आफत बनते आवारा मवेशी

रपट , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Stray cattle

पंकज चतुर्वेदी

इलाहबाद, प्रतापगढ़ से ले कर जौनपुर तक के गांवों में देर रात लोगों के टार्च  चमकते दिखते हैं. इनकी असल चिंता वे लावारिस गोवंश होता है जो झुंड में खेतों में आते हैं व कुछ घंटे में किसान की महीनों की मेहनत उजाड़ देते हैं. जब से बूढ़े पशुओं को बेचने को ले कर उग्र राजनीति हो रही है, किसान अपने बेकार हो गए मवेशियों को नदी के किनारे ले जाता है, वहां उसकी पूजा की जाती है फिर उसके पीछे पर्दा लगाया जाता है, जिसे मवेशी बेकाबू हो कर बेतहाशा भागता है. यहां तक कि वह अपने घर का रास्ता भी भूल जाता है. ऐसे सैकड़ों मवेशी जब बड़े झुंड में आ जाते हैं तो तबाही मचा देते हैं. भूखे, बेसहारा गौ वंश के बेकाबू होने के चलते बुंदेलखंड में तो आए रोज झगड़े हो रहे हैं. ऐसी गायों का आतंक राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश में इन दिनों चरम पर है. कुछ गौशालाएं तो हैं लेकिन उनकी संख्या आवारा पशुओं की तुलना में नगण्य हैं और जो हैं भी तो भयानक अव्यवस्था की शिकार, जिसे गायों का कब्रगाह कहा जा सकता है. 

देश के जिन इलाकों में सूखे ने दस्तक दे दी है और खेत सूखने के बाद किसानों व खेत-मजदूरों के परिवार पलायन कर गए हैं, वहां छुट्टा मवेशियों की तादाद सबसे ज्यादा है. इनके लिए पीने के पानी की व्यवस्था का गणित अलग ही है. आए रोज गांव-गांव में कई-कई दिन से चारा ना मिलने या पानी ना मिलने या फिर इसके कारण भड़क कर हाईवे पर आने से होने वाली दुर्घटनाओं के चलते मवेशी मर रहे हैं. आने वाले गर्मी के दिन और भी बदतर होंगे क्योंकि तापमान भी बढ़ेगा.

बुंदेलखंड की मशहूर ‘‘अन्ना प्रथा’’ यानी लोगों ने अपने मवेशियों को खुला छोड़ दिया हैं क्योंकि चारे व पानी की व्यवस्था वह नहीं कर सकते. सैकड़ों गायों ने अपना बसेरा सड़कों पर बना लिया. पिछले दिनों कोई पाँच हजार अन्ना गायों का रेला हमीरपुर से महोबा जिले की सीमा में घुसा तो किसानों ने रास्ता जाम कर दिया. इन जानवरों को हमीरपुर जिले के राठ के बीएनबी कालेज के परिसर में घेरा गया था और योजना अनुसार पुलिस की अभिरक्षा में इन्हें रात में चुपके से महोबा जिले में खदेड़ना था. एक तरफ पुलिस, दूसरी तरफ सशस्त्र गांव वाले और बीच में हजारों गायें. कई घंटे तनाव के बाद जब जिला प्रशासन ने इन गायों को जंगल में भेजने की बात मानी, तब तनाव कम हुआ. उधर बांदा जिले के कई गांवों में अन्ना पशुओं को ले कर हो रहे तनाव से निबटने के लिए प्रशासन ने  बेआसरा पशुओं को स्कूलों के परिसर में घेरना शुरू कर दिया है. इससे वहां पढ़ाई चौपट हो गई. वहीं प्रशासन के पास इतना बजट नहीं है कि हजारों गायों के लिए हर दिन चारे-पानी की व्यवस्था की जाए. एक मोटा अनुमान है कि हर दिन प्रत्येक गांव में लगभग 10 से 100 तक मवेशी खाना-पानी के अभाव में दम तोड़ रहे.

भूखे -प्यासे जानवर हाईवे पर बैठ जाते हैं और इनमें से कई सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं और कई चारे और पानी के अभाव में कमजोर होकर मर रहे हैं. किसानों के लिए यह परेशानी का सबब बनी हुई हैं क्योंकि उनकी फसलों को मवेशियों का झुंड चट कर जाता है. 

पिछले दो दशकों से मध्य भारत का अधिकांश हिस्सा तीन साल में एक बार अल्प वर्षा का शिकार रहा है. यहां से रोजगार के लिए पलायन की परंपरा भी एक सदी से ज्यादा पुरानी है, लेकिन दुधारू मवेशियों को मजबूरी में छुट्टा छोड़े देने का रोग अभी कुछ दशक से ही है. ‘‘अन्ना प्रथा’’ यानि दूध ना देने वाले मवेशी को आवारा छोड़ देने के चलते यहां खेत व इंसान दोनों पर संकट है. उरई, झांसी आदि जिलों में कई ऐसे किसान हैं. जिनके पास अपने जल ससांधन हैं लेकिन वे अन्ना पशुओं के कारण बुवाई नहीं कर पाए. जब फसल कुछ हरी होती है तो अचानक ही हजारों अन्ना गायों का रेवड़ आता है व फसल चट कर जाता है. यदि गाय को मारो तो धर्म-रक्षक खड़े हो जाते हैं और खदेड़ो तो बगल के खेत वाला बंदूक निकाल लेता है. गाय को बेच दो तो उसके व्यापारी को रास्ते में कहीं भी बजरंगियों द्वारा पिटाई का डर. दोनों ही हालात में खून बहता है और कुछ पैसे के लिए खेत बोने वाले किसान को पुलिस-कोतवाली के चक्कर लगाने पड़ते हैं. यह बानगी है कि हिंदी पट्टी में एक करोड़ से ज्यादा चौपाये किस तरह मुसीबत बन रहे हैं और साथ ही उनका पेट भरना भी मुसीबत बन गया है. 

यहां जानना जरूरी है कि अभी चार दशक पहले तक हर गांव में चारागाह की जमीन होती थी. शायद ही कोई ऐसा गांव या मजरा होगा जहां कम से कम एक तालाब और कई कुंए नहीं हों. जंगल का फैलाव पचास फ़ीसदी तक था. आधुनिकता की आंधी में बह कर लोगों ने चारागाह को अपना ‘चारागाह’ बना लिया व हड़प गए. तालाबों की जमीन समतल कर या फिर घर की नाली व गंदगी उसमें गिरा कर उनका अस्तित्व खत्म कर दिया. हैंड पंप या ट्यूबवेल की मृगमरिचिका में कुंओं को बिसरा दिया. जंगलों की ऐसी कटाई हुई कि अब बुंदेलखंड में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी नहीं बची है व वन विभाग के डिपो तीस सौ किलोमीटर दूर से लकड़ी मंगवा रहे हैं. जो कुछ जंगल बचे हैं वहां मवेशी के चरने पर रोक है. 

अभी बरसात बहुत दूर है. जब सूखे का संकट चरम पर होगा तो लोगों को मुआवजा, राहत कार्य या ऐसे ही नाम पर राशि बांटी जाएगी, लेकिन देश व समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पशु-धन को सहेजने के प्रति शायद ही किसी का ध्यान जाए. अभी तो औसत या अल्प बारिश के चलते जमीन पर थोड़ी हरियाली है और कहीं-कहीं पानी भी, लेकिन अगली बारिश होने में अभी कम से कम तीन महीना हैं और इतने लंबे समय तक आधे पेट व प्यासे रह कर मवेशियों का जी पाना संभव नहीं होगा. बुंदेलखंड में जीविकोपार्जन का एकमात्र जरिया खेती ही है और मवेशी पालन इसका सहायक व्यवसाय. यह जान लें कि एक करोड़ से ज्यादा संख्या का पशु धन तैयार करने में कई साल व कई अरब की रकम लगेगी, लेकिन उनके चारा-पानी की व्यवस्था के लिए कुछ करोड़ ही काफी होंगें. हो सकता है कि इस पर भी कुछ कागजी घोड़े दौड़े लेकिन जब तक ऐसी योजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी में संवेदनशील लोग नहीं होंगे, मवेशी का चारा इंसान के उदरस्थ ही होगा.


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