ख़ुदकुशी ही अकेला रास्ता!

रपट , , रविवार , 17-12-2017


Selfishly the only way

रचना पाण्डेय

इसका सही-सही आंकड़ा किसी के पास उपलब्ध नहीं होगा कि हर साल कितने किसान आत्महत्या करते हैं. कुछ की ख़ुदकुशी पर हंगामा मचता है और बाक़ी की सामान्य मौत करार देकर उनकी अंत्येष्टि करवा दी जाती है. ऐसा एक-दो साल से नहीं बल्कि वर्षों से चला आ रहा है. किसान की आत्महत्या 

के पीछे बस एक ही रटी-रटाई कहानी कही जाती है कि उसने 

क़र्ज़ से परेशान होकर या फसल चौपट हो जाने के कारण ख़ुदकुशी कर ली. 

किसानों की इन्हीं परेशानियों को उजागर करने के लिए आन्दोलन होते हैं. लेकिन एक बात गौर करने लायक यह है कि किसान आंदोलनों की शक्ल अब बदली है. पिछले एक दशक में किसानों के जितने भी आन्दोलन हुए उनका जोर नकदी फसलों का वाजिब दाम न मिलने अथवा भूमि अधिग्रहण की कीमत कम होना भी है. पहले की तरह जमींदारों की या महाजनों की लूट-खसोट अब मुद्दा नहीं रहा. 

किसान की अन्नदाता की छवि भी अब बदली है. जिसमें उसकी फसल का भरपूर पैसा मिलता है वह वही फसल पैदा करता है मसलन प्याज, तम्बाखू या उन्नत किस्म का बासमती चावल आदि. इसकी वज़ह है बाज़ार पर बढ़ता उपभोक्ता वस्तुओं का दबाव. यह दबाव अब गेहूँ, दलहन, धान या तिलहन से हटकर विभिन्न तरह के वेजिटेबल आयल, खुशबूदार बासमती चावल और एमपी के गेहूं का है अथवा प्याज, तम्बाखू आदि चीजों का है. इन्हें चाहिए नमी, पानी और आधुनिक किस्म की खाद और बीज. इनमें से किसी का भी टोटा पड़ा या मौसम दगा दे गया तो फसल गई. लेकिन भरपूर फसल लेने तथा ज्यादा से ज्यादा कृषि जमीन पर यही वस्तुएं बोने की हवस का नतीजा यह होता है कि जब फसल बर्बाद होती है तो प्रकृति कतई दया नहीं करती. किसान के पास उपज तो शून्य हो जाती है लेकिन घर के खर्च और बैंक का ब्याज बढ़ता रहता है. अब किसान इतना बेशर्म नहीं होता कि वह कर्ज़दार होकर भी मुस्कराता रहे या क़र्ज़ न दे पाने का कोई तोड़ निकाल ले. नतीजतन वह हताशा में ख़ुदकुशी कर लेता है. 

पिछले तीन दशकों से हर साल कोई 10 हज़ार किसान ख़ुदकुशी कर लेते हैं. सरकार या मीडिया कोई भी इस और ध्यान नहीं देता, वह तो शुक्र हो पी. साईंनाथ का जिन्होंने ख़ुदकुशी कर लेने वाले किसानों का आंकड़ा निकलवाया और सरकार को बताया कि आखिर क्या वज़ह है कि हर वर्ष अन्नदाता इतनी बड़ी तादाद में आत्महत्या कर रहा है. शुरू में ये रपटें महाराष्ट्र से आईं. जल्दी ही आंध्रप्रदेश से भी आत्महत्याओं की खबरें आने लगीं. शुरुआत में लगा की अधिकांश आत्महत्याएँ महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कपास उत्पादक किसानों ने की हैं, लेकिन महाराष्ट्र के राज्य अपराध लेखा कार्ययालय से प्राप्त आँकड़ों को देखने से स्पष्ट हो गया कि पूरे महाराष्ट्र में कपास सहित अन्य नकदी फसलों के किसानों की आत्महत्याओं की दर बहुत अधिक रही है. 

आत्महत्या करने वाले केवल छोटी जोत वाले किसान नहीं थे बल्कि मध्यम और बड़े जोतों वाले किसानों भी थे. राज्य सरकार ने इस समस्या पर विचार करने के लिए कई जाँच समितियाँ बनाईं. तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य सरकार द्वारा विदर्भ के किसानों पर व्यय करने के लिए 110 अरब रूपए के अनुदान की घोषणा की. इस दृष्टि से 2009 तो अब तक का सबसे खराब वर्ष था जब भारत के राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय ने सर्वाधिक 17368 किसानों के आत्महत्या की रपटें दर्ज कीं. सबसे ज्यादा आत्महत्याएँ महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई थीं. इन पांच राज्यों में 62 प्रतिशत आत्महत्याएं दर्ज की गईं.  

भारत के ज्यादातर छोटे किसान कर्ज लेकर खेती करते हैं. कर्ज वापस करने के लिए यह जरुरी है कि फसल अच्छी हो. हमारे देश में सिंचाई की सुविधा बहुत कम किसानों को उपलब्ध है. ज्यादातर किसान खेती के लिए वर्षा पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में यदि मानसून ठीक न रहा तो फसल पूरी तरह बरबाद हो जाती है.  किसान की सारी मेहनत बरबाद हो जाती है. वर्ष भर खाने के लिए भी कुछ नहीं रहता, साथ में कर्ज चुकाने का बोझ अलग. मानसून की विफलता, सूखा, कीमतों में वृद्धि, ऋण का अत्यधिक बोझ आदि परिस्तिथियाँ किसानों के लिए समस्याओं के एक चक्र की शुरुआत करती हैं. ऐसी परिस्थितियों में वे बैंकों, महाजनों, बिचौलियों आदि के चक्र में फँस जाते हैं. कई किसान कर्ज के दबाव को सह नहीं पाते और आत्महत्या कर लेते हैं. किसान की आत्महत्या के बाद पूरा परिवार उसके असर में आ जाता है. बच्चे स्कूल छोड़कर खेती-बाड़ी के कामों में हाथ बँटाने लगते हैं. परिवार को कर्ज की विरासत मिलती है और इस बात की आशंका बढ़ जाती है कि बढ़े हुए पारिवारिक दबाव के बीच परिवार के कुछ अन्य सदस्य कहीं आत्महत्या ना कर बैठें. 

किसान की आत्महत्या पूरे देश के लिए शर्म की बात है. देश की केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों को किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए युद्धस्तर पर प्रयत्न करने की आवश्यकता है. भारत जैसे कृषिप्रधान देश में यदि किसानों की ऐसी अवस्था हो तो हमारी प्रगति और विकास की सारी बातें, हमारी सारी उपलब्धियाँ अर्थहीन हैं. 


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