तक के दावों पर सवालिया निशान लग गया. हालांकि इन चार न्यायाधीशों की इस पहल की न केवल जूडिशियरी बल्कि पूरे देश में चर्चा हो रही है, गैर केसरिया राजनीतिक दलों की जैसे बाछें खिल गई हो. जब ऐसी स्थिति को राजनीतिक नफा-नुकसान के तराजु पर तौला जाने लगे और उसी के अनुसार आचरण होने लगे तो सही में मानना पड़ेगा कि लोकतंत्र की नींव कमजोर हो रही है. 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद पहले भी कई मामलों को लेकर चर्चा के केंद्र में आ चुका है, लेकिन मुख्य न्यायाधीश के कामकाज के रवैये को लेकर ऐसा पहली बार हुआ कि चार न्यायाधीशों ने कोर्ट की परिधि से बाहर आ कर अपनी बात रखी हो. हालांकि अभी 21 और न्यायाधीश इसी मुद्दे को लेकर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र से मिलने वाले हैं. इन पूरे मामलों को देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट के इन न्यायाधीशों का बागीपन कोई यूं ही नहीं है. मामला गंभीर जरूर है. 

जस्टिस कुरियन जो कि चार न्यायाधीशों में शामिल हैं, इस विचार पर कायम है कि सब कुछ ठीक तो सुप्रीम कोर्ट के अंदर ही होगा. चारों जजों में दो का लगभग बाकी 21 न्यायाधीशों से मेलजोल ठीक है. वहीं बाकी दो इस विषय पर दूरी बनाए हुए हैं. खबर तो यह आ रही है कि बाकी 21 न्यायाधीशों के मुख्य न्यायाधीश से मिलने का उद्देश्य इस मामले को सुलझाना है. सुप्रीम कोर्ट के चारों न्यायाधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये बात जनता के बीच रखी थी कि भारतीय लोकतंत्र को खतरा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. इन चारों जजों ने मुख्य न्यायाधीश पर ये आरोप लगाए थे कि वो रोस्टर को अपने तरीके से चला रहे थे. यानी कि किस बेंच को कौन से मामले की सुनवाई करनी है इसमें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा अपनी मनमानी चला रहे हैं.

अपने आवास पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट के नंबर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा था कि 'हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो इस देश में या किसी भी देश में लोकतंत्र ज़िंदा नहीं रह पाएगा. स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है.'

'चूंकि हमारे सभी प्रयास बेकार हो गए, यहां तक कि आज सुबह भी हम चारों जाकर मुख्य न्यायाधीश से मिले, उनसे आग्रह किया. लेकिन हम अपनी बात पर उन्हें सहमत नहीं करा सके. इसके बाद हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा कि हम देश को बताएं कि न्यायपालिका की देखभाल करें. मैं नहीं चाहता कि 20 साल बाद इस देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति ये कहे कि चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ़ ने अपनी आत्मा बेच दी है.'

सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट एक ऐसी संवैधानिक संस्था है जो केवल कानून की किताबों के आधार पर फैसला नहीं देता बल्कि वह परंपरा और नैतिकता को ध्यान में रखते हुए किसी फैसले पर पहुंचता है ऐसे में जब चारों न्यायाधीश नैतिकता के तकाजे को समझते हुए यह कहते हैं कि उन्होंने अपनी आत्मा नहीं बेची है, तब मामला कहीं और गंभीर हो जाता है. 

यूं तो रोस्टर बनाना मुख्य न्यायाधीश की ही जिम्मेदारी है लेकिन इसके तहत मामलों की सुनवाई के आवंटन में कनिष्ठों को वरिष्ठों पर वरियता देना यह साफ करता है कि इससे महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई और फैसले को निष्पक्ष होने से रोका जाना है. लेकिन यह इतना भी सरल और सहज ढंग से नहीं हो सकता. मुख्य न्यायाधीश का पद जिम्मेदारी का पद है और इस पद पर बैठे किसी न्यायाधीश से ऐसे पक्षपात की उम्मीद नहीं की जा सकती लेकिन उसी कोर्ट के चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों का इस पर सवाल उठाना न केवल देश में लोकतंत्र पर बल्कि न्यायतंत्र के भी खतरें में जाने का संकेत देता है. यह मामला केवल कुछ न्यायाधीशों का बागी होना भर नहीं कहा जा सकता. 


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