अजान की गूँज और शंखनाद साथ-साथ !

धर्म , , रविवार , 17-12-2017


Aajan echoes and conch shells together

हेमंत शेष

अजमेर ..... रणबाँकुरे नायक पृथ्वीराज चौहान के वक़्त कभी रही देश की राजधानी ….. राजस्थान का एक छोटा खूबसूरत सा शहर - अरावली की सख्तजान चट्टानों के बीच इतिहास जहाँ चप्पे-चप्पे पर बिखरा है और जिस के ज़र्रे-ज़र्रे पर लिखी हुई हैं रोंगटे खड़ी कर देने वाली, आँखें भिगो देने वाली अमर गाथाएं शौर्य, बलिदान, भक्ति और प्रेम के अनेक इतिहास-प्रसंग. अपने लम्बे सेवा-काल में यों तो प्रान्त के अनेक जिलों में पदस्थापित रहने का सुयोग हुआ और जहाँ सरकार ने नहीं भेजा, वहां खुद अपनी इच्छा से एक उत्सुक पर्यटक की तरह हो आया. इस तरह पूरी हुई इन 33 जिलों की परिक्रमा जो भारत के सबसे बड़े और सब से विलक्षण प्रान्तों में से एक - राजस्थान - में 3,42,239 वर्ग किलोमीटर के बीच फैले हैं - कुछ ऊंघते, कुछ भागते, कुछ जल्दी-जल्दी चेहरा बदलते, कुछ तेज़ रफ़्तार, कुछ सुस्त जिले! अजमेर इन सब का मिला-जुला शहर है. 

याद आता है - अजमेर में मेरा पदस्थापन एक दफा नहीं, तीन बार रहा है. उस अपेक्षाकृत लम्बे ठहराव के दौरान अजमेर जैसी ऐतिहासिक नगरी के बारे में हर दिन, हर सप्ताह मेरी याददाश्त की किताब में दिलचस्प सूचनाओं जानकारियों जगहों और लोगों के बारे में सफे जुड़ते गए हैं. अकेले अजमेर की ‘प्रवास डायरी’ दिमाग की शेल्फ में काफी भारी हो चली है, पर आपको तफसीलों में घसीट कर उबाना मेरा मकसद नहीं, केवल मोटी-मोटी बातें जो मुझे याद हैं, साझा करता हूँ. 

अजमेर का राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक इतिहास बड़ा रंगारंग रहा है - उन रंग बिरंगे कपड़ों (कांचली, घाघरा, लूगड़ियों) और तरह-तरह के गहनों की तरह, जो इस तरफ की ग्रामीण औरतें पहनती हैं. अजमेर का किला तारागढ़ (गढ़ बीटली) भारत का पहला पहाड़ी किला है, जिसे इतिहासज्ञ ‘दूसरा जिब्राल्टर’ लिखते आये हैं, ख्वाजा मुईनुद्दीन की दरगाह और पड़ोसी क़स्बे पुष्कर का ‘ब्रह्मा मंदिर’ बेहद लोकप्रिय और मशहूर पर्यटक स्थल हैं, ब्रिटिशकालीन शिक्षण संस्था मेयो कॉलेज, दयानंद सरस्वती जी का निर्वाण-स्थल (और ‘आर्य-समाज’ का कार्य-स्थल भी) यहाँ हैं. लगभग तीन हज़ार पुरानी लैड (सीसे) की खदानें भी - गौरी-कुंड से चलिए और अजयपाल की पहाड़ियों तक जाइए ..... लोग बतला देंगे ये पुराने कई महात्माओं की ‘तपस्थली’ भी है, यहाँ फ़ैली हैं ऋषियों के शाप और वरदान की भूमियाँ : नरवर, नांद,सूरजकुंड, काबरा पहाड़, बूढ़ा पुष्कर, नाग-पहाड़ सब - इसी अजमेर की पुरातनता के गवाह हैं, अजमेर का शहर अगर सौ से भी ज्यादा खूनी लड़ाइयों का समर-स्थल रहा है तो यह भू-भाग अनेक बार प्रकृति के भयानक कोपों- सूखे और अकाल की विभीषिकाओं का साक्षी, जिन की भयंकरता के बारे में मेरवाडा-इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं... खैर, अजमेर के सब से बड़े प्रेमी और यहाँ के स्थाई-निवासी बालविवाह निषेध क़ानून के निर्माता स्व. हरबिलास शारदा साहब तो इसे भारत के कुछ सब से सुन्दर नगरों में गिनते हुए लिखते हैं कि पुराने वक्तों में जो आई सी एस अधिकारी कश्मीर से पोस्टिंग जे बाद यहाँ पदस्थापित होते थे उन्हें पहाड़ियों से घिरा और आनासागर झील से सजा ये नगर, खास तौर पर बारिश की ऋतु में, वहां बिताये पुराने दिनों की याद ज़रूर दिला देता था. आज भले तथाकथित शहरीकरण और ऊटपटांग विस्तार ने इसके उज्ज्वल आँचल पर पैबंद सा लगा दिया हो, सन उन्नीस सौ चालीस के आसपास अँगरेज़ फोटोग्राफरों ने यहाँ की जो स्याह-सफ़ेद या सीपिया तस्वीरें खींची हैं, उन्हें देखते हुए मुझे लगा -  शारदा साहब महज़ यहाँ के बाशिंदे होने के नाते अपने नगर-प्रेम की वजह से ही ऐसा नहीं लिख रहे होंगे - अजमेर कभी सचमुच ऐसा ही रहा होगा. 

अजमेर के उदयपुर की तरफ कभी रेल से जाइए तो किसी भी भारतीय ग्रामीण रेलवे स्टेशन जैसा ही है - नींद में डूबा सा एक छोटा सा स्टेशन - डूमाड़ा, जिसे अक्सर कोई देखता नहीं, न याद करता. पर अजमेर शहर  से कुछ आगे बसे डूमाड़ा  रोड, दौराई और सोमलपुर नाम के छोटे छोटे ग्रामों  के गांव के निकट एक विलक्षण सी दरगाह स्थित है - बाबा बादाम शाह की दरगाह. हरे भरे पहाड़ों की गोद में सोई, मकराना की खान से लाये धवल और कान्तिमान संगमरमर से निर्मित यह दरगाह दूर से ही आकर्षक नहीं लगती, पास से देखें तो इंडो-इस्लामिक शैली के बहुत सारे समन्वयों के कारण एक सुन्दर वास्तु-नमूना भी है.

हमारे मित्र शिवनारायण शर्मा (लेखन में नाम : डॉ. शिव शर्मा), जो शायद सन 2010 में सेवानिवृत्ति से पहले तीस से भी ज्यादा वर्षों तक राजस्थान अनेक राजकीय महाविद्यालयों में हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर और उपाचार्य आदि रहे और अब खुद भी  सपत्नीक एक सूफी संत जैसे ही वीतरागी हो गए हैं, अधिकांश समय बाबा बादामशाह की इस दरगाह में साधनारत रहते हैं. अब उनके स्वभाव का स्थाई भाव है - बैठे-बैठे अचानक आँख मूंदकर ध्यान लगाते ही गहरी समाधि में चले जाना और बहुत देर बाद पता नहीं लोगों के जगाने पर ही किस लोक की यात्राएं कर वापस संसार में लौटना. उन्होंने काव्यात्मक शब्दों में इस दरगाह के बारे में कहीं लिखा है -  “ ...यह दरगाह सूफी-चेतना की सादगी का मूर्तरूप है. पहाड़ी श्रृंखला की अनन्य शांतिदायी गोद में बनी हुई यह दरगाह वर्षाकाल में ऐसे लगती है मानो भक्ति-मग्न मेघों से बहते आंसुओं में भीग रही हो, और गुरु-पूर्णिमा को रात में यहां ऐसा प्रतीत होता है जैसे गुरु का आशीर्वाद चांदनी बन कर यहां के जर्रे-जर्रे पर टपक रहा हो. इस दरगाह के परिसर में किसी तपोबल का सा सम्मोहन है, भक्ति-भाव की शांति है, इबादत का सुकून है और उपासना की तृप्ति है. सामान्य जायरीन के लिए यह आस्था का पर्यटन-धाम है. साधकों के लिए रूहानियत का शक्ति केन्द्र और अध्यात्मविद् यहां विश्व-चेतना के संघनित आलोक में अपार शांति अनुभव करते हैं. सालाना उर्स में कव्वाली और भजनों के संगीत का जो मिला-जुला मंजर बनता है उसमें डूबने वालों पर मानो खुदा की रहमत का नूर बरसता है .....”

दरगाहें तो हिंदुस्तान या दुनिया भर में अनगिनत होंगी और उनके मानने वाले मुस्लिम ही क्यों, हर धर्म, और हर सम्प्रदाय के अनगिनत लोग भी होंगे, पर भारत में ‘सूफी उवैसिया सिलसिले’ की यह आठवीं दरगाह ऐसी है जहाँ दालान में अगर एक मस्जिद है तो इसी से जुड़ा शिव-मंदिर भी ! ‘उवैसिया सिलसिले’ की ही उत्तरप्रदेश में शेष पांच रामपुर में और दो झांसी में  निर्मित हैं. हिन्दू-मुस्लिम एकता या सर्वधर्म-समभाव का ही असर है कि यहां आने वाले जायरीन में न सिर्फ मुस्लिम बल्कि ज़्यादातर हिन्दू होते हैं. धर्मान्ध लोगों के लिए यहां पहला आश्चर्य तो ये ही है कि दरगाह के यहां ‘गुरु पद’ पर एक जनेऊधारी ब्राह्मण प्रतिष्ठित रहता आया है. इन पंक्तियों का लेखक, उक्त  डॉ. शिव शर्मा और प्रसिद्ध पत्रकार-लेखक अशोक आत्रेय जब वहां गए थे तो ‘चाचा जी’ के नाम से प्रसिद्ध एक वयोवृद्ध पंडित रजनीकांत मिश्र अपनी गुरूआनी समेत दरगाह के गुरु-रूप में पूजित और प्रतिष्ठित थे ..... दूसरा अचरज यह था कि दरगाह में ही शिवलिंग समेत बाकायदा एक शिव-मंदिर भी निर्मित है जिसकी खुद स्थापना बाबा बादाम शाह ने अपनी हाथों से की थी और तीसरा विस्मय यह कि यहां आने वाले अधिकतर जायरीन हिन्दू होते भी दरगाह पर फूल और चादर चढ़ाते, शिव-पूजन और अर्चन भी साथ-साथ किया करते आये हैं. लिखा मिलता है - “इस सिलसिले के प्रथम सूफी संत का पूरा नाम हजरत उवैस करणी रदीयल्लाह अनही है . बचपन में मां इन्हें ‘उवैस’ कहती थी और यमन प्रदेश में करण नामक गांव में इनका जन्म हुआ था. इस तरह ये हजरत उवैस करणी नाम से विख्यात हुए . इनके नाम उवैस को अमर रखने के लिए ही इनके सिलसिले का नाम ‘उवैसी’ रखा गया. इस परंपरा में आठवें संत हुए - बाबा बादाम शाह, जो मूलत: उत्तर प्रदेश के गालब गांव (मैनपुरी जिला) के निवासी थे. शुरुआत में उत्तर प्रदेश के ही किसी महकमे में सरकारी मुलाजिम भी रहे पर अपनी बहन और किसी एक पक्के हिंदू मित्र के प्रोत्साहित करने के बाद अपने प्रारब्ध की दिशा में आगे बढ़ते गुरु के आदेश से वे यहां आए. कुछ वक्त ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की संसार-प्रसिद्ध दरगाह में रहे, फिर आठ वर्ष तक उन्होंने पोशीदा रह कर बिना कोई तीन टप्पर बांधे अजमेर के नागपहाड़ पर घोर तपस्या की. फिर पहाड़ से उतर कर अजमेर में ‘फरीदा की बगीची’ और ‘गढ़ी मालियान’ में थोड़े-थोड़े समय ठहर कर वह इस शांत गाँव सोमलपुर आ गए जिसके आसपास हैं : हरियाली, एकांत और अरावली की कुछ सब से खूबसूरत और उन्नत चोटियाँ. बाबा 1946 से लेकर फना होने तक 1965 तक यहीं रहे : तपस्यारत, ध्यानमग्न, भावमग्न, परमात्म-प्रेम में निमग्न, जनसेवा में संलग्न...!  

उन्होंने यहीं एक सामान्य सांसारिक मनुष्य हरप्रसाद मिश्रा पर न सिर्फ ‘शक्तिपात’ ‘किया बल्कि मिश्र जी को सूफी और हिन्दू दर्शन की बारीकियों से भी परिचित कराया. किसी जीवनीकार  ने लिखा है - “ फलतः मिश्राजी ने उस रास्ते को जान लिया जो डगर परमात्मा तक जाती है. वे बाबा साहब के खादिम हो गए और गुरुकृपा से उस भक्ति भाव में डूबते चले गए जो जीवात्मा को परमात्मा से मिलाती है.” 

उवैसी-सिलसिला में सूत्र वाक्य ही यही है - ‘तत्वमसि’ अर्थात तुझ में ही परमात्मा है : यानी हिन्दू ,मुसलमान, ब्राह्मण और शूद्र आदि सभी में भगवान के दर्शन करो.” प्रेम के पथ पर गुरु के ध्यान में मग्न रहने वाले मिश्रा जी जन्मना पंडित होते हुए भी अन्ततः बादामशाह उवैसी कलन्दर की इच्छानुसार इस सिलसिले के बाकायदा नवें वारिस हुए और इस ईदगाह में अपने निधन 2009 तक आजीवन खिदमत करते रहे .

लोग कहते हैं एच. पी. मिश्रा नाम के ये सज्जन अजमेर-रेलवे में काम करते थे और जाने माने ट्रेड-यूनियनिस्ट होते हुए घोर नास्तिक और शुरू से ही मार्क्सवादी विचारों के थे - (पहले पहल शायद पचास के दशक में) कभी बाबा बादाम शाह का मखौल उड़ाने को ही यहाँ आये थे, पर पहली मुलाक़ात ही में वह सूफी संत के सरल, आकर्षक और सादा व्यक्तित्व के अलावा उनकी असामान्य ‘रूहानी शक्ति’ से इस कदर मुतासिर हुए कि सब झंझट छोड़ छाड़ कर रेलवे की नौकरी को नमस्ते कर के स्थाई रूप से यहाँ आ बसे ! ज़िन्दगी भर पढ़े-गुने मार्क्सवाद को एक झटके में तिलांजलि देते बाबा के एक खास खादिम उन्हीं हजरत हरप्रसाद मिश्रा उवैसी ने बाबा द्वारा किये एक असामान्य ‘शक्तिपात’ के बाद न सिर्फ उस सूफी पुरुष - बादाम शाह  का सीधा शिष्यत्व ग्रहण किया, बल्कि गुरु के सन उन्नीस सौ पैंसठ में दुनिया से फ़ना होने, (‘रूपोश होने’ या ‘पर्दा लेने’ के बाद) इस भव्य  दरगाह का निर्माण कराया. हरप्रसाद जी भारतीय उवैसिया शाखा के नौवें गुरु थे ! उनकी भव्य दरगाह भी यहीं पास है. हरप्रसाद जी की दरगाह में पहली बार उनके गद्दीनशीन पुत्र पंडित रामदत्त मिश्र से मैं शिव शर्मा के ज़रिये मिला था जिन्होंने ये प्रसन्नतापूर्वक जान  कर कि मैं भी उन्हीं की तरह ‘दुर्व्यसनी’ हूँ - बड़े प्रेम से रजनीगंधा और तकिये के नीचे से  बावा ब्रांड 160 नंबर का सुगन्धित ज़र्दा खिलाया था. उन्होंने अपने पिता का लिखा विपुलाकर ग्रन्थ : “देह से अदेह’ भी भेंट किया था - जो ग्राम दौराई में संचालित बाबा बादाम शाह आध्यात्मिक शोध संस्थान, उवैसिया रूहानी सत्संग आश्रम, डूमाडा रोड, अजमेर से बेहतरीन ढंग से सचित्र छपा है ! रामदत्त जी डॉ. शिव शर्मा के गुरु भाई थे और जब तक मैं अजमेर रहा बराबर उनके फोन आते रहे थे ..... ये पंक्तियाँ लिखते हुए खेद है, अवस्था ज्यादा न होते हुए भी रामदत्त मिश्र जी एकाएक सदा के लिए दूसरी दुनिया में चले गए  !

इस दरगाह में बाबा साहेब का अतिशय शांतिदायी मजार है, जहां बैठने पर वास्तव में सुकून मिलता है . पास में ही संगमरमर से निर्मित भव्य एक महफिलखाना है. दालान में एक मस्जिद है. दूसरे कोने में शिव-मंदिर है. “इस तरह दरगाह इबादत और आरती दोनों ही का संगम है.” बाबा बादामशाह उवैसी कलन्दर (‘कलन्दर’ यानी वह जो समरस भाव से स्वयं की व संसार की चिन्ता त्याग कर बस खुदा की इबादत में ही अहर्निश लीन रहता है)  की इस दरगाह का निर्माण कार्य अप्रैल 1996 से 1999 तक तीन वर्ष में पूरा हुआ था. इसके बाद सन 2005 ई. में यहाँ महफिलखाने व दरगाह का सौन्दर्यीकरण किया गया. परिसर का उद्यान विकसित किया गया. सन 2008 में एप्रोच रोड को चौड़ा एवं उसका फिर से डामरीकरण किया गया. दरगाह के मुख्य द्वार से पहले पार्किंग स्थल को भी चौड़ा कराया गया. 26 नवम्बर 1965 शुक्रवार को बाबा बादाम शाह का देहान्त हुआ था. प्रतिवर्ष रज्जब माह की 29 या 30 तारीख और एक शब्बान को इनका उर्स मनाया जाता है. इस में अजमेर के सैकड़ों लोग शामिल होते हैं. वर्तमान गुरु मुनेन्द्र दत्त मिश्रा ‘उवैसी’ के निर्देशन में सालाना उर्स के दौरान यहां भक्ति-भाव, आस्था, कव्वाली, भजन, बाबा का लंगर (भण्डारा) जिसमें हजारों अकीदतमंद आते हैं, का नजारा देखने लायक होता है .

यहाँ सुबह की अजान और शिवालय में शंखनाद एक 

साथ होते हैं ..... यह दरगाह महज़ एक दरगाह नहीं साम्प्रदायिकता के स्थाई विपक्ष में खड़ा वह हाथ है ..... जिसके हस्तक्षेप 

की ज़रूरत हमारे मनों पर जमी वैमनस्य धर्मान्धता और 

कट्टरता की कालिख को साफ़ करने के लिए  आज कहीं ज्यादा है!  


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