सोच का दोहरापनःक्या सेक्स वर्कर इंसान नहीं?

विशेष , , बुधवार , 29-11-2017


Duplication of thinking Is not sex worker human

क्षमा शर्मा

हाल ही में नोटबंदी के एक साल पूरे होने पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि नोटबंदी के कारण देह व्यापार में कमी आई है. लड़कियों और औरतों की ट्रेफिकिंग भी रुकी है. आखिर किन आंकड़ों की बुनियाद पर उन्होंने ऐसा बयान दिया ? या कि यह सोच काम कर रही थी कि चूंकि लोगों की जेब में पैसे नहीं थे इसलिए वे वेश्याओं के पास नहीं जा सके. ये दुर्भाग्यशाली महिलाएं और लड़कियां तो कभी गरीबी, कभी नाते-रिश्तेदारों या पुरुष मित्रों के धोखे अथवा नौकरी के लालच के कारण इस धंधे में धकेल दी गईं. क्या उनके बारे में इस तरह का बयान शोभा देता है ? कौन लड़की ऐसी है जो इस धंधे में जान-बूझकर आई हो ? और आकर निकलना चाही हो तो निकल सकी ? अगर किन्हीं अच्छे लोगों की मदद से वह निकल भी पाई तो समाज तथा घर वालों ने तो उसे अपनाने से ही इनकार कर दिया. जिन स्त्री-पुरुषों ने इन्हें इस धंधे में धकेला, उनका तो कुछ नहीं बिगड़ा. बिगड़ा तो उनका जिन्हें यहां आने पर ही पता चला कि वे किस नरक में आ पहुंचीं. इस विषय पर अपने ही देश में न जाने कितनी फिल्में बनी हैं. ‘देवदास’ फिल्म की ‘चंद्रमुखी’ को कौन भूल सकता है. कौन ‘अमरप्रेम’ की ‘पुष्पा’ को भूल पाया. ‘उमराव जान’ को भी तो कोई नहीं भुला पाया है. ये तो कुछ ही फिल्मों के नाम हैं .

अगर रविशंकर प्रसाद की ये बात मान भी लें कि नोटबंदी के कारण लोगों ने इनके पास जाना बंद कर दिया, तो इन महिलाओं के जीवन यापन का क्या हुआ होगा ? क्या सरकारों ने इनके लिए किसी और काम की व्यवस्था की जिससे कि ये अपना पेट भर सकें ? इन महिलाओं के पास जाना और कुछ पैसों के बदले उनके शरीर पर हर तरह का अत्याचार करना तो जायज मान लिया जाता है. कोई सेक्स वर्कर यदि अपने साथ दुष्कर्म की शिकायत करने जाए तो पुलिस तक उसे भगा देती है. क्योंकि माना जाता है कि वेश्या तो बनी ही इसलिए है, उसके साथ तो दुष्कर्म हो ही नहीं सकता. 

एक सेक्स वर्कर ‘नलिनी जमीला’ ने अपनी आत्मकथा लिखी है – ‘एक सेक्स वर्कर की आत्मकथा’. भारत में शायद यह पहली बार हुआ है कि इस धंधे में शामिल एक स्त्री ने अपने जीवन के बारे में बताया. इस पुस्तक के सौ दिन में ही छह संस्करण बिक गए थे. बहुत सी भाषाओं में इसका अनुवाद भी हो चुका है. इसमें नलिनी ने बताया है कि उसके धंधे में औरत को औरत नहीं एक ऐसी वस्तु माना जाता है जो सबको शारीरिक सुख देने के लिए है, चाहे उसे खुद कितनी ही पीड़ा से क्यों न गुजरना पड़े. और बुढ़ापे में उसका कोई सहारा नहीं होता.

हाल ही में दिल्ली के एक लड़के ने दिल्ली महिला आयोग की सहायता से एक लड़की को जी बी रोड से न केवल मुक्त कराया था, बल्कि उससे विवाह भी किया. लड़के ने अपने परिवार वालों को भी इसके लिए मनाया और वे मान भी गए. लेकिन ऐसा होता बहुत कम है. बहुत कम लड़कियां ऐसी हैं जो एक बार इस चंगुल में फंसीं, तो निकलकर सम्मानपूर्वक जी सकीं.

अरसे से यह मांग की जा रही है कि वेश्याओं के काम को भी काम माना जाए क्योंकि वे भी और कामों की तरह यह काम अपने पेट भरने के लिए करती हैं. उन्हें भी लाइसेंस दिए जाएं. चिकित्सा सुविधाएं मिलें. बुढ़ापे में जब वे अपनी देह को बेचकर पैसा कमाने लायक नहीं रहतीं, तब पेंशन भी मिले. पुलिस बात बेबात उन्हें तंग न करे, क्योंकि अपने देश में देह व्यापार के सिलसिले में औरतों को ही पकड़ा जाता है, ग्राहकों को नहीं. सेक्स वर्कर के सम्मेलनों में अकसर ये मांगें उठाई जाती हैं. दिल्ली का संगठन ‘भारतीय पतिता उद्धार सभा’ तथा देश के बहुत से संगठन और एनजीओ अरसे से मांग करते रहे हैं कि इनके काम को लीगलाइज किया जाए जिससे कि अपराधी गिरोहों से इनका पीछा छूट सके. अगर यह दुनिया का सबसे पुराना काम है और इसे किसी भी तरह रोका जाना सम्भव नहीं है, तो क्यों न इसे कानूनी दर्जा दे दिया जाए, जिससे कि ये औरतें भी सम्मान का जीवन जी सकें. अकेले दिल्ली शहर में ही हजारों औरतें इस काम में लगी हैं. इनमें देश के अनेक प्रदेशों की लड़कियां, औरतें शामिल हैं. बंगाल की ‘दरबार महिला समन्वय कमेटी’ में  डेढ़ लाख सेक्स वर्कस शामिल हैं. चुनावों के वक्त राजनीतिक दल इनसे वायदे बहुत करते हैं मगर चुनाव आते ही भूल जाते हैं. इनके अखिल भारतीय नेट वर्क की अध्यक्ष भारती डे हैं. इस संगठन की सोलह राज्यों की पचास लाख औरतें सदस्य हैं. इनके वोट तो सबको चाहिए मगर इनकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आता.

आज अगर शरतचंद्र होते तो न जाने क्या सोचते. उन्होंने अपना पूरा जीवन इन औरतों की खातिर लगा दिया. क्या आज उन जैसा कोई लेखक या राजनेता दिख सकता है जो इनकी मदद के लिए आगे आए. रविशंकर प्रसाद तो एक गम्भीर किस्म के राजनेता हैं. उनसे इस तरह के बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती. कायदे से तो उन्हें इन महिलाओं की मदद करनी चाहिए जिससे कि ये भी सम्मान पूर्वक जी सकें. 

हिन्दी के एक लेखक ने एक बार  कहा था कि वेश्याएं न हों तो समाज में और अधिक अपराध बढ़ जाएं. यह एक घृणित सोच है. एक तरफ वेश्याएं जरूर चाहिए. छोटी-छोटी बच्चियों को लाखों की संख्या में इस धंधे में धकेल दिया जाता है. वे हमारी वासनाओं की पूर्ति के लिए जरूरी हैं. दूसरी तरफ नैतिकता के ढकोसले के कारण उनसे नफरत भी जरूरी है. नफरत भी कैसी कि औरतों को हर तरह से इस्तेमाल करो, फिर उन्हें कूड़े के ढेर की तरह फेंक दो. और सारी शुचिता और पवित्रता के ढेर के नीचे उनकी कब्र खोद दो. 

अपने समाज में नैतिकता को ढोने का बोझ इतना ज्यादा है कि लोग छिप-छिपकर इनके पास जाते तो हैं, लेकिन इन्हें समाज का हिस्सा ही मानने से इनकार करते हैं. मंत्री जी का बयान यही तो बताता है कि इन औरतों के पास लोग न जाएं क्योंकि इनके पास जाना अनैतिक काम है. लेकिन अगर इनके ग्राहक नहीं आएंगे तो ये क्या करेंगी, कहां जाएंगी, कैसे पेट भरेंगी. क्या इनके लिए किसी रोजगार की व्यवस्था सरकारें करेंगी. इनके परिवार चोरी-छिपे इनसे पैसे तो वसूलते रहते हैं, मगर इन्हें अपनाने को तैयार नहीं होते. अगर इनके बच्चे होते हैं तो ये उन्हें भी किसी अच्छे स्कूल में दाखिल नहीं करा पातीं. इनकी लड़कियों की मुश्किलें तो और ज्यादा हैं. अकसर इनकी लड़कियों को भी सेक्स वर्कर बनाने की कोशिश की जाती है. 

अगर दोष ही देना हो तो समाज को दीजिए, गरीबी को दीजिए, नाते-रिश्तेदारों को दीजिए, जो इन महिलाओं को ऐसी खोह में धकेलते हैं जहां से ये बाहर निकलना भी चाहें तो कोई निकलने नहीं देता. वैसे भी अपने समाज में किसी भी लड़की का अपमान करना हो तो उसे बड़े आराम से वेश्या, रंडी, कालगर्ल, टैक्सी आदि कहकर नवाजा जाता है. समाज जिन्हें गड्ढे में धकेलता है उन्हीं से नफरत का पाठ पढ़ाता है. सोच का यही दोहरापन है जो इन औरतों के लिए कुछ नहीं करने देता.  


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