बदलते उत्तर प्रदेश के बेचारे बछड़े

विशेष , , मंगलवार , 31-10-2017


Poor calves of changing Uttar Pradesh

तारकेश कुमार ओझा

उत्तर प्रदेश के अपने गृह-जनपद प्रतापगढ़ से गांव बेलखरनाथ पहुंचने तक नवरात्र की गहमागहमी के बीच सब कुछ मनमोहक लग रहा था. लेकिन जल्द ही बिजली की कटौती ने मुझे परेशान कर दिया. रात के अंधेरे में जगह-जगह से टॉर्च की रोशनी देख अनहोनी की आशंका होने लगी. बचपन के दिनों में चोर-डाकू के साथ जंगली जानवरों का खतरा लोगों पर अंधेरा गहराते ही मंडराने लगता था. मुझे लगा कि अब भी ऐसा खतरा बरकरार है. रात भर बेचैनी रही. सुबह इसका जिक्र करने पर पता चला कि यह सब परित्यक्त बछड़ों व सांढ़ से बचाव के लिए किया जाता है. पिछले कुछ महीनों में इनकी तादाद काफी बढ़ी है. ये बछड़े या सांढ़ आवारा घूमने को अभिशप्त हो गए हैं. अंधेरा होते ही वे चारा-पानी की तलाश में गांवों में घुसने लगते हैं. पूरी रात उन्हें इधर से उधर खदेड़ा जाता है. 

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का जिक्र आते ही वहां की कानून व्यवस्था से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य, सड़कें व जल तथा बिजली-आपूर्ति व्यवस्था की बातें कौंधने लगती है. वैसे अब इस प्रदेश की पहचान तो योगी आदित्यनाथ के आभामंडल से लेकर अखिलेश यादव के खानदानी लड़ाई-झगड़े से भी होने लगी है. लेकिन इस दौरे में मैंने पाया कि वहां कई ऐसी समस्याएं हैं जो किसानों को परेशान तो कर रही है, परंतु उनकी चर्चा कहीं भी नहीं होती. हमारे राष्ट्रीय चैनल्स तो उत्तर प्रदेश के नाम पर भाजपा बनाम अखिलेश-मायावती की चर्चा करके ही टीआरपी बढ़ाने में मशगूल हैं. ¬¬¬

उत्तर प्रदेश से रोजगार की तलाश में पलायन का सिलसिला बदस्तूर जारी है. तमाम दावों के बावजूद खेती अब भी घाटे का सौदा है. विकल्पों के अभाव में खेती अधिया या तिहिया पर दी जा रही है. अगर प्राकृतिक आपदाओं को छोड़ भी दें तो अब तक खेतों में खड़ी-फसल के मुख्य शत्रु नील गाय और जंगली सुअर थे. अब परित्यक्त बछड़े और सांढ़ भी शामिल हो गए हैं जो पालकों के अभाव में इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं. पशु-वध-निषेध कानूनों के चलते पिछले कुछ महीनों में प्रदेश में मवेशियों की तादाद बेतहाशा बढ़ी है. कारण कि किसान इनके पालन-पोषण पर होने वाले अत्यधिक खर्च से पहले से ही परेशान थे, प्रजनन के बाद बछड़ों को त्याग देने का पहले से चला आ रहा सिलसिला अब बेहिसाब बढ़ा है. मशीनीकरण के चलते तो बैलों की उपयोगिता पहले ही लगभग खत्म हो चुकी थी. अब इनकी बढ़ती संख्या किसानों के लिए नई मुसीबत बन गई है. वे न तो इन्हें बेच सकते हैं, न ही अपने पास रख सकते हैं. लिहाजा इन्हें त्यागने के नए-नए तरकीब इजाद किए जा रहे हैं. सच तो यह है कि घर में बछड़े के जनमते ही मातम छा जाता है. 

बूढ़ी गायों और बछड़ों से मुक्ति का धंधा भी शुरू हो जाने की चर्चा ग्रामांचलों में सुनाई पड़ी. इनसे छुटकारा पाने का जो तरीका संज्ञान में आया वह काफी पीड़ादायक है. ग्रामीणों ने बताया कि ऐसे पशुओं को इकट्ठा कर गांव से दूर किसी नदी के दूसरी ओर ले जाया जाता है. वहां दिखावे के पूजा-पाठ के बाद उनके नाजुक अंगों पर कुछ द्रव्य का छिड़काव किया जाता है जिसकी जलन से मवेशी बेतहाशा भागने लगते हैं. इसका बुरा असर उनकी याददाश्त पर भी पड़ता है जिस कारण वे अपने पालक के घर लौटने के बजाय इधर-उधर भटकने लगते हैं. इससे पालकों को भले राहत मिलती हो, लेकिन बेचारे मवेशी कहां जाएं. नतीजतन वे भोजन-पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों में आते रहते हैं. बचाव के लिए ग्रामीण पूरी रात इन्हें इधर से उधर खदेड़ते रहते हैं. कदाचित इन्हीं कारणों से विद्युत संकट के बीच मुझे गांव में रात भर अनेकों टॉर्च जगमगाते नजर आए. 

दरअसल, सच्चाई से अनजान होने की वजह से आज के जमाने में टॉर्च की रोशनी मुझे रहस्यमयी लगी थी. मैं अनहोनी की आशंका से परेशान होने लगा. लेकिन जब मुझे पता लगा कि यह अवांछित मवेशियों को खदेड़ने के लिए किया जा रहा है तो बेचैन मन से मैंने सत्ता-समर्थकों से इस पर बात की. पता चला समस्या-समाधान की कोशिश जारी है. राज्य में जल्द ही ‘कान्हा योजना’ चलाए जाने की बात है जिसके तहत परित्यक्त गोवंश को रखा जाएगा. सुना कि इस पर होने वाले खर्च के जुगाड़ पर भी मंथन हो रहा है. 

आशा तो यही की जा सकती है कि कान्हा योजना महज योजना न रहकर जल्द से जल्द लागू हो ताकि गांव वालों के साथ-साथ इन परित्यक्त मवेशियों को भी राहत मिले. 


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