सोशल मीडिया में जजों पर प्रहार!

विशेष , , बृहस्पतिवार , 01-02-2018


 hit on the judge In the social media

रचना पाण्डेय

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश की मनमर्जी पर प्रेस कांफ्रेंस करते ही सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया है. ट्रोल पीछे पड़ गए हैं, कुछ लोग इसे सही बता रहे हैं तो कुछ गलत. वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने इन जजों का पत्र अनुवाद कर अपने ब्लॉग में डाला है. पत्र इस तरह है- 

 

प्रिय मुख्य न्यायाधीश जी,

बड़ी नाराज़गी और दुख के साथ हमने सोचा कि यह चिठ्ठी आपके नाम लिखी जाए ताकि इस अदालत से जारी किए गए कुछ आदेशों को चिंहित किया जा सके, जिन्होंने न्याय देने की पूरी कार्यप्रणाली और उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता के साथ-साथ भारत के सर्वोच्च न्यायालय के काम करने के तौर-तरीक़ों को बुरी तरह प्रभावित करके रख दिया है.

जब से कलकत्ता, मुंबई और मद्रास में तीन उच्च न्यायालयों की स्थापना हुई उसी समय से ही न्यायिक प्रशासन में कुछ मान्यताएं और परंपराएं भी स्थापित हुई हैं. इन उच्च न्यायालयों की स्थापना के लगभग सौ साल बाद सुप्रीम कोर्ट अस्तित्व में आया था. ये वो परम्पराएं हैं, जिनकी जड़ें अंग्रेजी न्यायतंत्र में थी.

स्थापित सिद्धांतों में एक सिद्धांत यह भी है कि रोस्टर का फैसला करने का विशेषाधिकार प्रधान न्यायधीश के पास है, जिससे कि यह व्यवस्था निर्वाध बनी रहे कि सर्वोच्च न्यायालय का कौन सदस्य और कौन सी पीठ और किस मामले का सुनवाई करेगी. यह परंपरा इसलिए भी बनाई गई है ताकि अदालत का कामकाज अनुशासित और सुचारू तरीके से चलता रहे. यह परंपरा प्रधान न्यायधीश को अपने सहयोगियों के ऊपर अपनी बात थोपने की इजाजत नहीं देती है.

हमारे देश के न्यायतंत्र में यह बात भी पूरी तरह स्थापित है कि प्रधान न्यायधीश सभी न्यायधीशों के बराबर है-बस सूची में पहले नंबर पर है, न उनसे कम और न ही उससे ज्यादा. रोस्टर तय करने के मामले में पूर्व स्थापित और मान्य परंपराएं रही हैं कि प्रधान न्यायधीश मामले की ज़रूरत के हिसाब से ही पीठ का निर्धारण करेंगे.

उपरोक्त सिद्धांत के बाद अगला तर्कसंगत कदम ये होगा कि इस अदालत समेत अलग-अलग न्यायिक इकाइयां ऐसे किसी मामले से ख़ुद नहीं निपट सकती, जिनकी सुनवाई किसी उपयुक्त बेंच से होनी चाहिए. उपरोक्त दोनों नियमों का उल्लंघन करने से दुखद और अवांछित परिणाम होंगे जिससे न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा को लेकर देश की राजनीतिक के मन में संदेह पैदा होगा. साथ ही, अगर ऐसा नहीं होगा तो ऐसा हंगामा मचेगा जिसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है.

हम यह बताते हुए बेहद निराश हैं कि पिछले कुछ समय से जिन दो नियमों की बात हो रही है, उसका पालन पूरी तरह नहीं किया जा रहा है. ऐसे कई मामले हैं जिनमें देश और संस्थान पर असर डालने वाले मुकदमे इस अदालत के आपने 'अपनी पसंद की' बेंच को सौंप दिए, जिनके पीछे कोई तर्क नज़र नहीं आता. इसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए.

हम इसका पूरा विवरण इसलिए नहीं दे रहे हैं क्योंकि ऐसा करने से सुप्रीम कोर्ट को और अधिक शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी, लेकिन इसका जरूर ख्याल रखा जाना चाहिए कि इस सबके चलते ही कुछ हद तक पहले से ही इस संस्थान की छवि को नुकसान पहुंच चुका है.

इस संदर्भ में हमें लगता है कि 27 अक्टूबर 2017 के आर पी लूथरा बनाम भारतीय गणराज्य वाले मामले को आपके ध्यानार्थ लाया जाए. इसमें कहा गया था कि जनहित को ध्यान में रखते हुए ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर’ को अंतिम रूप देने में अब और बिलंब नहीं करना चाहिए. जब मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन एंड ए एन आर बनाम भारतीय गणराज्य मामले में संवैधानिक पीठ का हिस्सा था, तो ये समझना मुश्किल है कि कोई अन्य पीठ इस मामले को क्यों देखेगी.

इसके अलावा संवैधानिक पीठ के फैसले के बाद आप समेत पांच न्यायाधीशों के कॉलेजियम ने विस्तृत चर्चा की थी और मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देकर मार्च 2017 में प्रधान न्यायधीश ने उसे भारत सरकार के पास भेज दिया था. भारत सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और इस चुप्पी को देखते हुए ये माना जाना चाहिए कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (सुपरा) मामले में इस अदालत के फैसले के आधार पर मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर को स्वीकार कर लिया है. इसीलिए किसी भी मुकाम पर पीठ को मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देने को लेकर कोई व्यवस्था नहीं देनी थी या फिर इस मामले को अनिश्चितकाल के लिए टाला नहीं जा सकता था.

चार जुलाई 2017 को इस अदालत के सात जजों की पीठ ने माननीय न्यायधीश सी एस कर्णन (2017, 1SCC1) को लेकर फैसला सुनाया था. उस फैसले में (आर पी लूथरा के संदर्भ में) हम दो जजों ने व्यवस्था दी थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने की जरूरत है. साथ ही हमें महाभियोग से अलग भी कोई दूसरे उपाय के बारे में सोचने की जरूरत है. मेमोरैंडम ऑफ प्रॉसिजर को लेकर सातों जजों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं की गई थी.

मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर को लेकर किसी भी मुद्दे पर प्रधान न्यायधीशों के कॉन्फ्रेंस और सभी जजों वाली अदालत में विचार होनी चाहिए. ये मामला बहुत ही अहम है और अगर न्यायपालिका को इस पर विचार करना है तो इसपर विचार करने की जिम्मेदारी सिर्फ संवैधानिक पीठ को दी जानी चाहिए.

उपरोक्त घटनाक्रम को बहुत ही गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है. भारत के माननीय प्रधान न्यायधीश का यह कर्तव्य है कि इस स्थिति को कॉलेजियम के दूसरे सदस्यों के साथ सुलझाएं और बाद में अगर जरूरत पड़े तो इस अदालत के माननीय न्यायधीशों के साथ विचार-विमर्श करके इसमें सुधार करना चाहिए.

एक बार आपकी तरफ से आर पी लूथरा बनाम भारतीय गणराज्य से जुड़े 27 अक्टूबर 2017 के आदेश वाले मामले को निपटा लिया जाए. अगर उसके लिए जरूरत पड़ी तो हम आपको इस अदालत द्वारा पारित अन्य कई ऐसे न्यायिक आदेशों के बारे में बताएंगे, जिनसे इसी तरह तत्काल निपटे जाने की जरूरत है.

सादर,


जे चेलमेश्वर, रंजन गगोई, मदन बी लोकुर, कुरियन जोसफ


(अनुवाद: रवीश कुमार)

 

इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह लिखते हैं- पहली बार मीडिया के सामने आए सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जो कुछ कहा है उसके मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केंद्र में हैं. कौन हैं मुख्य न्यायाधीश, कहां के हैं - उनके बारे में आप भी जानना चाहेंगे. पेश है संक्षित परिचय. 
जस्टिस दीपक मिश्रा ने 28 अगस्त 2017 को देश के 45वें मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ ली. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें शपथ दिलाई. दीपक मिश्रा ने जस्टिस जगदीश सिंह केहर की जगह ली है. 64 वर्षीय चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का कार्यकाल 13 महीने और छह दिनों का है. वे 2 अक्तूबर, 2018 तक इस पद पर रहेंगे. दीपक मिश्रा भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले ओडिशा के तीसरे न्यायाधीश हैं. उनसे पहले ओडिशा से ताल्लुक रखने वाले न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा और न्यायमूर्ति जीबी पटनायक भी इस पद पर रह चुके हैं. 
जस्टिस दीपक मिश्रा का जन्म 3 अक्तूबर 1953 को हुआ था. 14 फरवरी 1977 को उन्होंने उड़ीसा हाई कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की थी. 1996 में उन्हें उड़ीसा हाई कोर्ट का एडिशनल जज बनाया गया और बाद में उनका तबादला मध्यप्रदेश हाई कोर्ट हो गया था. 2009 के दिसंबर में उन्हें पटना हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया. 24 मई 2010 को उनका तबादला दिल्ली हाई कोर्ट में बतौर चीफ जस्टिस हुआ. 10 अक्तूबर 2011 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया. 
जस्टिस दीपक मिश्रा ने कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं. मुंबई ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन को फांसी की सजा जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली बेंच ने ही सुनाई थी. याकूब के मामले में आजाद भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट में रात भर सुनवाई चली थी. सुप्रीम कोर्ट में रात के वक्त सुनवाई करने वाली बेंच की अगुआई जस्टिस दीपक मिश्रा ने ही की थी और दोनों पक्षों की दलील के बाद याकूब की अर्जी खारिज की गई थी और फिर तड़के उसे फांसी दी गई थी. जस्टिस दीपक मिश्रा ने आपराधिक मानहानि से संबंधित कानूनी प्रावधान के संवैधानिक वैधता को सही ठहराया था. उन्होंने कहा था कि विचार अभिव्यक्ति का अधिकार असीमित नहीं है. 
वे एक और पोस्ट में लिखते हैं- “यूं तो जस्टिस दीपक मिश्रा ने अब तक के कैरियर में कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं, लेकिन 30 नवंबर 2016 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के रूप में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अगुआई वाली बेंच ने कहा था कि पूरे देश में सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाया जाए और इस दौरान सिनेमा हॉल में मौजूद तमाम लोग खड़े होंगे. हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही आदेश को पलटते हुए सिनेमाघरों में फिल्म दिखाए जाने से पहले राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. इस मुद्दे पर केंद्र सरकार कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि इस मुद्दे पर इंटर मिनिस्ट्रियल कमिटी का गठन किया गया है ताकि वह नई गाइडलाइंस तैयार कर सके. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के हलफनामे को स्वीकार कर लिया है और कहा है कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने संबंधी अंतिम फैसला केंद्र द्वारा गठित कमिटी लेगी. 
संयोग से जब उनका मुख्य न्यायाधीश बनना तय हुआ तो उनकी पहचान इस फैसले से जोड़कर भी हुई जबकि बहुचर्चित निर्भया गैंग रेप केस में तीनों दोषियों की फांसी की सजा को जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली बेंच ने बरकरार रखा था. न्यायमूर्ति मिश्रा ने एक फैसले में दिल्ली पुलिस से कहा था कि वह एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटे अंदर उसे अपने वेबसाइट पर अपलोड करे. जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई में एक स्पेशल बेंच बनाई गई है जो अयोध्या मामले की सुनवाई करेगी. इसके अलावा बीसीसीआई में सुधार, सहारा सेबी मामला भी जस्टिस मिश्रा की बेंच सुन रही है.“
सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जो किया वह बहुत लोगों को समझ में नहीं आया. हालांकि, बहत सारे लोग ऐसे भी हैं जो समझना ही नहीं चाहते हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो समझ रहे हैं पर मान नहीं रहे हैं. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और भक्त मंडली अपने काम में लग गई है. पर इसमें कोई शक नहीं है कि देश में स्थिति बिल्कुल अलग तरह की है और ऐसी स्थिति पहले कभी रही नहीं. इस पर तरह-तरह की टिप्पणी हो रही है. कुछ लोग विद्वान जजों को ही गलत कह रहे हैं कुछ लोग उनके कहे का गलत मतलब निकालने का आरोप लगा रहे हैं कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि इस मौके पर राजनीति की जा रही है आदि. मेरा मानना है कि विद्वान जजों ने जो कुछ भी किया खूब सोच समझ कर किया. तमाम विकल्पों पर विचार करने, मौजूदा स्थितियों के मद्देनजर ही किया होगा. एक जागरूक नागरिक के रूप में हमें पूरे मामले को ठीक से समझ कर ही कुछ कहना चाहिए.
मैं जितना जानता समझता हूं उस हिसाब से मुझे स्थिति बिल्कुल अलग और असामान्य लगती है. इसलिए मेरी राय में उससे निपटने या निपटने की कोशिशें भले अटपटी लगें, अलग ही होगी. जब आप दूसरों पर शक करते हैं तो आप भी शक किया जा सकता है. उससे बात नहीं बनेगी. उसमें लीक पर चलते रहने या आदर्श स्थितियों के उपाय कामयाब नहीं होंगे क्योंकि वो आदर्श स्थिति के लिए ही होते हैं. यह सही है कि अभी तक सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र रहा है और उसकी स्वतंत्रता बनी ही नहीं रहनी चाहिए दिखनी भी चाहिए. पर देख सकने वाले लोग जब साफ देख पा रहे हैं कि स्थिति ठीक नहीं है तो कैसे नहीं बोलें. अगर आपको वाकई नहीं समझ में आ रहा है कि यह मामला क्यों अलग है तो पहले पूरे मामले को जानिए समझिए.
मुझे याद है, जैन हवाला कांड. देश के 115 प्रमुख लोगों पर आरोप था. सीबीआई मामले की जांच कर रही थी. लोग आरोप स्वीकार चुके थे, इस्तीफे हो चुके थे और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी. भरी अदालत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि उनपर भारी दबाव है. तब भी स्थिति अलग थी. पर उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया. मुख्य न्यायाधीश पर दबाव होते हैं और उससे उन्हें ही निपटना होता है. उनका अपना तरीका होता है. किसी एक मामले में दबाव और रोज के काम काज में दबाव अलग चीजें हैं. पर कोई जज अगर दबाव में काम करने लगे? दूसरों को लगे कि ऐसा है. तो क्या कोई चुप बैठा रहे. मुझे नहीं लगता सब कुछ देखकर चुप रहना ठीक है. खास कर तब जब बोलने वाले को पता है कि सामान्य स्थितियों में दूसरे लोग नहीं बोल सकते हैं. इसलिए, मेरा मानना है कि अगर आप कुछ कर नहीं सकते तो जो हो रहा है उसमें बाधा भी नहीं डालना चाहिए. हर कोई राजनीति ही नहीं कर रहा होता है. कुछ लोग वाकई देश के लिए, देश के नागरिकों के लिए चिन्तित होते है.“
सुप्रसिद्ध लेखक और नेशनल बुक ट्रस्ट में सम्पादक श्री पंकज चतुर्वेदी ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है- “स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में ये स्थिति अभूतपूर्व हैं, अब या तो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा इस्तीफा दे या चारों जजों पर महाभियोग चलाए, सुलह समझौते की गुंजाइश बची नहीं है यदि बची होती तो प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की कोई जरूरत ही नयी थी”. उन्होंने इन चारों जजों का परिचय भी दिया है-
जस्टिस जे चेलमेश्वर 
सुप्रीम कोर्ट के दूसरे नंबर के सबसे सीनियर जज हैं. आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एडीशनल जज और 2007 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने. उन्हें केरल हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया. अक्टूबर 2011 में वे सुप्रीम कोर्ट के जज बने.
इसलिए रहे चर्चा में
  • जस्टिस चेलमेश्वर ने पिछले साल मई में सुप्रीम कोर्ट में वाई-फाई फैसेलिटी न होने को लेकर सवाल उठाया था. जे चेलमेश्वर और फॉली नरीमन की दो जजों की बेंच ने ही इस कानून को रद्द किया था, जिसके तहत पुलिस को किसी भी ऐसे शख्स को अरेस्ट करने का ऑर्डर था, जिसने किसी को कुछ मेल किया हो या कोई इलेक्ट्रॉनिक मैसेज दिया हो, जिससे किसी को कुछ परेशानी हुई हो.
  • वे आधार से जुड़े प्राइवेसी के मामले की सुनवाई करने वाली बेंच में भी जज थे.

जस्टिस रंजन गोगोई 
जस्टिस रंजन गोगोई ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली. इससे पहले वे पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे. वे गुवाहाटी हाईकोर्ट में भी अपनी सेवा दे चुके हैं.
इसलिए रहे चर्चा में
  • कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस सीएस कर्णन को सजा सुनाने वाली सात जजों की बेंच में वे जज थे.
  • सरकारी विज्ञापनों में राज्यपाल, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्य मंत्रियों की फोटो के इस्तेमाल की इजाजत दी थी. सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला पलट दिया था.
जस्टिस मदन भीमराव लोकुर
जस्टिस मदन भीमराव लोकुर ने 1977 में बतौर लॉयर करियर की शुरुआत की. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत की. वे फरवरी 2010 से मई तक दिल्ली हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस रहे. जून में वे गुवाहाटी हाईकोर्ट और बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने.
इसलिए रहे चर्चा में
  • बिहार के एक मामले में बगैर तलाक लिए कानूनी तौर पर पति से अलग रह रही पत्नी को गुजारा भत्ता देने का फैसला दिया था.
  • ओपन जेल के कंसेप्ट पर गृह मंत्रालय को बैठक करने का निर्देश दिया था. कोर्ट का कहना था कि अगर ऐसा होता है तो जेल में ज्यादा कैदियों की परेशानी से निजात मिलेगी.
जस्टिस कुरियन जोसफ
जस्टिस कुरियन ने कानून के क्षेत्र में अपना करियर 1979 से शुरू किया. 2000 में उन्हें केरल हाईकोर्ट को जज बनाया गया. 2010 में वे हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने. 8 मार्च 2013 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने.
इसलिए रहे चर्चा में
  • तीन तलाक को गैर-कानूनी करने का ऑर्डर देने वाली पांच जजों की बेंच में शामिल थे. 
  • गुड फ्राइडे पर कॉन्फ्रेंस बुलाने का विरोध किया था. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेटर लिखा था. इसमें उन्होंने लिखा था कि वो गुड फ्राइडे की वजह से परिवार के साथ केरल में हैं और इस मौके पर होने वाले डिनर में नहीं आ पाएंगे. उन्होंने यह भी लिखा है कि दिवाली, दशहरा, होली, ईद, बकरीद जैसे शुभ और पवित्र दिन ऐसा कोई आयोजन नहीं होता. 

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