दंडकारण्य के कारे बादर

विशेष , , शनिवार , 16-09-2017


Dandakaranya ke kare badar

श्रीराजेश

सघन जंगल, आदिम आदिवासियों का रैन बसेरा, आदिवासियों की कला-संस्कृति, वहां की खनिज संपदा और नक्सली गतिविधियां. इसी रूप में हम बस्तर को जानते हैं. प्राचीन काल में इस क्षेत्र की पहचान दंडकारण्य के रूप में भी थी. वर्षों से बस्तर के जंगल कृत्रिम विकास की बलिवेदी पर चढ़ रहे हैं, नक्सली हिंसा में या तो आदिवासी मारे जा रहे हैं या फिर जेलों में ठूंसे जा रहे हैं. उनसे जल - जंगल - जमीन छिनने की साजिश बदस्तूर जारी है. बस्तर का दौरा कर वहां के सूरत-ए-हाल से रूबरू कराती रिपोर्ट.  

 

स्कार्पियों 70-80 किमी प्रति घंटा के रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. रायपुर शहर से निकलते ही चौड़ी-सपाट सड़क धमतरी और कांकेर होते हुए हमें केशकाल की तरफ ले जा रही थी. आसमान में फाहे की मानिंद उड़ते सफेद बादल अस्ताचलगामी सूर्य को अपने आगोश में ले रहा था. आगे केशकाल की पहाड़ियां काले बादलों से आच्छादित थी. धवल उज्जवल आसमां में तैरते बादल काले बादलों में समा रहे थे. इन बादलों के झरोखे से सूर्य की पीली रोशनी छिटक कर धान के हरे पौधों को स्वर्णिम आभा दे रही थी... तभी हम केशकाल घाट के मुहाने पर थे. 

सड़क एकदम से संकरी और ऊपर की ओर चढ़ती हुई सर्पिली हो गई. हम केशकाल की पहाड़ी पर चढ़ने लगे. यह दंडकारण्य का प्रवेशद्वार माना जाता है. रामायण में इसके आख्यान है. दंडकारण्य मतलब आज जिसे हम बस्तर के रूप में जानते हैं. समुद्रतल से 2600 मीटर की ऊंच्चाई पर स्थित वन क्षेत्र. पूरी ऊच्चाई पर पहुंचने के लिए कुल 10 घुमावदार और जोखिम भरे मोड़ से गुजरना पड़ा. आगे बढ़ते ही टूटी सड़क से पाला पड़ा. 

मैं बस्तर के प्रगतिशील किसान डॉ राजा राम त्रिपाठी जी का अतिथि था. उन्होंने बताया कि महज दो महीने पहले ही सड़क बनी थी और अभी बरसात भी कोई खास नहीं हुई कि सड़क टूट गई. इस सड़क के बहाने सूबे में सत्तारुढ़ भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार पर चर्चा चल पड़ी. मुख्यमंत्री के बेटे के 'पनामा पेपर' प्रकरण में नाम होने से लेकर उन कथित 81 भ्रष्टाचार के मामलों की जांच बंद करने तक जिसका रहस्योद्घाटन 'नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो' के वर्ष 2015 के रिपोर्ट से हुआ था. 

हम सड़क के किनारे एक चाय की दुकान पर रुकते हैं. चर्चा जारी रहती है. चाय दुकान पर हल्की रोशनी में चार-पांच अधेड़ उम्र के लोग हलबी में कुछ बातें कर रहे हैं कि अचानक उनमें से एक व्यक्ति हमारी चर्चा के बीच आ जाता है और कहता है, ‘राज्य सरकार का एक विभाग जिस मामले में भ्रष्टाचार की बात कहता है, उसी मामले में सरकार का दूसरा विभाग सरकार को क्लिनचीट दे देता है. सबकुछ राम भरोसे हैं, लूट मची है.’ उस व्यक्ति ने अपना नाम जगदीश नेताम बताया. वे सभी चाय की चुस्की के साथ अब हमारी चर्चा में शामिल थे. उन्ही में से दूसरे व्यक्ति वहीं स्थानीय एक निजी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं - सचिदा. सचिदा का कहना था, ‘छत्तीसगढ़ की सरकार देश की भ्रष्टतम सरकार बन गई है. राज्य में जितने भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, मुख्यमंत्री रमन सिंह उनको दबाने का काम करते हैं. अगर आज की तारीख में चुनाव हो जाए तो भाजपा सत्ता से बेदखल हो जाएगी.’ खैर, इसी के साथ हम आगे बढ़ते हैं, हमें बस्तर के कोंडागांव जाना था. अभी तकरीबन एक घंटे का सफर बाकी था.फिर वहीं टूटी-फूटी सड़क पर हिचकोले खाती स्कार्पियों मंथर गति से आगे बढ़ रही थी. अब हम जंगलों पर बात करने लगे थे. अंधेरे की वजह से सड़क के दोनों ओर फैले जंगल को हम देख नहीं पा रहे थे. रात के साढ़े नौ बजे हम कोंडागांव पहुंचे.

अगले दिन का सबेरा, रात को हुई हल्की बारिश के बाद हवा में सर्दी का अहसास था. लग रहा था पेड़-पौधे नहा-धो कर सूर्य की किरणों से चमक रहे हैं. हम कोंडागांव जिला मुख्यालय से तकरीबन 5 किलोमीटर दूर जंगल में स्थित चिकालपुट्टी गांव की ओर चल पड़ते हैं. रविवार का दिन. जंगली रास्ते बारिश की वजह से कीचड़युक्त हो गये थे. कुछ ही दूरी तय करने पर कुछ कच्चे मकान नजर आने लगते हैं. उनमें सबसे पहले एक किराना की छोटी से दुकान थी. दुकान इतनी छोटी की शायद उसमें दस हजार रुपये का भी सामान ना हो. कुछ लोग वहीं महुआ के पेड़ के नीचे बैठे फूरहा के साथ शराब पी रहे थे. वे हमें अचंभित नजरों से देख रहे थे. जब हम उनके पास पहुंचे तो वे खड़े हो गये. मेरे पूछने पर उन लोगों ने बताया कि इस गांव में 12 परिवार रहता है. बिजली का कनेक्शन तो है लेकिन पूरे गांव में एक भी टीवी नहीं है. उन्हें इसकी जरुरत महसूस नहीं होती. उनकी बातें सुन वहीं खड़ी सबिता हंसते हुए कहती है- ‘इन्हें शराब के नशे से छुटकारा मिले तब तो टीबी देखेंगे.’ इस पर सब हंस पड़ते हैं. यह पूरा गांव अब ईसाई बन गया है. पास ही एक चर्च है- मारिया भवन में, जो चिकालपुट्टी के निधि नगर के अंतर्गत है. इन आदिवासियों को ईसा के साथ-साथ मदर मरियम पर काफी भरोसा है. सभी थोड़ी-बहुत खेती और मनरेगा में काम करते हैं. इतना उनके लिए पर्याप्त है. सरकार से बस उनकी एक ही गुजारिश है कि जो सब्सिडी युक्त दो रुपये किलो चावल दिये जा रहे हैं, बस वह बंद नहीं होना चाहिए. 

हम और अंदर बढ़ते हैं, जंगल घना होता जाता है. इक्का-दुक्का आदिवासी महिला लकड़ी तोड़ती तो वनोपज संग्रह करती दिखती है.तभी पुलिस का गश्तीदल वहां से गुजरता है, गाड़ी एक पल के लिए हमारे पास रुकती है. गाड़ी में बैठे अधिकारी की नजर डॉ त्रिपाठी पर पड़ती है, दोनों के बीच दुआ सलाम होती है और वह गश्तीदल आगे बढ़ जाता है. 

डॉ त्रिपाठी इस गांव में स्थिति अपने आर्गेनिक हार्बल फार्म में ले जाते हैं. यह फार्म 70 एकड़ में फैला है जहां 400 से अधिक दुर्लभ व विलुप्त होती प्रजाति की जड़ी-बुटियों का संरक्षण - संवर्धन किया जाता है, नर्सरी लगाई गई है और टीश्यू कल्चर लैब विकसित किये गये हैं. गोशाला में 72 गायें हैं. इनमें से ज्यादातर दुधारू है, लेकिन इनके दूध का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं होता. आसपास के आदिवासी मुफ्त में ले जाते हैं. बदले में वे जंगल में चरने गई गायों को शाम को गोशाला तक लाते हैं. डॉ त्रिपाठी के लिए इन गायों के दूध से अधिक उनके मल-मूत्र काम के हैं. इनका वे खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

 इन्हीं सब के बीच दोपहर हो जाती है. सूरज सिर पर खड़ा हो जाता है लेकिन गर्मी कोई खास महसूस नहीं होती. आसमान में हल्के काले बादल मंडरा रहे हैं. हम फिर कोंडागाव लौटते हैं और उसके बाद जनजातीय कला-संस्कृति को साहित्यिक के रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाले साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार हरिहर वैष्णव से बात होती है. वह बताते हैं, ‘बस्तर की पहचान यहां के जनजातीय कला-संस्कृति से होती थी, धार्मिक आख्यानों में दंडकारण्य के रूप में इसे पहचाना जाता था, लेकिन अब इसे नक्सली क्षेत्र के रूप में जाना जाता है. सरकार और व्यवस्था यहां के आदिवासियों के समूल नाश की साजिश में लगी हुई हैं. एक तरफ बस्तर के सघन वन क्षेत्र अबूझमाड़ के इलाके में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जमीन दे रही है, तो वहीं दूसरी ओर स्पेशल पुलिस अधिकारी के रूप में आदिवासी युवाओं को नौकरी देकर नक्सलियों से मुकाबले के लिए तैयार करती है, जब कि नक्सली, जो हाथों में बंदूक लिये मोर्चे पर हैं, वह भी आदिवासी है. मजे की बात यह है कि स्पेशल पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के बड़े अधिकारी गैर आदिवासी है तो वहीं बड़े नक्सली नेता भी आदिवासी नहीं है और कुल मिला कर आदिवासियों को आपस में लड़ा कर उन्हें खत्म किया जा रहा है. उनके जंगल छिने जा रहे हैं, जमीन छिनी जा रही है, जो उनका जीवन है. यहीं नहीं रहेगा तो आदिवासी बचेंगे कैसे. जब आदिवासी खत्म हो जाएंगे तो उनकी अमूल्य कला-संस्कृति भी खत्म हो जाएगी.’   

दरअसल, छत्तीसगढ़ सरकार ने माना है कि आज से 12 साल पहले सलवा जुडूम की शुरुआत के बाद दंतेवाड़ा जिले के 644 गांव  जिनमें तकरीबन साढ़े तीन लाख आदिवासी आबाद थे, खाली हो गये. सहज ही सोचा जा सकता है कि इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन अतिशय हिंसा की स्थिति में ही हुआ होगा और अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसका सोचना बेजा नहीं है क्योंकि सलवा जुडूम और सुरक्षा बलों ने दंतेवाड़ा के इन गांवों में लगातार लूट, हत्या, बलात्कार और गिरफ्तारियों का एक सिलसिला कायम कर रखा था. 

कई सुरक्षा विशेषज्ञ दबी जबान से इस बात को स्वीकार करते हैं कि किसी विद्रोह को दबाने के लिए उसके विपक्ष में ठीक वैसा ही विद्रोह खड़ा करके उससे निपटने की यह जानी पहचानी रणनीति है जिसका नीतिवाक्य है कि मछली को मारना हो तो सीधे सीधे पानी को सूखा दो. छत्तीसगढ़ में मौजूद खनिज संसाधन को हासिल करने के लिए जबरिया विस्थापन का यह दुश्चक्र चलाया जा रहा है ताकि खनिज संसाधनों का दोहन करने के लिए कंपनियों की राह आसान की जा सके. मंशा चाहे जो हो, बस्तर के सूरते हाल बिगड़ते जा रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में सरकार अब साफ-साफ एलान कर रही है कि जो गांववासी अब भी अपने खेतों में किसानी का साहस कर रहे हैं (डरे सहमें किसान सुरक्षा बलों को देखते ही भाग खड़े होते हैं और उनके पीछे जो रह जाते हैं वे सुरक्षाबलों की ज्यादती का शिकार होते हैं),  और जो लोग सलवा जुडूम के शिविरों में नहीं बल्कि जंगलों में रह रहे हैं, वे नक्सली हैं. कहते हैं कि वीरान पड़े गांवों में कभी कोई इक्का  - दुक्का नवयुवक दिख जाये या फिर इन गांवों का कोई सौदा सुलफ लेने के लिए बाजार में आया दिख जाये तो नक्सली होने की आशंका में सरकारी कारिन्दे उसे दबोच लेते हैं और नक्सली होने के आरोप में इन्हें जेलों में ठूंस दिया जाता है.

बस्तर क्षेत्र के नारायणपुर ज़िले का अबूझमाड़ देश का ऐसा इलाका है जहां 15वीं शताब्दी के बाद पहली बार राजस्व सर्वेक्षण का काम पिछले चार-पांच माह से शुरू किया गया है. लेकिन इस सर्वेक्षण से माओवादी नाराज़ हैं. असल में जीपीएस और गूगल मैप के इस दौर में भी अबूझमाड़ में कुल कितने गांवों में किसके पास कितनी ज़मीन है, चारागाह या सड़कें हैं या नहीं या जीवन के दूसरी ज़रूरी चीजों की उपलब्धता कैसी है, इसका कोई रिकार्ड कहीं उपलब्ध नहीं है. ये गांव कहां हैं या इनकी सरहद कहां है, यह भी पता नहीं है. इतिहास के पन्नों को पलटने से पता चलता है कि बस्तर के चार हज़ार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले हुए नारायणपुर ज़िले के अबूझमाड़ में पहली बार अकबर के ज़माने में राजस्व के दस्तावेज़ एकत्र करने की कोशिश की गई थी. लेकिन घने जंगलों वाले इस इलाके में सर्वे का काम अधूरा रह गया. ब्रिटिश सरकार ने 1909 में लगान वसूली के लिये इलाके का सर्वेक्षण शुरू किया लेकिन वह भी अधूरा रह गया. हालत ये हुई कि अबूझमाड़ के इलाकों में बसने वाली आदिवासी आबादी आदिम हालत में जीवन जीती रही. 80 के दशक में माओवादियों ने इस इलाके में प्रवेश किया और फिर इसे अपना आधार इलाका बनाना शुरू किया. पिछले कई सौ सालों से इस इलाके के भीतर 237 गांव बसे हैं लेकिन इन गांवों में रहने वाले किसी भी आदिवासी के पास उसकी ज़मीन या मकान का कोई कागज़ नहीं है. सरकार के पास भी इनकी जानकारी नहीं है. आज़ादी के बाद भी यह इलाका अबूझा रह गया, जहां धीरे-धीरे माओवादियों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया. आज की तारीख में इसे माओवादियों का गढ़ कहा जाता है. स्वयंसेवी संस्था ‘संपदा’ की महासचिव शिप्रा त्रिपाठी बतातीं हैं कि आज भी यहां के आदिवासी सहज-सरल हैं, लेकिन वे बाहरी लोगों से घुलमिल नहीं पाते. वे अपनों के बीच खुलते हैं. आम तौर पर ये जंगलों पर ही आश्रित है. बस्तर और अबूझमाड़ के घने वनीय इलाकों में आज भी विनिमय मुद्रा में ना हो कर वनोपज से होती है. वैसे भी इनकी जरुरत महज नमक, तंबाकू, कपड़ा और तेल तक सीमित है. हां, नई पीढ़ी अब पाउडर, फेयर एंड लवली क्रीम की ओर आकर्षित हो रही है. शिप्रा बताती है कि जो थोड़े बहुत आदिवासी युवा 10वीं या 12वीं तक पढ़ लिख जाते हैं, उन्हें आसानी से नौकरी मिल जाती है, फिर वे इन जंगलों से बाहर की दुनिया देखते हैं और उससे उनके परिवार में बदलाव आ रहा है. लेकिन शिप्रा की चिंता दूसरी है, वह कहती है- ‘आदिवासी मेहनती होते हैं, लेकिन आजकल स्थिति यह है कि यहां भी लोगों को खेतों या हल्के फूल्के निर्माण कार्य के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं. इसका कारण यह है कि आदिवासियों में संचय की प्रवृति नहीं होती और सरकार द्वारा सब्सिडी वाले दो रुपये किलो मिलने वाले चावल ने इन्हें कामचोर बना दिया है, रही सही कसर मनरेगा से पूरी की है. हालांकि इन दोनों योजनाओं को शुरु इसलिए किया गया कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिले. लेकिन यहां इसका असर उल्टा हुआ है. मनरेगा से जो कमाई होती है, उसे ये अब अंग्रेजी शराब में उड़ा देते हैं. महिलाओं को भी अंग्रेजी शराब का चस्का लग गया है.’ कला संस्कृति पर बात करते हुए वह कहती है कि अब हालात बहुत बदल गये हैं. आदिवासियों की कला-संस्कृति की झलक यहां स्थानीय स्तर पर रविवार को लगने वाले हाट में दिखती थी. हाट तो अब भी लगते हैं लेकिन अब स्वरूप बदल गये हैं. पहले इन हाटों में आदिवासियों द्वारा मिट्टी या घातु से बनाये गये हस्तशिल्प की वस्तुएं मिलती थी, लेकिन अब इन हाटों से ये चीजें गायब होती जा रही है, ये हाट महज एक बाजार नहीं है. इन हाटों में अगल-बगल के गांव के आदिवासी जुटते हैं तो इन्हें अपने रिश्तेदारों की खबरें मिल जाती है. शादी –व्याह के लिए बातचीत शुरू हो जाती है. तो कहीं किसी पेड़ के नीचे लंबे समय बाद मिले पुरुष मित्र आपस में शराब की दावतें उड़ाते दिख जाते हैं. यह एक प्रकार से सांस्कृति केंद्र होते हैं.  

दरअसल, बस्तर और अबूझमाड़ के आदिवासी कला-संस्कृति के संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास सरकार को करनी होगी, सिर्फ योजनाओं की घोषणाएं इनका भला नहीं कर सकती. 


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