अनुत्तरित प्रश्नों से घिरा देश

विशेष , , रविवार , 17-12-2017


Country surrounded by unanswered questions

विजय किशोर मानव

भारतीय मूल के नॉबल पुरस्कार से सम्मानित भौतिक विज्ञानी डॉ एस चन्द्रशेखर के निधन के समय एक समाचार करीब-करीब हर समाचार-पत्र में छपा था जिसमें उनके हवाले से कहा गया था-मनुष्य की सबसे बड़ी खोज ईश्वर है. उनकी बात के विस्तार में कहा गया था मनुष्य ने अपनी हज़ारों-लाखों समस्याओं को उतार फेंकने के लिए अपनी आस्थाओं को प्रकट रूप में ईश्वर का नाम दिया है. यह एक बड़े वैज्ञानिक की कही वैज्ञानिक बात है. भारतीय मूल के होने के कारण वे ज़रूर आस्थाओं की हमारी परंपराओं के साथ पले होंगे और इसी नाते उन्होंने प्रयोगशालाई विज्ञान से बाहर जाकर अपने विचार व्यक्त किए होंगे.

हमारी भारतीय परम्परा में आस्था को प्रकट करने का साधन पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, जप-तप, योग-प्राणायाम-ध्यान आदि रहे हैं. पश्चिमी ईसाई समाज रियलाइज़ेशन, कनफेशन और सेवा के ज़रिये अपनी आस्थाएं प्रकट करके सुकून पाता रहा है. मुसलमानों में निराकार की इबादत के साथ ही सदाचरण की सीखों को जीवन में अपनाकर, हर समस्या से निजात पाने की रवायत है. ईश्वर से जुड़ने और नानक की तरह जप और सर्वशक्तिमान के प्रति समर्पण, के भाव ने ही उन्हें आनंद से जोड़ा. ये सारे रास्ते इसीलिए आनंद के मार्ग बने क्योंकि इन्हें अपनाने वाले दुःखों से मुक्त हो सके. उन्होंने सत्ताओं का सामना किया अगड़ों को खरी-खोटी सुनाई और गिरे-कुचलों को गले लगाया. हमारे यहां संतों के ऐसे सत्कर्मों की प्रतिष्ठा नानक के पहले और बाद के काल तक बनी रही है. वे समाज को प्रभावित करके बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं.

नानक कहते हैं सारे इंसान एक हैं. सब जीवों में एक ही परमात्मा की ज्योति विद्यमान है और सभी उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं. उनमें कोई श्रेष्ठ या निकृष्ट नहीं है. 

असल में मध्यकाल में भारतीय समाज पूरी तरह धर्म और जाति के आधार पर बंटा हुआ था. धार्मिक कट्टरता जोरों पर थी. हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ और महान साबित करने की होड़ लगी हुई थी. इस कारण टकराव और क्लेश बढ़ता जा रहा था. यही नहीं ख़ुद हिन्दू धर्म भी, जातियों और वर्णों में बंटा हुआ था. व्यक्ति का सामाजिक सम्मान और स्थान उसकी जाति और वर्ण के आधार पर तय होता था. कर्मों के आधार पर कुछ भी तय नहीं होता था. समाज में वर्ण प्रधान था, कर्म और व्यक्ति नहीं. धर्म, जाति और वर्ण में बंटे-बिखरे समाज को जोड़ने के लिए गुरुओं ने खत्री ब्राह्मण सूद वैस उपदेसु चहु वर्णां कउ सांझा के अनुसार समूची मानव जाति के लिए एक ही सर्वसांझे ईश्वरीय उपदेश की बात की और स्पष्ट कहा कि व्यक्ति अपनी जाति और वर्ण से नहीं बल्कि कर्मों से महान और श्रेष्ठ होता है- 

जाति जनम नह पुछीअै, सच घरु लेहु बताइ.

सा जाति सा पति है, जेहे करम होइ .. 

(गुरुग्रंथ साहिब पृ 1330)

एक नूर ते सब जग उपजिआ के समतावादी सिद्धांत के मुताबिक सभी मनुष्य एक ही परमात्मा की संतान होने के नाते गुरु ग्रंथ साहिब ने हिन्दुओं और मुसलमानों को दो अलग-अलग श्रेणियां नहीं माना बल्कि राह दोवै खसमु एको जाणु कहकर दोनों को एक ही धरातल पर रखकर किसी की भी श्रेष्ठता को निरस्त कर दिया. इसी तरह समाज में हमेशा से अपमानित और प्रताड़ित दलितों को सम्मान दिलाने के लिए गुरुओं ने उन्हें अपने साथ जोड़ा और संगत तथा पंगत में बिठाकर साथ खिलाया-पिलाया.

लेकिन, भारतीय समाज में बार-बार ऐसी स्थितियां आती रही हैं. बल्कि सच कहें एक ऐसी धारा बराबर बनी रही है जो धर्म और संप्रदाय से लेकर, जातियों और खेमों तक में लोगों को बांटने का काम करती रही है. इसे कायम रखने के निहित स्वार्थ रहे हैं. देश की राजनीति को ध्यान से देखें तो करीब-करीब हर राज्य जातीय और साम्प्रदायिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता नज़र आता है. आज़ादी के समय के साम्प्रदायिक दंगे अगर एक नमूना थे तो बाद में दक्षिण भारत की राजनीति में पिछड़े वर्ग का केन्द्र में आना एक नई शुरुआत थी जो बाद में अन्य राज्यों से होती हुई बिहार और उत्तर प्रदेश तक में काबिज हो गई. सन् 1967 में सात राज्यों में बनी संविद सरकारों के बाद उत्तर भारत में क्षेत्रीय दलों का उभार आया जिनके केन्द्र में जातियां और उनके बदलते समीकरण थे. 

यह सब तब है जब हमारा संविधान धर्म, प्रजाति, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर व्यक्ति के साथ भेदभाव न होने देने के लिए कृतसंकल्प है. संविधान के 14 से 18 अनुच्छेद समानता पर केन्द्रित हैं. जातीय आरक्षण के बारे में सांविधानिक व्यवस्था की ज़रूरत तब पड़ी जब संविधान के पहले संशोधन में अनुच्छेद 15 में धारा 4 जोड़ी गई. इस धारा में समानता के सिद्धांत के अपवाद के रूप में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को या अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गईं. हमारी अनेक सांविधानिक संस्थाएं जिनमें चुनाव आयोग भी शामिल है, जाति और सम्प्रदाय आधारित चुनावों को, राजनीति को नकारता है पर अंततः सब असहाय से लगते हैं. आज जब बहुत सारे लोग तमाम हदें तोड़कर, ख़ुद को चर्चित और स्थापित कर रहे हों, और इसे दूसरों के लिए एक लीक बना रहे हों, तब एक बार फिर से समाज की तरफ देखना ज़रूरी लगता है. समाज का दबाव हर स्थिति में काम करता ही है. मुझे लगता है यह दौर इसी का है. 

मनुष्य जी तो अकेले भी सकता है लेकिन समूह में वह सुरक्षित रहता है. व्यष्टि और समष्टि के हितों में संतुलन बनाता है. भारतीय समाज में परिवार के प्रति और समुदाय के प्रति, निष्ठावान रहने का मूल्य शताब्दियों से चला आ है. इनके साथ हम कम साधनों में सुख का अनुभव कर पाते हैं और बहुत बार बड़ी विपत्तियों को आसानी से झेल पाते हैं. लेकिन, समुदाय और समाज के हित को अपने जीवन की आचार-संहिता में बनाए रखना, हमारी संस्कृति से धीरे-धीरे लुप्त हो गया है. इन मूल्यों को बनाए रखने वाले घटक, माता-पिता, परिवार, शिक्षक सब गौण होते जा रहे हैं. आज तो राजनीतिक दलों से भी ज्यादातर सरपरस्तों का विलोप होता जा रहा है. दलों में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का दूर तक अता-पता नहीं हैं. और इसीलिए समूची राजनीति में निरंकुशता का बोलबाला होता जा रहा है. घर-परिवार की पार्टियां, जातियों को ध्यान में रखकर नेताओं का जोड़-घटाना और पूरी गणित करके रचे जा रहे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण सारी हदें पार कर रहे हैं. ज़ाहिर है कि यह सब समाज-सेवा के लिए नहीं, सत्ता पाने के लिए हो रहा है.

भारत की आजादी के पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने भारत की आजादी को लेकर संदेह प्रकट किया था कि यह सफल होगी. उन्होंने कहा, ‘धूर्त, बदमाश, एवं लुटेरे हाथों में सत्ता चली जाएगी. सभी भारतीय नेता सामथ्र्य में कमजोर और महत्त्वहीन व्यक्ति होंगे. वे जबान से मीठे और दिल से नासमझ होंगे. सत्ता के लिए वे आपस में ही लड़ मरेंगे और भारत राजनैतिक तू-तू-मैं-मैं में खो जाएगा.’ चर्चिल का यह भी कहना था कि भारत सिर्फ एक भौगोलिक पहचान है. वह कोई एक देश नहीं है, जैसे भूमध्य रेखा कोई देश नहीं है. लेकिन तब तो नेहरू जैसे प्रधानमंत्री और पटेल जैसे अडिग गृहमंत्री ने न केवल भारत को संभाला और इन आशंकाओं को निर्मूल किया बल्कि उसे सफलता का नया रास्ता दिया. नेहरू की विरासत के रूप में कम से कम चार बातें आज भी सार्थक है. 1.मिश्रित अर्थ-व्यवस्था, 2. योजना यानी ‘दृष्टि’, 3. विदेश नीति और 4.कौशल या ज्ञान. इसके साथ-साथ बहु-जातीय, बहुधर्मी भारत की परिकल्पना में भी उनका योगदान है. सबसे बड़ा योगदान है लोकतांत्रिक आजादी को कायम करने का. नेहरू को देश के एकीकरण का श्रेय जाता है. भारत जैसे बिखरे राष्ट्र राज्य को एक धागे से बाँधना आसान काम नहीं था. राज्य पुनर्गठन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी जिसे उन्होंने निभाया. उनके पास वह मूल अवधारणा थी जिसके सहारे आधुनिक भारत के सपने बुने गए. ‘डिसकवरी ऑफ इंडिया’ में उस ताने-बाने को देखा जा सकता है. आप उनसे लाख असहमत हों पर इसमें दो राय नहीं कि श्रेष्ठ विचारक, करिश्माई राजनेता और बेहतरीन लेखक के रूप में नेहरू अपनी जगह अद्वितीय थे. 

संसदीय राजनीति के भीतर गहरे अंतर्विरोध हैं. सत्तर के दशक में आपतकाल, अस्सी के दशक में खलिस्तानी आंदोलन और नब्बे के दशक में मंडल-कमंडल आंदोलन ने हमारे अंतर्विरोधों को बुरी तरह उधेड़ना शुरू किया. पूँजी के वैश्वीकरण की तेज प्रक्रिया का दौर भी भारत में नब्बे के दशक में ही शुरू हुआ. आरक्षण के मसले में अब प्रतिनिधित्व के प्रश्न गुंथ गए हैं जो उसे और जटिल बना रहे हैं. अनेक नई जातियां आरक्षण पाने के मुहाने पर खड़ी बार-बार हिंसक हो जाने वाले आंदोलन करती हैं और सरकार उनके तुष्टीकरण का रास्ता तलाशती दिखती है. क्रीमी लेयर की सीमा उूंची करती है. देश के नए मकड़जाल में उलझता जाता है. दूसरी तरफ संसदीय राजनीति पर कब्जा करने की कोशिशें टकराव को बढ़ा ही रही हैं. सच यह है कि सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से राष्ट्रीय राजनीति में अचानक जहर घुल रहा है. इस मामले के राजनीतिक निहितार्थ के साथ-साथ हमें राष्ट्र से जुड़े कार्यक्रमों पर ध्यान देना चाहिए. किसी एक राजनीतिक पार्टी या विचारधारा के नजरिए से सोचने के बजाय भारतीय नजरिए से सोचना चाहिए. स्वार्थों, संकीर्णताओं के तूफान आज भी हिलोरे ले रहे हैं. 

परिवार टूट चुके हैं, हर आदमी अपना इंजन ख़ुद है. कमाने वाले पु़त्रों के माता-पिता सहमे से रहते हैं. और समाज, दौड़ती भीड़ की तरह एक-दूसरे के बहुत पास होकर भी पूरी तरह असंबद्ध बना रहता है. फिर कौन और कैसे, किसी से सीधे और सही रास्तेे पर चलने को कहेगा? क्या हम सोचेंगे कि रुतबा, ताकत और पैसा कहां है? इसीलिए अंततः हर कोई राजनीति से जुड़ना चाहता है, अकूत और अनंत ताकत की तरफ भागता है. हारे-थके खिलाड़ी, धुंधले पड़ गए या चमक रहे फिल्मी सितारे, छोटे से लेकर बड़े अपराधी तक सारे अंततः यहीं आना चाहते हैं. क्या सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को संभालना, जीडीपी और औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर से कई गुना ज़रूरी नहीं है? 


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