सईद बाबा का थान

धर्म , , चयन करें , 17-12-2017


Place of Saeed Baba

लक्ष्मी शर्मा

सईद बाबा का थान मेरे पुरखों का ये गाँव, जहाँ मैं लगभग पैंतीस वर्ष पश्चात गई थी, एक छोटा सा अंदरेटे का गाँव है. लगभग पाँच सौ लोगों की आबादी वाले इस गाँव में ऐसी कोई विशेषता नहीं जिस के कारण इसे याद रखा जाए. सिवा सईद बाबा के एक तकिए के. लेकिन ऐसे तकिए, आस्ताने, इबादतगाह होना कोई नई और बड़ी बात भी नहीं है. ये हमारे धर्मप्राण देश में कहीं भी मिल जाते हैं, फिर? 

और इस ‘फिर’ के जवाब के लिए मुझे जल्दी ही मौका मिल गया, जब मुझे गाँव जाना पड़ा. और संयोग से मुझे इस अद्भुत साझी विरासत को देखने का सुअवसर मिला, राजस्थान के जयपुर जिले की जमुआ रामगढ़ तहसील स्थित अपने पैतृक गाँव मधुसूदनपुरा उर्फ़ बासड़ा में. नागफनी, खींप, बबूल और रेत के धोरों के बीच बलखाती डामर की पतली सी सड़क जहाँ जाकर खत्म होती है वो बासड़ा गाँव का वीर हनुमान मंदिर है. एक छोटा, सामान्य सा मंदिर जैसा मंदिर, मेरे पुरखों का पूजित मंदिर. मंदिर जाने के पहले मैंने इधर-उधर देखा, गाँव के कुछ लोगों से मिली. सभी तो वहाँ मेरे कुनबे के सदस्य थे क्योंकि दो घरों को छोड़ कर गाँव के शेष लोग मेरे अर्थात गौड़ ब्राह्मण समाज के पंचौली गौत्र के लोग हैं. 

मंदिर से बाहर आते ही मेरी दृष्टि दाहिनी ओर पड़ी, चार खंभों और एकमात्र दीवार वाली छत के नीचे सफेद मकराना पत्थर से मढ़ा चबूतरा मेरे लिए नई चीज है. मेरे कदम अनायास ही उधर उठ गए, मैंने देखा साफ-सुथरे संगमरमरी चबूतरे के बीचो-बीच रेशमी, गोटेदार लाल कपड़े से ढका एक आस्ताना है और आस्ताने के पीछे वाली दीवार पर मक्का-मदीना की छवि और अरबी में कुछ लिखा हुआ है. 

'ये क्या है?' मुझे कुतूहल हुआ तो मैंने साथ आए किशोर से पूछा. 

'ये सईद बाबा का थान है.' 

'गाँव में मुसलमान भी आ बसे क्या?' 

'ना बुआ जी, कोई मुसलमान नहीं है.' किशोर ने जवाब दिया. 

'फिर थान की सेवा-पूजा करने पास के गाँव से आते होंगे.' मैं चमत्कृत थी, लेकिन चमत्कृत होने की हद अभी खत्म नहीं हुई थी. 

'नहीं बुआ जी, आसपास के गाँव में भी कोई मुसलमान घर नहीं है.' 

'अरे, फिर ये थान किसने बनवाया, और सेवा-पूजा कौन करता है.' 

'ये थान अपने कुनबे के ही रामअवतार काका और उनके भाई ने मिल कर बनाया था पच्चीस बरस पहले, और अब हम सब मिल के सेवा कर लेते हैं. बड़े चमत्कारी पीर हैं बुआजी. साक्षात परचा देते हैं.' लड़का अभिभूत होकर सईद बाबा का गुणगान कर रहा था और मैं अभिभूत थी हमारे जन-मानस और लोक की एकात्मता पर. 'और बुआ जी हम लोग साल में एक बार यहाँ उर्स भी करवाते हैं. जैपुर से कव्वाली गाने वालों को बुलाते हैं, आसपास के गाँवों से खूब लोग आते हैं, जैपुर, दौसा, जमुआ रामगढ़ तक से भी. हिन्दू-मुसलमान दोनों ही आते हैं. उन पाऊणों की मान-मनुहार भी हम गाँव के लोग ही करते हैं.' लड़का अपनी धुन में बता रहा है और मैं सजल नैत्र, रुद्ध कंठ खड़ी उस बारगाह को देख रही हूँ जो मेरे देश की असली अस्मिता है, उसका सत्व है. 

'फूफाजी, सईद बाबा को अगरबत्ती के साथ सिगरेट भी पसन्द है.' मेरे अभी-अभी बने भतीजे ने कहा तो मैं अपनी भावुक तंद्रा से बाहर आ कर हँस पड़ी. इसी को कहते हैं जैसे हम वैसे हमारे देव, इस क्षेत्र में तम्बाकू पीना स्त्री-पुरुष सभी को बहुत पसंद है तो हमारे आराध्य को क्यों न हो. 

सारे रास्ते मैं सोचती रही कि हमारे देश में सांस्कृतिक विविधता के बाहुल्य और उनके प्रति आम जन की निर्द्वन्द्व लोक आस्था हमारी वो ताक़त है जो हमें समस्त विश्व में सबसे अलग, सबसे ऊपर और स्पृहणीय बनाती है. हमारी संस्कृति ऊपर से नज़र आती गंगा-जमुनी धारा का मेल मात्र नहीं अपितु वो अन्तरप्रवाही सरस्वती भी है जो सहस्रधाराओं के रूप में जनमानस में बहती चलती है. कितनी मजारें, आस्ताने, दरगाहें हैं जिनकी देखभाल और पूजा हिन्दू करते हैं. कितने हिन्दू देवालय और तीर्थ स्थान है जिनकी खिदमत मुसलमान करते हैं. 

जयपुर में गट्टे वाले बाबा के यहाँ उर्स ही नहीं, भजन कीर्तन और हवन तक होता है. राजस्थान में रामदेवरा के मंदिर जाने वाले मुस्लिम श्रद्धालुओं की संख्या उतनी ही है जितनी अजमेर के ख्वाजा चिश्ती के उर्स पर जाने वाले हिंदुओं की है. जितने लोग मस्जिदों में सजदा करते हैं उतने ही लोग हिन्दू मंदिरों के आगे सर झुकाते हैं और अमरनाथ यात्रा का आरम्भ छड़ी मुबारक के साथ कश्मीरी मुसलमान करते हैं. और ये अखूट, अकृत्रिम श्रद्धा शहरी दिखावा पसंद संस्कृति से ज्यादा भारत की आत्मा रूपी गाँवों में ज्यादा सहज, अकुंठ रूप में बसी दिखती है. 

सैयदपीर बाबा की मज़ार

जयपुर का नदी वाले सैयदपीर बाबा की मज़ार भी हमारी इसी गंगा जमुनी तहजीब की बेमिसाल नज़ीर है. या कह सकते हैं कि ऐसी जगहें ही हमारी कौमी एकता और हिन्दुस्तान की असली अस्मिता को बताती है. पुराने शहर की घनी हिन्दू बहुल आबादी के बीच स्थित इस मज़ार की विलक्षण बात ये है कि इसकी सेवा पूजा हिन्दू जन करते हैं. और इससे भी अधिक विलक्षण है यहाँ स्थित भैरों जी का मन्दिर और सिद्ध पीठ. जिस धर्म में धर्मस्थल पर किसी भी प्रकार का संगीत वर्जित हो वहाँ भजन कीर्तन होता है,होली पर फाग का धमाल होता है, सिद्ध पीठ पर मन्त्रोच्चार के साथ हवन होता है. लगभग ढाई सौ साल पुरानी ये मज़ार हज़रत निजामुद्दीन औलिया का चिल्ला माना जाता है. साम्प्रदायिक सौहार्द के इस स्थान पर मात्र धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं होते अपितु प्रत्येक गुरुवार को लंगर का आयोजन होता है, साल में एक बार विशाल आम भोज का आयोजन होता है जिसमें सभी धर्म के लोग आर्थिक सहयोग देते हैं. यही नहीं, वर्ष में दो बार रक्तदान शिविर भी लगता है. हिन्दुओ के द्वारा पूर्णतया मुस्लिम धर्म के रीति रिवाज से पूजित इस मज़ार पर वर्ष पर्यन्त हिन्दू मुस्लिम दोनों धर्म के भक्त श्रद्धा पूर्वक आते हैं और साल में एक बार जनवरी के महीने में यहाँ उर्स लगता है जिसमें हिन्दू मुस्लिम सभी चादर चढ़ा कर खिराजे अकीदत पेश करते हैं. और दोनों धर्मो के श्रद्धालुओं का अकाट्य विश्वास है कि यहाँ आकर मन्नत पूरी होती है और एक सकारात्मक ऊर्जा व्यक्तित्व में संचारित होती है. और इस तरह के स्थानों में ही हमारे देश की मूल आत्मा बसती है, हमारी अस्मिता का स्पंदन है ये स्थान. जब तक ये हैं तब तक हिन्दुस्तान का दिल धड़कता है, साझी तहजीब के स्पंदन में.  


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