मंदिर नहीं तो प्रतिमा ही सही

विशेष , , बुधवार , 29-11-2017


If not the temple then the statue is right

प्रभात पाण्डेय

बात 1987 की है. तारीख़ थी 25 जनवरी. सुबह के 9 बजने को थे. अयोध्या बहुत खुश थी. होती भी क्यों नहीं. उसने सुना था कि उसके राम घर-घर में दर्शन देने वाले हैं. हुआ भी यही. ठीक 9 बजे दूरदर्शन पर प्रसारण शुरू हुआ रामानंद सागर के रामायण का. उन दिनों सबके पास टेलेविज़न नहीं था. इस कारण, जिन घरों में यह था उनमें बसते परिवार अड़ोस-पड़ोस के साथ छोटे पर्दे पर इस सीरियल के कलाकारों में रामायण के बड़े-बड़े किरदारों को देखते थे. उन्हें अरुण गोविल में उनके राम दिखते थे तो दीपिका चिखालिया में उनकी सीता. यह सिलसिला जुलाई 1988 के प्रत्येक रविवार सुबह 9 से 10 बजे तक चला. वातावरण दिन पर दिन राममय होता रहा. उधर अपने विरासती सामुदायिक सौहार्द पर गौरवान्वित अयोध्या वाजिद अली शाह की पंक्तियाँ गुनगुनाती रही – 'हम इश्क के बंदे हैं, मजहब से नहीं वाकिफ़.'

अभी कुछ महीने बीते ही थे कि 1990 में अयोध्या को राम-रथयात्रा की ख़बर मिली. ख़ुशी से नाच उठी वह. लेकिन जब यह बताया गया कि यह यात्रा सोमनाथ से शुरू होगी, वह चौंक गयी – राम-रथयात्रा सोमनाथ से ! उसके मन में सवाल उठा – इस यात्रा का राम कौन? तभी एक आवाज सुनाई दी – रथ पर लालकृष्ण आडवाणी होंगे.

लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि एक शाम उन्होंने प्रमोद महाजन से गांधी जयंती या दीनदयाल उपाध्याय जयंती के दिन सोमनाथ से अयोध्या तक की पदयात्रा की इच्छा जाहिर की. इसका उद्देश्य अयोध्या मसले से लोगों को वाकिफ कराना था. आडवाणी अयोध्या में राम-मंदिर के निर्माण को लेकर केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये से नाखुश थे. उनका मानना था कि यह मुद्दा धर्मनिरपेक्षता बनाम छद्म-धर्मनिरपेक्षता का हो गया है. बहरहाल, तय हुआ कि यात्रा पदयात्रा नहीं वरन् राम-रथयात्रा होगी ताकि अधिक से अधिक राज्यों के अधिक से अधिक लोगों तक साफ-साफ संदेश पहुंचाया जा सके. तय यह भी हुआ कि दीनदयाल उपाध्याय जयंती (25 सितंबर) के दिन इस यात्रा की शुरूआत सोमनाथ से होगी और रामरथ 30 अक्तूबर को अयोध्या पहुंचेगा. लेकिन 23 अक्तूबर को वीपी सिंह की केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत बिहार की लालू प्रसाद यादव की सरकार ने बिहार से उत्तर प्रदेश में प्रवेश के समय आडवाणी को हिरासत में ले लिया.

गौरतलब है कि राम-रथयात्रा को जिस दिन को अयोध्या पहुंचना था, वही दिन वहाँ राम-मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा शुरू करने के लिए भाजपा द्वारा घोषित किया गया था. और उसी दिन अयोध्या में पंचकोसी परिक्रमा होती है. नतीजतन 30 अक्तूबर को कारसेवकों के साथ-साथ भाजपा और इसके परिवार के कार्यकर्ताओं एवं पंचकोसी परिक्रमा के लिए श्रद्धालुओं का अयोध्या में होना स्वाभाविक था. यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति थी जिसके तहत किसी भी छोटी-बड़ी अप्रिय घटना के लिए सरकार को दोषी करार देना आसान होता. हुआ भी तो यही. लेकिन इन तमाम के बावजूद अयोध्या अपने बुनियादी साम्प्रदायिक सौहार्द पर कायम रही. रामजन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी लालदास ने फरवरी 1992 में कहा था कि अयोध्यावासियों में परम्परागत शालीनता, सहिष्णुता और मर्यादा न होती तो कारसेवकों के चले जाने के बाद वहाँ के मुसलमान गरिमा और सुरक्षा के साथ न रह पाते.

बहरहाल, अयोध्या में राम-मंदिर को लेकर गतिविधियाँ चलती रहीं तभी 1992 का वो आखिरी महीना आ गया जिसने हो-गुजर रहे तमाम को एक नया मोड़ दे दिया. लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 5 दिसंबर को लखनऊ में एक जनसभा संबोधित करने के बाद वे आधी रात के आसपास अयोध्या पहुंचे. दूसरे दिन सुबह तकरीबन 10 बचे अभी वे रामकथा-कुंज की छत पर बने मंच पर पहुँचे ही थे कि किसी ने सूचना दी कि विवादी ढांचे के गुंबदों पर कुछ काररसेवक चढ़ गए हैं. यह रामकथा-कुंज की छत से भी दिखाई दे रहा था. मंचस्थ कुछ नेताओं की लाउडस्पीकर्स पर इस अपील के बावजूद कि कारसेवक नीचे उतर आएं, गुंबदों पर उनकी तादाद बढ़ती गयी और वे हाथों में लिए औजारों से गुंबदों पर प्रहार करने लगे थे. नतीजतन गुंबद एक-एक कर ढहते रहे. इस घटना से आडवाणी को दुखी देख प्रमोद महाजन ने उन्हें लखनऊ वापसी की सलाह दी और वे लोग शाम 6 बजे अयोध्या से रवाना हो गए.

तब से लेकर आज तक अयोध्या बाबरी मस्जिद के ढहने की भयावह आवाज सुन रही है और साथ ही साथ भव्य राम-मंदिर के निर्माण के गूंजते नारों की भी. यह अयोध्या की मासूमियत ही है कि वह आज तक नहीं समझ पायी है कि क्यों राम-मंदिर बनवाने का भाजपा का वादा  चुनावी मौसम में बेहिसाब गूंजने लगता है.

देखा जाए तो भाजपा का हर चुनावी घोषणापत्र अयोध्या में भव्य राम-मंदिर के सपने दिखाता है और इसके निर्माण का वादा करता है. परंतु चुनाव के बाद उसका यह वादा भी जुमला ही साबित होता है. वैसे बीते कुछ वर्षों में परिस्थितियाँ काफी बदल गयी हैं. केंद्र में भाजपा की सरकार बन गयी है और उत्तर प्रदेश में भी. ऐसे में एक तरफ रामभक्तों में यह उम्मीद बढ़ गयी है अब राम-मंदिर बन जाएगा तो दूसरी तरफ उनमें यह आशंका भी समाई हुई है कि अगर अभी नहीं बना तो पता नहीं कब बन पाएगा. भाजपा इन रामभक्तों को नाखुश करने का जोखिम नहीं ले सकती है. ऐसे में वह अदालत के फैसले के आने या राम-मंदिर के मुद्दे पर सर्वसम्मति बन जाने के इंतजार की बात करने लगी है. यह उचित है भी लगता है क्योंकि सर्वसम्मति तो सर्वसम्मति ही होती है और अदालत का फैसला सर्वोच्च. लेकिन ऐसा कहकर भाजपा निश्चिंत भी नहीं हो सकती है कि रामभक्तों का धैर्य बना ही रहेगा. 

ऐसे में लोगों को किसी भी मुद्दे से भटका देने में माहिर भजपा ने अब अयोध्या में सरयू के तट पर राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने की बात छेड़ दी है. कहते हैं कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की मंजूरी मिलते ही लगभग 100 मीटर ऊँची राम की प्रतिमा का निर्माण शुरू हो जाएगा. भाजपा का यह क़दम दशकों से राम-मंदिर का स्वप्न संजोए रामभक्तों के लिए सांत्वनादायक हो या न हो, लेकिन लोगों को यह संदेश तो है ही कि सूबे के भगवाधारी मुख्यमंत्री ने कुछ तो किया. सच तो यह है कि हथियाई राम की विरासत को भाजपा किसी हाल छोड़ नहीं सकती है क्योंकि इसका उभार और विस्तार का सरोकार राम से ही है.

अयोध्या से यह पूछने पर कि कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा राम-मंदिर न बना सकने की कसक को अब राम की 100 मीटर प्रतिमा सरयू के तट पर लगवाकर खत्म करना चाहती है, वह कुछ नहीं बोलती है. वह तो अभी भी सरयू के उस तट को निहारे जा रही है जहाँ हाल ही में छोटी दीवाली के दिन बड़ी दीवाली मनाई गई थी. उस दृश्य को याद कर अयोध्या अब भी दुखी हो जाती है जब राम का कद बड़ा होने के बावजूद उनको उस दिन सत्ता के आगे झुकना पड़ा था. अयोध्या अब भी उस दृश्य से सिहर उठती है जब उसी सरयू तट पर अयोध्यावासी दीवाली के दिन दीवाली को दीवाली की तरह मनाने के लिए उस दिन के प्रज्वलित उन एक लाख सत्तासी हजार दीयों के जले बासी तेल को बटोर रहे थे. 


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