पटना

साहित्य के टिमटिमाते केंद्र , , रविवार , 25-03-2018


The patna

योगेंद्र कृष्णा

पटना में साहित्यिक गतिविधियों की एक लंबी गौरणपूर्ण और प्रेरक परंपरा रही है. बनारस के बाद पटना बहुत समय तक साहित्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा. और आचार्य शिवपूजन सहाय, बेनीपुरी, रामधारी सिंह दिनकर जैसे लेखक इस परंपरा को समृद्ध करते रहे. फिर आगे चलकर नागार्जुन और रेणु जैसी शख्सियतें नई पीढ़ियों के लिए अपनी रचनात्मकता, सरोकार और सौहार्दपूर्ण सहज व्यवहार की जो एक धमक छोड़ गईं वह आज की प्रतिकूलताओं से भरे जटिलतर होते साहित्यिक पर्यावरण में भी हवा के मुलायम स्पर्श की तरह कभी हमें छू कर जब निकलती है तो हमारे भीतर शर्मिंदगी का एक गहरा अहसास छोड़ जाती है.

लाख साहित्यिक उपलब्धियों, पुरस्कारों, सम्मानों के बाद भी आज हम अपने जीवन व्यवहार में अपनी महत्वाकांक्षाओं से दबे बहुत आत्ममुग्ध और बौने नज़र आने लगे हैं. यह दुखद है कि आज हम अपनी ही अपेक्षाओं के आईने में बहुत धुंधले दिख रहे.

प्रिय कवि कुंवर नारायण की ये पंक्तियां हमें अपने साहित्य-विवेक और जीवन-व्यवहार के बारे में अगर सोचने को विवश करती हैं तो अकारण नहीं : - 'कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है / एक जीवन दृष्टि--/ कि उसमें विनम्र अभिलाषाएं हों / बर्बर महत्वाकांक्षाएं नहीं / वाणी में कवित्व हो / कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं / कल्पना में इंद्रधनुषों के रंग हों / ईर्ष्या द्वेष के बदरंग हादसे नहीं / निकट संबंधों के माध्यम / से बोलता हो पास-पड़ोस / और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह / सुगठित और अकाट्य हो / जीवन विवेक.'

शहर की साहित्यिक हलचल या गतिविधियों का नब्ज़ टटोलना हो तो वर्तमान में जारी पटना पुस्तक मेले का जायजा लिया जा सकता है. पटना में इन दिनों पुस्तक मेला लगा है. लेकिन इस बार इसे मेला कहना उचित प्रतीत नहीं होता. यह एक पुस्तक प्रदर्शनी के रूप में ज्ञान भवन के वातानुकूलित हॉल में सिमट गया है. और साहित्यिक प्रकाशनों की सिमटती संख्या भी चिंताजनक है. पटना और पटना के बाहर के साहित्यकारों की उपस्थिति ज़रूर लगातार बनी हुई है, लेकिन कुछ अपवादों को अगर छोड़ दें तो पुस्तक-चर्चा, लोकार्पण आदि बेहद यांत्रिक ढंग से निपटाए जा रहे हैं. 

पिछले दिनों चर्चित वरिष्ठ कथाकार और रंगकर्मी हृषिकेश सुलभ ने एक दिन पटना पुस्तक मेले से उदास लौटते हुए अगर यह महसूस किया कि क्या पुस्तकें सचमुच एक दिन केवल संग्रहालय की वस्तु बन कर रह जाएंगी तो यह अकारण नहीं था. इतना ही नहीं, आगे चलकर तो संग्रहालयों, पुस्तकालयों पर भी खतरे मंडराने के पर्याप्त संकेत उभरने लगे हैं. कोई आश्चर्य नहीं अगर बहुत जल्द आप संग्रहालयों, पुस्तकालयों की जगह मॉल और मल्टीप्लेक्स खड़े पाएं. पटना के हिंदी भवन के साथ क्या हुआ..... साहित्य-संस्कृति के केंद्र के रूप में जिसकी स्थापना और स्वरूप निर्धारण हुआ उस भवन से साहित्य को विस्थापित कर उसमें आज मुख्य कलेक्ट्रेट कार्यालय को स्थानांतरित किया जा रहा है. ऐसी घटनाएं आने वाले संवेदनहीन और पूरी तरह यांत्रिक समय का रूपक ही तो रच रही हैं. 

दूसरी तरफ युवा पीढ़ी ने तो यहां तक समझ रखा है कि सारा ज्ञान जब गूगल के पास हो तो लेखकों और किताबों का क्या काम. इसलिए बिल्कुल नए, अभी-अभी जन्मे लेखकों के पास न तो साहित्य की विरासत या परंपरा की समझ बन पा रही है और न ही साहित्य का कोई इतिहासबोध. समझने की ज़रूरत है कि यह चेतना गूगल से तो हर्गिज प्राप्त नहीं हो सकती. 

ऐसे विद्रूप और प्रतिकूल परिदृश्य में भी जनवाद और प्रगतिशीलता के भारी-भरकम गट्ठर ढोते कला और कलावाद को कोसते हुए बहुत सारे लेखक आज दुबले हो रहे हैं, लेकिन समाज है कि बदलने का नाम नहीं ले रहा. और न ही साहित्यकारों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों की आत्ममुग्धता में कोई कमी आई. वे पहले से भी बढ़-चढ़कर साहित्य-उत्सवों, पुस्तक मेलों में शिरकत कर अपना चेहरा चमकाने और खुद के लिए सीढ़ियां बनाने की दिशा में ज्यादा उत्साहित दिख रहे, भले ही अपने चेहरे की धूल पहले से ही धूसर, धूल-धूसररित समाज के उस उपेक्षित वर्ग पर ही क्यों नहीं पड़ रही हो, और ये सीढ़ियां भी उनकी ही पीठ पर से क्यों न गुजरती हों जिनके विकास और बदलाव की बात वे अपने वक्तव्यों, और रचनाओं में करते नहीं अघाते. पुरानी पीढ़ी के लेखक हों या नई, ऐसे अवसरों पर वे जमीन से एक-दो इंच ऊपर ही चलते दिखाई पड़ते हैं. यहां की पुरानी पीढ़ी के अधिकतर लेखकों से नई पीढ़ी के लेखकों को किसी अच्छे संस्कार या रचनात्मक दिशा-निर्देश की कोई विशेष अपेक्षा भी नहीं दिखती. दिखे भी तो कैसे ..... उनके जीवन-व्यवहार और लेखन के बीच एक गहरी खाई दिखती है जो उन्हें उनसे दूर रखती है. बल्कि इस खाई की विरासत को भी युवा पीढ़ी बचाने में ही लगी है. समाज को दरअसल आप अपने लेखन से भी कहीं अधिक अपने जीवन-व्यवहार से ही बदलते हैं. आपके व्यवहार में अगर भीतर तक संवेदित कर देने वाली ईमानदार कशिश न हो तो फिर अपनी लेखनी और बौद्धिक बुनावट में कितने ही प्रखर, उदात्त और संवेदनशील क्यों न नज़र आएं, कहीं तो कोई सिरा, कोई तार आम पाठकों और समाज से असंग, निर्बंध छूट रहा है. कुंवर नारायण की कविता के उपर्युक्त अंश इसी संदर्भ में समझने की ज़रूरत है.

ऐसे स्याह साहित्यिक पर्यावरण में भी कुछ वरिष्ठ लेखक ऐसे भी ज़रूर हैं जो युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित और प्रेरित करने की कोशिश करते दिख जाते हैं. पिछले ही दिनों पुस्तक मेले में कर्मानंद आर्य के कविता संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर वरिष्ठ कवि अरुण कमल, जो नए कवियों को बेहद गंभीरता से सुनते हैं, ने अपने वक्तव्य में कहा कि हाल के वर्षों में जिन कवियों ने अपनी प्रतिभा और रचनाशीलता से संपूर्ण हिंदी जगत को प्रभावित और विस्मित किया है उनमें कर्मानंद आर्य अग्रणी हैं. 

लेकिन इसके ठीक उलट आलोक धन्वा, जो अपनी उपलब्धियों की पुरानी पूंजी को ही लगातार सहेजने में लगे हैं, नई प्रतिभाओं से जब मिलते हैं तो ऐसे कि जैसे उनसे बहुत पुराना और आत्मीय परिचय हो और जैसे कि उनकी बात वे गंभीरता और संलग्नता से सुन रहे हों, चेहरे पर एक आत्यंतिक नाटकीयता के भाव लिए. लेकिन दरअसल वे उस वक्त भी आपसे कम और खुद से ज्यादा बोल रहे होते हैं. एक बार तो एक नए कवि ने जब उनसे अपने पहले संग्रह (जो उसने उन्हें डाक से भेजा था) के बारे में पूछा तो उनका जवाब था, 'मिलल होई त ज़रूर होई, कौनो किताब हम फेंकी ला ना'.

बावजूद इसके आलोक धन्वा, अरुण कमल, जाबिर हुसेन, मदन कश्यप, अनिल विभाकर, हृषिकेश सुलभ, उषाकिरण खान, अवधेश प्रीत, प्रेमकुमार मणि, कर्मेंदु शिशिर, रामधारी सिंह दिवाकर, गोपी बल्लभ, सत्यनारायण, नंदकिशोर नवल, खगेन्द्र ठाकुर, तारानंद वियोगी आदि ने हमें बहुत कुछ महत्वपूर्ण और सहेजने लायक दिया है. इनमें से अधिकतर आज भी परिदृश्य में सक्रिय हैं. 

संतोष दीक्षित, प्रेमरंजन अनिमेष, मुकेश प्रत्यूष, राजकिशोर राजन, शरद रंजन शरद, शहंशाह आलम, शिवदयाल, विनय सौरभ, राकेश रंजन, प्रणय प्रियंबद, रमेश ऋतंभर, प्रत्यूषचंद्र मिश्रा, राकेश प्रियदर्शी, मुसाफिर बैठा, अजीत आजाद, अरुण नारायण, एम के मधु, संजय कुमार कुंदन, निखिलेश्वर वर्मा, डॉ. विनय कुमार, निवेदिता शकील, रानी श्रीवास्तव, भावना शेखर, प्रभात सरसिज, घनश्याम, असमुरारी नंदन मिश्र, समीर परिमल, रामनाथ शोधार्थी, नरेंद्र कुमार आदि कहानी, कविता और ग़ज़ल की दुनिया में अपने-अपने स्तर से नए वितान रचने का उद्यम कर रहे हैं. और अभी-अभी प्रकाशित और पटना पुस्तक मेले में लोकार्पित कर्मानंद आर्य का कविता संग्रह 'डरी हुई चिड़िया का मुकदमा', प्रत्यूष चंद्र मिश्रा का संग्रह 'पुनपुन और अन्य कविताएं', भावना शेखर का 'मौन का महाशंख' तथा चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत का उपन्यास 'अशोक राजपथ' निश्चित ही ताजा हवा के झोंके की तरह पर्यावरण में आया है.

पुस्तक भंडार जैसी प्रकाशन संस्थाएं जो एक समय पटना के साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करती थीं, या कॉफी हाउस जैसे रचनात्मक ठीहे तो अब पटना में नहीं रहे, फिर भी, अपने-अपने स्तर से समकालीन युवा लेखक प्रगतिशील लेखक संघ, जसम, आयाम, और बिल्कुल ही नई और नायाब पहल के रूप में ‘दूसरा शनिवार’ जैसे  अनौपचारिक मंचों द्वारा नए-पुराने लेखकों के बीच रचनात्मक संवाद और गोष्ठियों के माध्यम से पटना के साहित्यिक पर्यावरण को पुनर्नवा करने में जुटे हैं. इस संदर्भ में पटना से निकल रही कुछ पत्रिकाओं का जिक्र करना असंगत नहीं होगा. जाबिर हुसेन, जो खासकर डायरी विधा में अनोखे प्रयोग और भाषा की सहज-तरल भावप्रवणता के लिए जाने जाते हैं, 'दोआबा' के माध्यम से तथा शिवनारायण, जो स्वयं एक समकालीन कवि भी हैं, 'नई धारा' पत्रिका के माध्यम से पटना के साहित्यिक परिदृश्य को संवारने में भरसक अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं जो अत्यंत सराहनीय है. और इस तरह, पटना के साहित्यिक परिदृश्य में कुछ तो ऐसा है जो हम फिर-फिर उम्मीदों और उत्साह से भर जाते हैं. 


Leave your comment/अपनी प्रतिक्रिया दे