जेल बनें इंसानों के रहने लायक

विशेष , , चयन करें , 31-10-2017


Jailed mans living

पंकज चतुर्वेदी

चर्चित मुकदमों में से एक आरुषि-हेमराज हत्या प्रकरण में तलवार दंपति लम्बे समय के बाद जेल से बाहर निकले. देशभर के छोटे-मझोले अखबारों में हर दिन दो किस्म की खबरें जरूर छपती हैं - अमुक व्यक्ति इतने साल जेल में रहने के बाद अदालत से बाइज्जत बरी, और दूसरी खबर कि जेल में बंदी की मौत. विडंबना है कि ऐसी खबरों पर अब पीड़ित के परिवार के अलावा अन्य कोई विचार भी नहीं करता. 

वैसे रिहाई में ‘बाइज्ज्त’ के क्या मायने हैं. साल-दर-साल कारागार का निवास तो उसकी ज़िंदगी को उलट-पलट दिया. बाहर आने पर पुलिस के साथ-साथ समाज भी उसको संदिग्ध नजर से देख रहा है, यहाँ तक कि रोटी-कपड़ा-मकान भी उसके दिए दुर्लभ हो जाता है. यही नहीं, मामला विचाराधीन होने के बावजूद लम्बे समय की क़ैद के चलते हर दिन के तनाव उसके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह प्रभावित करती है. कहा नहीं जा सकता है कि इस कुंठा व बेइज्जती से कब उबर पाएगा. अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि जेल में विचाराधीन कैदियों की हालत बहुत बुरी है और क्षमता से कई सौ गुना ज्यादा भीड़ से भरे जेल इंसान के आत्मसम्मान के मूलभूत अधिकार पर प्रश्न चिन्ह है.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता ने उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीशों से जेल में खुदकुशी समेत सभी अस्वाभाविक मौत के मामलों में कैदी के परिवार को उचित मुआवजा देने के लिए स्वतः संज्ञान लेने के निए कहा. कोर्ट ने जेल-सुधार के लिए ‘ओपन जेल’ की व्यवस्था पर विचार करने की भी बात कही. अदालत ने कैदियों के सुधार के लिए समाज के प्रबुद्ध लोगों को शामिल कर एक बोर्ड बनाने तथा मॉडल जेल मैन्यूअल लागू करने के भी निर्देश दिए. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ये वांछनीय है कि जेलों में भी संविधान के दिए अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार को सुनिश्चित किया जाए. कोर्ट ने कैदियों की परिवार से मुलाकात, फोन व वीडियो कान्फ्रेंसिंग से जल्दी-जल्दी सुनवाई, विचाराधीन बंदियों को वकील से सतत संपर्क, पहली बार अपराध करने वालों की काउंसलिंग, जैसी कई बातें कहीं. अदालत ने कैदियों की चिकित्सा सुविधा के संबंध में कहा स्वास्थ्य का अधिकार मानवाधिकार है और राज्य सरकारों को चाहिए कि वह इस ओर ध्यान दें ताकि कैदियों को उचित मेडिकल सुविधा उपलब्ध हो. 

सुप्रीम कोर्ट के लगातार निर्देशों के बावजूद जमानत योग्य अपराधों में भी लोगों को जेल भेज दिया जाता है. यहां जानना जरूरी है कि जेल व्यवस्था में सुधार के लिए समुचित व्यवस्था हेतु बीते 35 सालों से सुप्रीम कोर्ट में कई-कई मामले चल रहे हैं. कई मामलों में कोर्ट ने निर्देश भी दिए हैं, लेकिन लचल व्यवस्था के चलते सालों-साल जेल में रहने के बाद बेगुनाह साबित होकर बाहर आने वालों का तन-मन श्रम करने लायक नहीं रह जाता. 

दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के मेरठ मंडल की जेलों के ताजे आंकड़े जरा देखें - मेरठ जेल की क्षमता 1707 है, जब कि निरुद्ध बंदी 3357 हैं. गाजियाबाद की क्षमता 1704 है लेकिन बंदी 3631, बुलंदशहर में 2300 कैदी है गो कि क्षमता है 840 की. आगरा जिला जेल की क्षमता 1015 है जबकि बंदी 2600 से ज्यादा.भारत की जेलों में बंद कैदियों के बारे में सरकार के रिकार्ड में दर्ज आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. अनुमान है कि इस समय कोई 4 लाख से ज्यादा लोग देशभर की जेलों में निरुद्ध हैं, जिनमें से लगभग 1.30 लाख सजायाफ्ता और कोई 2.80 हजार विचाराधीन बंदी हैं. पांचों केंद्रीय कारागारों में क्षमता से दुगने बंदी हैं.

यही नहीं, उत्तर प्रदेश की जेल कैदियों के लिए कब्रगाह साबित हो रही है. राज्य में कुल 62 जिला जेल, 5 केंद्रीय जेल और 3 विशेष कारागार है. यहां 2012 से जुलाई 2017 के बीच 2002 कैदियों की मृत्यु हुई. इनमें कुछ तो ऐसे मासूम हैं जिनका जन्म भी वहीं हुआ और मौत भी. मरने वालों में आधे तो विचाराधीन बंदी थे यानि जिन पर कोई अपराध साबित हुआ ही नहीं. यही नहीं, मौत का बड़ा कारण दमा और टीबी रहा है जो कि क्षमता से अधिक बंदियों के कारण संक्रमण, कुपोषण के चलते होता है. देश में दलित, आदिवासी व मुसलमानों की कुल आबादी 40 फीसदी के आसपास है, वहीं जेल में उनकी संख्या 67 प्रतिशत है. इस तरह के बंदियों की संख्या तमिलनाडु और गुजरात में सबसे ज्यादा है. हमारी दलित आबादी 17 प्रतिशत है जबकि जेल में बंद लोगों का 22 फीसदी दलितों का है. आदिवासी लगातार सिमटते जा रहे हैं व ताजा जनगणना उनकी जनभागीदारी 9 प्रतिशत बताती है, लेकिन जेल में नारकीय जीवन जी रहे लोगों में 11 फीसदी वनपुत्र हैं. मुस्लिम आबादी तो 14 प्रतिशत है लेकिन जेल में उनकी मौजूदगी 20 प्रतिशत से ज्यादा है. एक और चौंकाने वाला आंकड़ा है कि पूरे देश में प्रतिबंधात्मक कार्यवाहियों या अन्य कानूनों के तहत बंदी बनाए गए लोगों में से आधे मुसलमान होते है. गौरतलब है कि इस तरह के मामले दर्ज करने के लिए पुलिस को वाह- वाही मिलती है कि उसने अपराध होने से पहले ही कार्यवाही कर दी. आंचलिक क्षेत्रों में ऐसे मामले न्यायालय नहीं जाते हैं, इनकी सुनवाई कार्यपालन दंडाधिकारी यानि नायब तहसीलदार से लेकर एसडीएम तक करता है और उनकी जमानत पूरी तरह सुनवाई कर रहे अफसरों की निजी इच्छा पर निर्भर होती है. 

बस्तर अंचल की 4 जेलों में निरुद्ध बंदियों के बारे में ‘सूचना के अधिकार’ के तरत मांगी गई जानकारी बताती है कि दंतेवाड़ा जेल की क्षमता 150 बंदियों की है और यहां माओवादी आतंकी होने के आरोपों के साथ 377 बंदी है जो सभी आदिवासी हैं. कुल 629 क्षमता की जगदलपुर जेल में नक्सल होने के आरोप में 546 लोग बंद हैं, इनमें से 512 आदिवासी हैं जिनमें 53 महिलाएँ हैं, 9 लोग पांच साल से ज्यादा से बंदी हैं और 8 लोगों को बीते एक साल में कोई भी अदालत में पेशी नहीं हुई. कांकेर में 144 लोग आतंकवादी होने के आरोप में विचाराधीन बंदियों में 134 आदिवासी व 6 औरतें हैं जबकि इस कारागार की क्षमता 85 बंदियों की है. दुर्ग जेल में 396 बंदी रखे जा सकते हैं और यहां 4 औरतों सहित 57 नक्सली बंदी हैं, इनमें से 51 आदिवासी हैं. इस तरह केवल 4 जेलों में हजार से ज्यादा आदिवासी बंद हैं. यदि पूरे राज्य में यह गणना करें तो 5 हजार से पार पहुंचेगी. नारायणपुर के एक वकील बताते हैं कि कई बार तो आदिवासियों को सालों पता नहीं होता कि उनके घर के मर्द कहां गायब हो गए है. बस्तर के आदिवासियों के पास नगदी होता नहीं है. वे पैरवी करने वाले वकील को गाय या वनोपज देते हैं.  कई मामले तो ऐसे है कि घर वालों ने जिसे मरा मान लिया, वह बगैर आरोप के कई सालों से जेल में था. ठीक यही हाल झारखंड का भी हैं. 

यहां यह भी जानना जरूरी है कि जेल में श्रम-कार्य केवल सजायाफ्ता बंदियो के लिए होता है. विचाराधीन बंदी न्यायिक-अभिरक्षा में कहलाते हैं. भारतीय जेलों में 65 प्रतिशत से ज्यादा विचाराधीन कैदी ही हैं. जेलों में बढ़ती भीड़ अदालतों पर भी बोझ हैं और देश के मानव-संसाधन का दुरुपयोग भी. एक तो ऐसे ही कैदियों के कारण सरकार का खर्च बढ़ रहा है, दूसरे सुरक्षा एजेंसियों पर भी भार बढ़ता है. जितने अधिक विचाराधीन बंदी होंगे, उन्हें अदालत ले जाने के लिए उतना ही अधिक सुरक्षा बल चाहिए. तभी देश में हर दिन सैकड़ों मामलों में बंदी अदालत ही नहीं पहुंच पाते हैं और यह भी अदालतों में मामलों के लंबे खींचने की वजह बनता है. 

क्या यह संभव नहीं कि जिन बंदियों के मामलों में जांच पूरी हो गई हो या जिनके मामले ज्यादा गंभीर न हों, उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार किसी रचनात्मक कार्य में लगा दिया जाए. इस तरह शिक्षक, तकनीकी इंस्ट्रक्टर, यातायात संचालन-सहयोगी, अस्पताल में सहायक जैसे कई कामों के लिए कर्मियों की कमी से  निबटा जा सकता है साथ ही साथ मानव-संसाधन का सही इस्तेमाल करते हुए उसके सम्मानपूर्वक जीवन के अदालती निर्देशों का भी पालन किया जा सकता है. वैसे प्रयास तो यह भी होना चाहिए कि अपराध कम हों या गैरनियत से किए गए छोटे-मोटे अपराधों के लिए या कम सजा या सामान्य प्रकरणों को अदालत से बाहर निबटाने, पंचायती राज में न्याय को शामिल करने जैसे सुधार कानून में किए जाएं. 


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