इलाहाबाद

साहित्य के टिमटिमाते केंद्र , , रविवार , 25-03-2018


The Lucknow

यश मालवीय

इलाहाबाद साहित्य की शिराओं में खून की तरह बहता रहा है. साहित्य के बैरोमीटर रहे इस शहर का एक अव्यय अतीत रहा है. निश्चित ही इलाहाबाद और काशी को माइनस कर दें तो हिंदी साहित्य का पचहत्तर प्रतिशत इतिहास अलिखा रह जाएगा. समय के माथे की सलवटों से सीधा सरोकार रखने वाला यह शहर साहित्य साधकों की तपस्थली रहा है. यही महाप्राण निराला ने रचा था – ‘वह तोड़ती पत्थर / देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर’ या ‘बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु / पूछेगा सारा गाँव बंधु.’ आज भी सिविल लाइंस के पत्थर गिरजा से कंपनी बाग की राह पर जाते भारती जी के ‘गुनाहों के देवता’ के चंदर और सुधा एक दूसरे में खोए से यहाँ प्रायः देखे जाते हैं. बच्चन के छंद आज भी यहाँ गूँजते हैं – ‘जाओ लाओ पिया नदिया से सोनमछरी.’ यहाँ नदियों का ही नहीं संस्कृतियों का भी संगम हुआ है. पंत-महादेवी की साँसें आज भी यहाँ की हवाओं में हैं. जनकवि कैलाश गौतम जब कहा करते थे – ‘याद तुम्हारी मेरे संग / वैसे ही रहती है / जैसे कोई नदी, किले से / सटकर बहती है’ या ‘जब से आया बम्बई, तब से नींद हराम / चौपाटी तुझसे भली, लोकनाथ की शाम.’

..... तो रोमांच सा हो जाता था, पर अब यह रोमांच खोता सा नजर आने लगा है. सूने और उदास से लगते इस शहर में बहुत कुछ ऐसा है जो पिछले दिनों टूटकर बिखर सा गया है. गंगा उदास लगने लगी है और यमुना अनमनी. हम कब तक नास्टेल्जिक होकर जीते रह सकते हैं. अतीत का गौरव गान हमें आश्वस्त नहीं बेचैन करने लगा है.

प्रसिद्ध संत-साहित्यकार फ़ादर कामिल बुल्के इसे अपना मायका कहा करते थे, पर इस मायके की माँ को ही जैसे वनवास दे दिया गया है. यद्यपि साहित्य की नयी पीढ़ी भी पूरे जोर-शोर से सक्रिय हो गयी है, पर वह काफ़ी हड़बड़ी में नजर आ रही है. उसके पास पर्याप्त धैर्य और पकाव का अभाव ठाठें मार रहा है. वह फेसबुक पर अपना चेहरा तलाश कर रही है. कविता पोस्ट कर रही है, ऐसी कविता जो सौ-पचास लाइक्स के बाद धुंध में कहीं बिला जाती है.

अभी जियाउल हक़, डॉ. अक़ील रिज़वी, दूधनाथ सिंह और डॉ. राजेंद्र कुमार की आशीष-छाया शहर के सिर पर है, पर नए लोगों के पास इतना समय ही कहाँ है जो इनसे आशीर्वाद लेने जाएँ. फिर भी कह सकते हैं कि आज भी डॉ. शम्सुर्रहमान फ़ारूकी से लेकर अंशु मालवीय तक की चार पीढ़ी साहित्य में सक्रिय है. हिंदुस्तानी एकेडमी, हिंदी साहित्य सम्मेलन, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र आज भी साहित्योत्सव के केंद्र हैं. अजामिल आज भी लिख रहे हैं – ‘मैं एक ऐसी कविता लिख रहा हूँ / जिसे रोटी में तब्दील कर सकूँ.’ कवि हरिश्चंद्र पाण्डेय आज भी संवेदना के नए-नए क्षितिज उद्घाटित कर रहे है – ‘पिता पेड़ हैं / हम शाखाएँ हैं उनकी / माँ छाल की तरह चिपकी हुई है पूरे पेड़ पर / जब भी चली है कुल्हाड़ी / पेड़ या उसकी शाखाओं पर / माँ ही गिरी है सबसे पहले / टुकड़े टुकड़े होकर.’ कविता का कौन सा सजग-सतर्क, जागरूक और चैतन्य पाठक अयोध्या शीर्षक इस कविता को भूला होगा – ‘जहाँ सूर्य वहाँ दिवस / जहाँ राम वहाँ अयोध्या / कितनी बड़ी अयोध्या / सौंप गए थे तुलसी हमें/ कितनी छोटी रह गयी है अयोध्या / मतपेटिका से भी छोटी.’

इलाहाबाद संग्रहालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय का निराला सभागार नित नए गोष्ठियों-सेमिनारों से आबाद रहते हैं. डॉ. अली अहमद फ़ातमी हिंदी और उर्दू के बीच कसे हुए पुल से थरथराते अनुभव किए जा सकते हैं. डॉ. अनीता गोपेश का नया उपन्यास ‘कुंज गली’ पत्र-पत्रिकाओं में अंश-अंश छप रहा है, पुस्तक रूप में आने को है. साहित्य भंडार के प्रकाशक पिता-पुत्र सतीश चंद्र अग्रवाल और विभोर अग्रवाल ने प्रकाशन की दुनिया में क्रांति ला दी है. पचास-पचास रुपए में साहित्य की गंभीर किताबें उपलब्ध करा रहे हैं. पब्लिक लाइब्रेरी, इंडियन प्रेस और भारती भवन पुस्तकालय पहले की तरह आबाद हैं. दिनेश ग्रोवर के निधन के बाद लोकभारती प्रकाशन अब हाशिए पर आ गया है हालाँकि राजकमल प्रकाशन के साथ उसकी जुगलबंदी काबिले गौर है. आमोद माहेश्वरी और अशोक माहेश्वरी इसकी रीढ़ हैं. व्यंग्यकार और मीडिया विशेषज्ञ धनंजय चोपड़ा अपने फ्लेवर और तेवर में डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र की याद दिलाते हैं. उनका व्यंग्य संग्रह ‘छपाक सुख गिफ्ट ऑफर में’ इन दिनों चर्चा में हैं. कवि-आलोचक रविनंदन सिंह और कवयित्री ज्योतिर्मयी ने हिंदुस्तानी एकेडमी को अपनी विलक्षण रचना-दृष्टि से और भी रचनात्मक बना दिया है. इतिहासकार और सिने लेखक ललित जोशी यद्यपि प्रोफेसर डॉ. लालबहादुर वर्मा के देहरादून शिफ्ट हो जाने के बाद अकेले पड़ गए फिर भी रचनात्मक उर्जा से भरे हुए है. हाल ही में बंद हो गए सिनेमाहालों पर उनका लेख विशेष चर्चित रहा है. रतीनाथ योगेश्वर, श्रीरंग, अंशुल त्रिपाठी और संतोष चतुर्वेदी समकालीन कविता के नए नक्षत्र हैं. संतोष चतुर्वेदी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘अनहद’ ने राष्ट्रीय फ़लक पर अपनी पहचान बनायी है. मुक्तिबोध शतवार्षिकी के अवसर पर प्रकाशित अनहद के मुक्तिबोध पर केंद्रित अंक ने साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज करायी है. प्रयाग पथ में इलाहाबाद पूरी तरह से जीवंत हो उठा है. कैलाश गौतम की विरासत जी रहे उनके सुपुत्र श्लेष गौतम मंच और पत्र-पत्रिकाओं के बीच सार्थक आवाजाही बनाए हुए हैं. कैलाशजी की याद में शुरू किया गया ‘कैलाश गौतम काव्यकुम्भ सम्मान’ छंदबद्ध कविता को रेखांकित करता एक विशिष्ट सर्जनात्मक उपक्रम है. 

रणविजय सिंह सत्यकेतु, नीलम शंकर और असरार गाँधी समकालीन कहानी को नए आयाम दे रहे हैं. दिल्ली जाकर भी ममता कालिया जी अभी भी इलाहाबाद की ही है. समारोहों में उनकी शिरकत आज भी इलाहाबाद को उर्जस्वित करती है. पिछले दिनों हिंदुस्तानी एकेडमी में आयोजित कथा-गोष्ठी में उनकी मौजूदगी ने बहुत जरूरी सवा खड़े किए थे. लेखक को ‘टेकेन-फॉर-ग्रांटेड लेने वालों को लेखकों के प्रति अपने नजरिए को बदलना होगा’, यह वाक्य अख़बारों का हेडिंग बना था. कथाकार शेखर जोशी ने आज भी इलाहाबाद से अपना नाता तोड़ा नहीं है, वह अब भी जब-तब इलाहाबाद में अपना समय गुजारते हैं. इलाहाबाद पर लिखे उनके हाँ ही के संस्मरण  साहित्य जगत की थाती है. हम्तियाज अहमद गाज़ी के संपादन में प्रकाशित ‘गुफ़्तगू’ का इलाहाबाद विशेषांक अकबर इलाहाबादी से लेकर जयकृष्ण राय तुषार तक की ग़ज़ल परंपरा का दिग्दर्शन कराता है. जयकृष्ण राय तुषार का नवगीत संग्रह ‘सदी को सुनते हुए’ तो अपने समय का ही दस्तावेज़ बन पड़ा है. सुधांशु उपाध्याय के पास नवगीत की ऐसी रचना-दृष्टि है जो भीड़ से अलहदा उन्हें एक विशिष्ट चेहरा देती है.

 वह कहते हैं – ‘इस युग में हम हुए भगीरथ / अपनी यही कहानी / आगे आगे प्यास चल रही / पीछे पीछे पानी.’ संभव प्रकाशन से प्रकाशित अंशु मालवीय का नवीनतम कविता संग्रह ‘तिनगोड़वा’ पुस्तक मेलों में खरीदकर पढ़ा जा रहा है, यह भी तोष का विषय है. वह एक्टिविस्ट कवि हैं. सड़क-फुटपाथ और स्टेशन पर रहते हैं, तभी तो लिख पाते हैं – ‘जब सारा शहर सो जाता है / तब भी किसी उम्मीद की तरह / टिमटिमाता रहता है स्टेशन.’

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भले ही आज इलाहाबाद हाशिए पर दिखाई दे रहा हो, पर उस हाशिए का हस्तक्षेप भी कुछ कम नहीं है. साहित्य के मानचित्र पर नए सिरे से उभरने की तैयारी में है साहित्य तीर्थ इलाहाबाद. 


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