लखनऊ

साहित्य के टिमटिमाते केंद्र , , रविवार , 25-03-2018


The Lucknow

प्रताप दीक्षित

शहर सिर्फ रास्तों-गलियों, दरो-दीवार, ईमारतों से नहीं बनते. शहर जाने जाते हैं यहाँ के बशिन्दों, तहजीब, अदब की धड़कनों से शहर के सामानांतर साहित्य और कला एक प्रति संसार रचते हैं. 

लखनऊ में पुरानी पीढ़ी के गिरीशचंद्र श्रीवास्तव से लेकर युवतम स्कन्द शुक्ल तक शताधिक कथाकार, कवि, आलोचक निरंतर रचनारत हैं. वयोवृद्ध विनायक के अति चर्चित उपन्यास ‘संत नेवलादास’ सहित पांच उपन्यास, तीन कहानी तथा दो कविता संग्रह आ चुके हैं. लखनऊ वासियों का सौभाग्य है कि ‘कोशी का घटवार’, ‘बदबू’, ‘दाज्यू’ जैसी कालजयी कहानियों के वरिष्ठ लेखक शेखर जोशी वर्तमान में लखनऊ में रह रहे हैं. कविवर नरेश सक्सेना अभी युवाओं जैसी चुस्ती-फुर्ती से भरपूर हैं. नाट्य, रंगमंच, कविता में सक्रियता के साथ जन आंदोलनों में उनकी शिरकत, शहर में उनके होने पर, हमेशा रहती है ‘समुद्र पर हो रही है बारिश’ व ’सुनो चारुशीला’ के अतिरिक्त वे हिन्दी के अनेक प्रतिष्ठित संकलनों में शामिल हैं. 

कथाकार रवीन्द्र वर्मा 81 साल की उम्र में निरंतर लेखनरत हैं. एक दर्जन से अधिक उपन्यास, कहानी संग्रह, वैचारिक आलेख के प्रणेता रवीन्द्र जी के तीन लघु उपन्यास प्रेस में हैं. इस समय वे पिछले पांच-छह वर्षों के दौरान लिखी गई कविताओं का संग्रह तैयार करने में मशगूल हैं. रवीन्द्र जी की सहधर्मिणी शीला रोहेकर (‘मिस सैमुएल-एक यहूदी गाथा’ – चर्चित उपन्यास की लेखिका) की कुछ अंतराल के बाद फिर कई अच्छी कहानियां ‘कथादेश’ आदि पत्रिकाओं में आई है. 

इसी पीढ़ी के वरिष्ठ साहित्यकार शकील सिद्दीकी हिंदी-उर्दू जगत में अपने काम के लिए जाने जाते हैं. कहानी, समीक्षा, आलेख के अतिरिक्त इनके कहानी संग्रह, विमर्श, सम्पादित, अनुवाद की 17 किताबें शाया हुई हैं. शकील सिद्दीकी के अनुसार - ‘लखनऊ का साहित्यिक परिदृश्य गहरी सृजनात्मक उत्तेजना से परिपूर्ण है. इस सृजनात्मकता के कई आयाम हैं.’

‘कथाक्रम’ के संपादक शैलेन्द्र सागर अपनी कहानियों-उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं. अब तक तीन उपन्यास, पांच कहानी संग्रह, संस्मरण की एक पुस्तक के साथ स्त्री-विमर्श पर दो किताबों का संपादन किया है. शिवमूर्ति जमीन से जुड़े रचनाकार हैं. उनके पास जीवन का व्यापक अनुभव हैं. ‘कसाईबाड़ा’, ‘अकालदण्ड’, ‘तिरियाचरित्तर’ आदि कहानियों के लेखक शिवमूर्ति के उपन्यास 'कुच्ची का कानून' की इधर काफी चर्चा रही है. कवि-कथाकार वीरेंद्र सारंग को ‘हाता रहीम’ से चर्चा मिली तथा इस बीच उनके अन्य दो उपन्यास और तीन कविता संग्रह आए हैं. हरिचरण प्रकाश के तीन कहानी संग्रह आ चुके हैं. वे आजकल एक नया उपन्यास लिखने में व्यस्त हैं. सुभाषचन्द्र कुशवाहा की पुस्तक ‘चौरीचौरा विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन’ बहुत चर्चित कृति रही है. ‘एक खंडित प्रेमकथा’ और ‘नालंदा पर गिद्ध’ ऐसी अविस्मरणीय कहानियों के लेखक देवेन्द्र के दो संग्रहों के बाद उनकी नई कहानी ‘अनुस्थित’ शिक्षा जगत के भ्रष्टाचार पर श्वेतपत्र है. लखनऊ के गोपाल चतुर्वेदी और अनूप श्रीवास्तव हिंदी के उल्लेखनीय व्यंग्यकार हैं. 

‘रमाकांत स्मृति पुरस्कार’ से सम्मानित कहानीकार दीपक श्रीवास्तव का कहानी संग्रह ‘सत्ताईस साल की सांवली लड़की’ चर्चित संग्रह रहा है. नसीम साकेती का एक उपन्यास, कविता संग्रह एवं कहानी संग्रह आ चुका है. प्रताप दीक्षित के दो कहानी संग्रह (‘विवस्त्र’ एवं ‘पिछली सदी की अंतिम प्रेमकथा’) चर्चित रहे हैं. सुधाकर अदीब के पौराणिक-ऐतिहासिक उपन्यास ‘ममअरण्य’ और ‘शाने अवध’ तथा महेंद्र भीष्म के उपन्यास ‘किन्नर कथा’ और ‘मैं पायल’ पाठकों द्वारा पसंद किए गए हैं. कथाकार राजेन्द्र परदेसी लंबे समय से कहानियां, कविता, साक्षात्कार लिख रहे हैं. इसके साथ ही राजा सिंह, अखिलेश चमन, रामनगीना मौर्य और गोपाल मृदुल भी निरंतर कहानियाँ लिख रहे हैं. हरिओम का नाम ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में है. परंतु उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण व्यवस्था पर तंज करती कहानियाँ भी लिखी हैं.

कहानी, कविता, आलोचना के साथ बंधु कुशावर्ती ने विशेष रूप से बाल साहित्य पर काम किया है. उनका कहना है कि ‘आज मुंह देखी तारीफ़ होती है. पहले ऐसा नहीं था. साहित्य ही नहीं संगीत, कला, नाटक की संस्थाओं में स्खलन आया है. यहाँ से अब छात्र निकलते हैं, कलाकार नहीं’. 

युवा कथाकार अनिल यादव की कहानियों के अतिरिक्त ‘यह कौन सा देस है महराज’ जैसा यात्रा वृतांत अति चर्चित रहा है. रेडियो से जुड़े हुए प्रतुल जोशी ने कविताओं के अतिरिक्त उत्तर-पूर्व राज्यों  के महत्वपूर्ण रोमांचक संस्मरण और ट्रेवलॉग (यात्रा वृतांत) लिखे हैं. डा शरदिंदु मुकर्जी की अंटार्कटिका यात्राओं के संस्मरण की रोचक पुस्तक ‘पृथ्वी के छोर पर’ इसी साल आई है. कवि अशोक चन्द्र ने लखनऊ के रचनाकारों पर मार्मिक संस्मरण भी लिखे हैं. युवा रचनाकारों मे स्कन्द शुक्ल चिकित्सा क्षेत्र में व्यस्तता के बीच ‘स्कन्द स्पंद’, (कविता) तथा ‘परमारथ के कारने’ और ‘अधूरी औरत’ जैसे महत्वपूर्ण उपन्यासों से चर्चा में रहे हैं. भाषा पर इनका विलक्षण अधिकार है. संजय चौबे का एक उपन्यास (9 नवंबर), कविता संग्रह (अवसान निकट है) के बाद स्त्री-विमर्श पर सद्यः प्रकाशित किताब ‘वह नारी है’ चर्चित हुई है.

     यहां गोष्ठियों-सेमिनारों में कथाकार अखिलेश, आलोचक वीरेंद्र यादव और रंगकर्मी राकेश अधिकांश मौकों पर एक साथ देखे जाते हैं. अखिलेश के दो उपन्यास अन्वेषण, निर्वासन तथा पांच कहानी संग्रह एवं श्रीलाल शुक्ल पर आलोचना पुस्तक आ चुकी है. वीरेंद्र यादव हिंदी कथा आलोचना में प्रमुख नाम है. इप्टा से जुड़े हुए राकेश किसी समय कहानियाँ लिखते थे. वर्तमान में इनकी केवल रंगमंच-रंगकर्म में ही नहीं सामजिक - राजनितिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी है. आलोचना क्षेत्र में लखनऊ में अन्य प्रमुख नाम हैं - अवधेश मिश्र, नलिन रंजन सिंह, अनिल त्रिपाठी, रविकांत एवं सूरज बहादुर थापा. युवा आलोचकों में अजीत प्रियदर्शी, आशीष सिंह, संदीप कुमार सिंह उत्साह के साथ नई दृष्टि से पुरानी व नई कृतियों का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं. कालीचरण ‘स्नेही’ और सुरेश पंजम ने दलित साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया है. साहित्य और पत्रकारिता अन्योनाश्रित विधाएँ हैं. नवीन जोशी प्रख्यात पत्रकार हैं. कुछ समय पहले इनका ‘दावानल’ नामक उपन्यास चर्चित रहा था. ‘जनसंदेश टाइम्स’ के संपादक सुभाष राय भी बहुत अच्छी कविताएँ लिखते हैं. इसी प्रकार सूचना विभाग में उप निदेशक और ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका के पूर्व संपादक रह चुके विजय राय इन दिनों 'लमही' का संपादन कर रहे हैं तथा इनका एक कविता संग्रह' कविता का पर्यावरण' आ चुका है. कथाकार नवनीत मिश्र आजकल एक नया उपन्यास ‘तब्लक’ लिख रहे हैं. कथा साहित्य में इनकी जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, नहीं हुई. किन्तु नवनीत की कहानियों का संसार समकालीनों से काफी अलग है. 

लखनऊ के गंगा-जमुनी माहौल में दयानंद पांडेय अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं. उनके निशाने पर आमपंथ-वामपंथ सब रहते हैं और संघी व समाजवादी भी. तीस से ज्यादा पुस्तकों के लेखक पांडेय कहते हैं - 'बाकी शहरों के साहित्यिक परिदृश्य में गुटबाजी होती है. लखनऊ के साहित्यिक परिदृश्य में गैंगबाज़ी होती है. इन के पास रचना या आलोचना नहीं है, इन के पास पत्रिका है , संगठन हैं, पालतू पत्रकार हैं.  कामतानाथ, मुद्राराक्षस जैसे लेखक इन गैंगबाजों के शिकार रहे हैं. अब हरिचरन प्रकाश, नवनीत मिश्र जैसे शानदार कथाकार इन का शिकार हैं.'

जलेस के अध्यक्ष नलिन रंजन सिंह प्रखर युवा आलोचक हैं. उनसे प्रगतिशील लेखन को काफी उम्मीदें हैं. कथाकार रजनी गुप्त ने काफी लिखा है. स्त्रीवाद लेखन का ठप्पा भी उन पर नही है. बेबाकी से वे लिखती हैं पर कई उपन्यासों, कहानी संग्रहों के बाद भी कथा साहित्य में जिस गंभीरता से उन्हें लिया जाना चाहिए था, लिया नहीं गया. लखनऊ में कुछ युवा महिला रचनाकारों ने पिछले दिनों मह्त्वपूर्ण कहानियाँ दी हैं, जिनकी चर्चा हुई है. प्रज्ञा पांडेय, दिव्या शुक्ला, ऐसी ही रचनाकार हैं. दिव्या शुक्ला हाल ही में कहानी के लिए ‘रमाकांत पुरस्कार’ से नवाजी गई हैं. विजय पुष्पम पाठक ने भी कविताओं की दिशा में अपने कदम बढाए हैं. जनसंदेश टाइम्स में साहित्य के लिए कोना बचा कर रखने वाले संपादक सुभाषराय भी साहित्य से प्रेम करते हैं, कविताएं लिखते  हैं. वे हालात से निराश नही हैं, और कहते हैं- 'यहां बहुत सारे अंधेरे कोने भी हैं लखनऊ के उजाले मन में. यहां के लेखकों साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग इलीट है, आत्ममुग्धता के ऐश्वर्य में इतना डूबा हुआ है कि आम जन से बिल्कुल कटा हुआ है.'

     लखनऊ से प्रकाशित ‘लमही’ के संपादक विजय राय प्रेमचंद के भाई महताब राय के दौहित्र हैं. वे चंद शब्दों में लखनऊ की साहित्यिक गगनरेखा का पूरा नक्शा उकेर देते हैं - 'लखनऊ का मौजूदा साहित्यिक परिवेश काफ़ी उत्साहवर्धक और ऊर्जा से भरा पूरा दिखता है. जसम (कौशल किशोर), जलेस (नलिन रंजन सिंह), प्रलेस (किरण सिंह, उषा राय) और अलग दुनिया (के के वत्स) की लगातार गतिविधियों से जहाँ लगातार विमर्श का माहौल बना रहता है. हर साल तीन बड़े साहित्यिक सम्मान कार्यक्रम होते हैं. एक तो आनन्द सागर कथाक्रम सम्मान दूसरा रेवांत मुक्तिबोध सम्मान और तीसरा राही मासूम रज़ा सम्मान जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी लोकप्रियता अर्जित कर चुके हैं. लखनऊ मुख्यतः कथाकारों का शहर है. रवीन्द्र वर्मा शीला रोहेकर दीपक शर्मा शिवमूर्ति, अखिलेश, नवनीत मिश्र, हरी चरन प्रकाश, शैलेन्द्र सागर, देवेन्द्र, अनिल यादव, दीपक श्रीवास्तव, नसीम साकेती, राजा सिंह, रजनी गुप्त, दयानन्द पाण्डेय, किरण सिंह, प्रज्ञा पाण्डेय, और दिव्या शुक्ला आदि ने अपनी कहानियों और उपन्यासों के ज़रिये साहित्य में महत्वपूर्ण जगह बनाई है. आलोचना के क्षेत्र में वीरेन्द्र यादव, प्रताप दीक्षित, अवधेश मिश्र, नलिन रंजन सिंह, अनिल त्रिपाठी, प्रीति चौधरी, रविकांत और उषा राय प्रतिष्ठित और स्थापित नाम हो चुके हैं. श्रुति मुक्ता टण्डन आशीष सिंह और सन्दीप सिंह आदि आलोचना के सम्भावनाशील नाम हैं. कविता के क्षेत्र में नरेश सक्सेना बड़ा नाम है. उनके अलावा अजय सिंह, कात्यायनी, सुभाष राय चंद्रेश्वर कौशल किशोर श्याम अंकुरम वंदना मिश्र रमेश दीक्षित भगवान स्वरूप कटियार, सुशीला पुरी, सत्येन्द्र रघुवंशी, अजय सिंह, तरुण निशांत, नलिन रंजन, विपिन शर्मा और ज्ञान प्रकाश चौबे हैं. चंद्रेश्वर पाण्डेय की कविता में एक गँवई मन दिखाई पड़ता है. ज्ञान प्रकाश चौबे के दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. उन्हें वागर्थ सम्मान, कादम्बिनी युवा कवि सम्मान से नवाजा गया है.. ‘मंतव्य’ के संपादक हरे प्रकाश उपाध्याय अपने उपन्यास ‘बखेड़ापुर’ सहित अपनी कविताओं के लिए जाने जाते हैंं. नाट्य लेखन में राजेश कुमार प्रमुख नाम है तो राकेश, प्रदीप घोष, सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ प्रतिष्ठित रंगकर्मी हैं.

इस समय लखनऊ से जो साहित्यिक पत्रिकाएँ निकल रही हैं, उनमें ‘लमही’ (विजय राय), ‘तद्भव’ (अखिलेश), ‘कथाक्रम’, (शैलेन्द्र सागर), ‘निकट’ (कृष्ण बिहारी -प्रज्ञा पांडेय), ‘मंतव्य’ (हरेप्रकाश उपाध्याय), ‘साहित्य भारती’(उ०प्र०हिंदी संस्थान-अमिता दुबे), ‘कल के लिए’(जय नारायण बुधवार), ‘रेवांत’ (अनिता श्रीवास्तव), ‘अदहन’ (रविकांत), ‘शब्द सत्ता’ (सुशील सीतापुरी), ‘बालवाणी’, ‘कविता विहान’ (नलिन रंजन-ज्ञान प्रकाश), ‘वरिमा’ (नलिन रंजन), ‘इंडिया इनसाइड’ (अरुण सिंह) आदि इस दृष्टि से ध्यातव्य हैं.  

लखनऊ का साहित्यिक वर्तमान यही है. सैकड़ों लोग साहित्य की श्रीवृद्धि में लगे हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तो किसी किसी को ही मिलती है. कहा जाता है दिल्ली के बाद सबसे ज्यादा रचनाकार लखनऊ में हैं. यहां गुटबाजियां भी हैं गैंगबाजियां भी दयानंद पांडेय के शब्दों में, पर लखनऊ का अभी उसका अंदाजेबयां गायब नहीं हुआ है. लोग आज भी बशीरबद्र के इस शेर से मुतमइन दिखते हैं -

‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों.’ 


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