सांप्रदायिकता की प्रायोजित आंधी के विरुद्ध बशीरहाट

धर्म , , मंगलवार , 01-08-2017


Sampradayikta ki prayojit aandhi ke virudha Basirhat

प्रभात पाण्डेय

बशीरहाट के मयलाखोला मुहल्ले के ‘मायेर इच्छा मंदिर’ के पुजारी हरिपद बनर्जी मरने के बाद दफ़न होना चाहते थे. लेकिन वहां के हिंदू दफ़नाने के तौर-तरीकों से वाकिफ़ नहीं थे. ऐसे में उसी मुहल्ले के गुलाम रसूल सरदार और उनके साथियों ने मिलकर पुजारी के मृत शरीर को दफ़नाया. यह घटना 2006 की है. तब से वहां पर बना हुआ स्मारक अपनी शानदार गुम्बद के साथ तन कर खड़ा है. पिछले दिनों जब बशीरहाट और उसका इर्द-गिर्द साम्प्रदायिकता के नाम पर कुछ असामाजिक तत्वों के कारण आग में झुलस रहा था, मयलाखोला के हिंदू दिन-रात निगरानी रखते हुए सुनिश्चित कर रहे थे कि गुलाम रसूल और उनके साथी सपरिवार सुरक्षित रहें और वहां की किसी भी मज़ार को खरोंच तक न लगे.

यह इत्तिफ़ाक़ ही है कि 9 जुलाई 2017 के ‘द टेलीग्राफ’ में छपी इस ख़बर को पढ़ने के ठीक पहले ही मैने सबा नक़वी की किताब ‘इन गुड फेथ’ पढ़ कर खत्म की थी. पत्रकार सबा की यह पुस्तक उनकी पत्रकारिता संबंधित यात्राओं के साथ-साथ उनकी ही एक अलग यात्रा है जो सभी समुदायों के लिए सहिष्णु और सुरक्षित भारत की खोज है. इस यात्रा के पड़ाव में हिंदू सभ्यता के नाम से परिभाषित समधर्मी परम्पराएं हैं जो मोटे तौर पर मुस्लिम समुदाय के बीच हैं, लेकिन उनमें गैर-मुस्लिमों की भागीदारी बखूबी है. यह यात्रा पश्चिम बंगाल से शुरू होकर देश के उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम के कई मुक़ामों पर हमारी सांस्कृतिक समग्रता का अहसास कराते हुए हमें अपनी समन्यवादी परम्पराओं से रूबरू कराती है.

सबा की इस यात्रा का पहला पड़ाव पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले का नया गांव  है जहां के रहने वाले 15वीं/16वीं शताब्दी में जगन्नाथ के प्रचार के लिए विकसित ‘पटचित्र’ कला से जीविकोपार्जन करते हैं. ये कलाकार पीढ़ियों से हिंदू देवी-देवताओं के चित्र बनाते रहे हैं. गो कि इन चित्रकारों की पहचान मुसलमान के रूप में है, पर इनके धार्मिक रीति-रिवाज मिले-जुले हैं. इनके यहां विवाह की तारीख़ हिंदू कैलेंडर की तिथि के मुताबिक तय होती है लेकिन निकाह की विधि काजी संपन्न करवाता है. औरतें पर्दा नहीं करतीं, और हिंदू स्त्रियों की तरह विवाहिताएं मांग में सिंदूर लगाती है. ये लोग जिस उत्साह से ईद मनाते हैं, उसी उत्साह से दुर्गापूजा भी.

बंगाल के सुंदरवन में पहुंचकर सबा, यह बताते हुए कि इस्लाम में देवी-देवता नहीं होते, वहां की ‘आराध्य वनबीबी’ का ज़िक्र करते हैं जो स्थानीय लोगों के मुताबिक एक मुसलमान देवी हैं. इस्लाम में मूर्तिपूजा वर्जित होने के बावजूद सुंदरवन के निवासी – हिंदू और मुसलमान – वनबीबी की मूर्ति की पूजा करते हैं. दरअसल सुंदरवन वालों ने वहां के पर्यावरण के अनुरूप अपने लिए एक ऐसा धर्म विकसित कर लिया है जो जीववाद, हिंदू की शक्ति-आराधना की परम्परा और सूफिज्म का अद्भुत संगम  है. वहां के मंडपों-मंदिरों में एक क़तार में स्थापित तीन मूर्तियां देखी जाती हैं – दुर्गा-सी वनबीबी, बाघ-से दक्षिण राय तथा पीर की तरह गाज़ी मियां.

सबा कोलकाता के तपसिया इलाके के ‘मानिक पीर’ के मज़ार पहुंचकर बताती हैं कि इसे एक हिंदू ब्राह्मण ने बनवाया है. दरअसल उनकी मुलाकात बिमान भट्टाचार्या नामक एक व्यक्ति से हुई थी जो कोलकाता के मशहूर काली मंदिर के पुजारी थे. बिमान रोज ही काली मंदिर जाते तो थे, लेकिन उनकी मानिक पीर के प्रति भी वैसी ही श्रद्धा थी. यही वजह है कि उन्होंने मानिक पीर की मजार बनवाई. वे कई सालों तक हर वृहस्पतिवार वहां आते थे, पूजा करते थे और प्रसाद बांटते थे.

सबा कहती हैं कि हम ‘शिवाजी’ के जीवन के उसी पक्ष को जानते हैं जो उनको हमेशा सेना-नायक के रूप में मुगलों के खिलाफ़ खड़ा करते हुए किसी खास समुदाय से जोड़ता है. हम यह नहीं जानते कि उनकी पीढ़ियों की सूफी फ़कीरों में आस्था रही है. शिवाजी के दादा मालोजी ने अहमदनगर से 70 किलोमीटर की दूरी पर बसे शेख मोहम्मद नामक एक सूफी संत को जमीन दी थी. ये वही शेख मोहम्मद हैं जिन्होंने पवन विजय, भक्ति बोध और आचार बोध लिखने के साथ-साथ सूफिज्म और वेदांत की समानताओं का जिक्र किया और हिंदू तथा मुस्लिम शास्त्रों की अभिव्यक्तियों में एकरूपता का विवेचन भी. वैसे मालोजी खुद अहमदनगर के पास के रहनेवाले शाह शरीफ के भक्त थे जिससे उन्हें पुत्र-प्राप्ति का आशीर्वाद मिला था. मालोजी के यहां जब दो पुत्र पैदा हुए तो उनका नाम इसी सूफी फकीर के नाम पर शाहजी (शिवाजी के पिता) और सेरफ़ोजी रखा गया. शिवाजी भी खुद सैयद यकूब नाम के सूफी संत में आस्था रखते थे और हर सैन्य-अभियान के पहले उनसे परामर्श कर उनका आशीर्वाद लेते थे.

थाणें की हाजी मलंग की मजार, जहां उर्स महोत्सव के समय विभिन्न धर्मों के लोग हजारों की तादाद में एकत्रित होते हैं, उसका इंतजाम एक ब्राह्मण परिवार पीढ़ियों से कर रहा है. सबा से काशीनाथ गोपाल केतकर ने कहा था कि उनके पूर्वजों ने उनसे कहा था कि बाबा हाजी मलंग सभी धर्मों का सम्मान करते थे जिस कारण इस दरगाह पर इबादत का कोई खास तौर-तरीका नहीं है.

राजस्थान में लोक देव-देवताओं की अधिक मान्यता है. वहां के प्रमुख पांच पंथ हैं – तेजाजी पंथ, पाबुजी पंथ, मेहाजी पंथ, गोगाजी पंथ तथा रामदेवजी पंथ. इनमें से गोगाजी तथा रामदेवजी हिंदू एवं मुसलमान दोनों के आराध्य है. किंवदंतियों के मुताबिक रामदेव तोमर राजपूत थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन जाति-प्रथा के खिलाफ और गरीबी उन्मूलन में व्यतीत किया. इनको हिंदू विष्णु का अवतार कहते हैं तो वहीं मुसलमान मानते हैं कि मशहूर सूफी संत समस पीर का पुनर्जन्म रामदेव के रूप में हुआ जिस कारण वे उन्हें रामस पीर के नाम से संबोधित करते हैं. सिखों का एक वर्ग भी है जो रामदेव को दसवें गुरु का अवतार मानता है. रामदेव बाबा के धार्मिक स्थल गो कि राजस्थान के सैकड़ों गांवों में हैं, लेकिन मुख्य मंदिर जैसलमेर जिले के पोखरण से तकरीबन 13 किलोमीटर की दूरी पर बसे रामदेवरा गांव में है.

सबा की इस यात्रा में हम पुरी की रथयात्रा से भी रूबरू होते हैं जब जगन्नाथ मंदिर से निकले तीन रथों में से दो रथ – बलराम और सुभद्रा के – मौसी के घर गुंडीचा मंदिर की ओर बढ़ जाते हैं, लेकिन जगन्नाथ का रथ ‘सालेबेग’ मठ के पास थोड़ी देर के लिए रुकता है फिर आगे बढ़ता है. सालेबेग के पिता मुगल रईस जहांगीर कुली खान लालबेग को अकबर ने 1590 में अफगानी विद्रोहियों को दमन करने के लिये गए मानसिंह की सहायता करने के लिए भेजा था. लालबेग बाद में बिहार और उसके बाद बिहार प्राविंस के (जिसमें उड़िसा भी शामिल था) सूबेदार बने. लालबेग ने वहीं पर एक विधवा ब्राह्मणी से विवाह किया था. लड़ाई के मैदान में लालबेग की मृत्यु हो गई थी और सालेबेग बुरी तरह से जख्मी हो गए थे. तब उनकी मां विधवा ब्राह्मणी ने उनसे कृष्ण की आराधना करने को कहा था और ऐसा करके ही वे पूरी तरह स्वस्थ हुए. बाद में सालेबेग ने पुरी में ही जगन्नाथ मंदिर के करीब में अपना मठ बनाया और वहीं रहकर कृष्ण का भजन-कीर्तन करके जीवन व्यतीत करने लगे. सालेबेग के सैकड़ों भजन आज भी उड़ीसा के कोने-कोने में सुनने को मिलते हैं.

ऐसे में यदि बशीरहाट के मयलाखोला मुहल्ले के लोग साम्प्रदायिकता की प्रायोजित आंधी के विरुद्ध भेद-भाव को दरकिनार करते हुए एक-जुट खड़े रहे है तो यह आश्चर्य की बात नहीं है. आश्चर्य की बात तो यह है कि अगर आग घरवालों ने नहीं लगायी थी तो वे कौन थे जिनकी वजह से बशीरहाट धुआं-धुआं हुआ ? 

देखिए सरकारी तहकीकात में उनकी पहचान के नतीजे क्या निकलते हैं या यह बशीरहाट शांतिभंग के अंदेशे में सुलगता रहेगा ?

(लेखक गंभीर समाचार के सलाहकार संपादक हैं.)


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????? ???????? :: - 10-29-2017
बहुत अच्छा लेख। इसके माध्यम से बंगाल प्रदेश में हिन्दू-मुस्लिम साँझी संस्कृति एवं विरासत के संदर्भों का सटीक खुलासा हुआ है। आज के समय में ऐसे लेखों की बड़ी आवश्यकता है। सबा नक़वी की पुस्तक के सार से परिचित कराने हेतु भाई प्रभात पाण्डेय का.बहुत आभार।