कानपुर

साहित्य के टिमटिमाते केंद्र , , चयन करें , 25-03-2018


The Kanpur

दया दीक्षित

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से कानपुर तक का फासला कोई बहुत बड़ा फासला नहीं है, किंतु हिंदी और खासकर हिंदी साहित्य के रचाव के मामले में दोनों शहरों के मध्य बहुत बड़ा फासला रहा है, हालांकि गंगा जमुनी तहजीब पूरे देश की भाँति लखनऊ व कान्हपुर/कानपुर की रक्तमज्जा में भी रची बसी है.

‘सितारे हिन्द’ और भारतेन्दु से आर्विभूत हिंदी व हिंदी साहित्य का व्याकरणिक श्रंृगार करने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, कम्पू/कानपुर के जूही (आचार्य नगर) स्थित छोटे से घर से 'सरस्वती' जैसी सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका के सम्पादन के माध्यम से निरंतर शुद्ध-बुद्ध-प्रबुद्ध हिंदी के साहित्य का आस्वादन रसिकजनों को कराते थे. वे हिंदी का परिष्कार कर रहे थे. 19वीं शती के प्रथम दशक के कानपुर का यह वह साहित्यिक परिदृश्य था, जब शिवाला (हार्ट आॅफ सिटी) स्थित पुस्तकालय में बंगाल के अरविंद घोष (अरविंदो महर्षि) स्वाध्याय के लिये आते थे.

'सोज़ेवतन' की प्रतियाँ जब्त करके अंग्रेज हुक्मरानों ने धनपतराय को जब लेखन के लिये बरज दिया था, तब कानपुर के 'जमाना' अखबार के सम्पादक पत्रकार प्रवर मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें ‘प्रेमचंद’ के नाम से लिखने की सलाह दी थी. फिर तो प्रेमचंद ही छा गए, धनपतराय अतीतवासी हुए. कानपुर के बंगाली मोहाल में रहने वाले कथाकार विश्वम्भर नाथ कौशिक की प्रेरणा से प्रेमचंद हिंदी लेखन में प्रवृत्त हुए, तब उनकी हिंदी उतनी परिष्कृत नहीं थी जितनी उनकी उर्दू थी. प्रेमचंद की यह समस्या कौशिक जी ने न केवल दूर की, बल्कि अपनी पत्रिका ‘हिंदी मनोरंजन’ में प्रेमचंद की पहली कहानी 'पंच परमेश्वर’ प्रकाशित की. आशय यह है कि प्रेमचंद जी की हिंदी ‘कौशिक पाठशाला’ में ही निखार पा सकी. इस तरह प्रेमचंद को हिंदी में लाने का श्रेय कानपुर को जाता है.

नव जागरण काल की बात विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, सुकवि राय, देवीप्रसाद 'पूर्ण', श्यामलाल गुप्त पार्षद जी के बिना पूर्ण हो ही नहीं सकती. कौन पूर्ण जी? अरे, वही! जिनकी यह अमर पंक्तियाँ साहित्य की महत्ता की नज़ीर के रूप में हमेशा कही जाती हैं- 'अन्धकार हैैै वहाँ, जहाँँँ आदित्य नहीं है, मुुुर्दा हैैै वह देेश, जहाँँँ साहित्य नहीं है.'

और श्यामलाल गुप्त पार्षद जी, ये कौन हंै? ये हैं हमारे राष्ट्रीय आन-बान-शान के प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज की महिमा का गौरव गान करने वाले झण्डा गीत के रचयिता- 'विजयीविश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा.' उस समय गाँधी जी मुंबई में थे, जब उन्होंने संदेश भिजवाया कानपुर के अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के पास - ‘चौबीस घंटे के भीतर झण्डा गीत लिखवा कर दो.’ विद्यार्थी जी के ‘प्रताप’ प्रेस कार्यालय में आए पार्षद जी को जब यह मालूम हुआ तो ‘रातभर जागकर’ उन्होंने जो गीत लिखा, वह गीत जब महात्मा जी के पास पहुँचा तो वे बड़े अभिभूत हुए और इसके प्रयोग की स्वीकृति दी. कानपुर की फिजाओं में अस्तित्व लेने वाला यह गीत संप्रभू भारत राष्ट्र में समान आदर के साथ गाया जाता है. 

और विद्यार्थी जी का प्रताप! प्रताप ने, उसके स्तम्भों ने तो उस समय भाषा का निर्माण संवर्धन प्रचार-प्रसार किया, जब नवनिर्मित हिंदी नई चाल में ढल रही थी. हिंदी का टकशाली रूप प्रताप की ही तो देन है; आज भी प्रताप प्रेस के भवन के भग्नावशेष अपने में हिंदी की गौरवगाथा समेटे कानपुर में देखे जा सकते हैं.

नवजागरण से लेकर वर्तमान समय के सुदीर्घ अन्तराल में यहाँ का साहित्यिक परिदृश्य और और उर्वर और समृद्ध हुआ है. पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो अनेक प्रतिष्ठित पत्र समूहों के मुख्यालय यहाँ हैं उनमें से एक दैनिक जागरण पत्र समूह का नाम भारतीय जनमानस में अत्यन्त लोकप्रिय है, पत्रिकाएँ जो यहाँ से निकल रही हैं, साहित्य जगत में मुकम्मल हस्तक्षेप रखती हैं; नवनिकष, गीत गुंजन, पुर्ननवा, मातृस्थान, प्रति शीर्षक, अनन्तिम, धरती बचे प्रदूषण से, अकार ऐसी पत्रिकाएँ हैं, जिनके कई विशेषांक विशेष चर्चित रहे हैं. अकार का तो प्रायः हर दूसरा अंक विशेषांक ही होता है. ये वे पत्रिकाएँ हैं जिनके सम्पादक स्वयं प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं. प्रसार की बात करें, तो लगभग पूरे देश के प्रान्तों का प्रतिनिधित्व करती ये पत्रिकाएँ अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं.

पठनीयता के दृष्टिकोण से देखें तो आज भी शहर के कई पुस्तकालय ऐसे हैं जहाँ पाठकों की चहल-पहल रहती है, हालाँकि पुस्तकालयों के उचित रख-रखाव की कमी तो अखरती ही है. प्रति वर्ष लगने वाले पुस्तक मेले शहर को पुस्तकों और लेखकों से सीधे जोड़ने का काम करते हैं. और साहित्यिक संस्थाएँ तो शताधिक हैं. अभी हाल में ही सुकवि नन्हेलाल तिवारी ने ‘कानपुर की साहित्यिक संस्थाएँ’ नाम से अच्छी खासी पृथुल (मोटी) पुस्तक प्रकाशित करायी है. कुछ संस्थाएँ विकासिका, संगमन, ललितकला अकादमी, शब्दोत्सव व साहित्य सृजन हिंदी भाषा और साहित्य को अधिकाधिक जनकेंद्रित बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण और लीक से अलग हटकर कार्य कर रही हैं.

और हाँ, कानपुर के गंगा घाटों पर पुण्यसलिला गंगा की लहरों के साथ-साथ गीतों, ग़ज़लों की सम्मोहक धारा भी तो प्रवाहित होती रहती है. गीतकार रामस्वरूप सिन्दूर, हरिवंश राय बच्चन की परंपरा को अग्रसारित करने वाले डाॅ. उपेन्द्र तथा देवेन्द्र सफल, वीरेन्द्र आस्तिक, शतदल, विनोद श्रीवास्तव, प्रतीक मिश्र, हरिलाल मिलन, राजहंस, सीकर, प्रभृति गीतकारों से पहले प्रथम स्मरणीय सनेही परंपरा के वयोवृद्ध कवि गीतकार अंबिकेश शुक्ल के बिना कानपुर की साहित्य चर्चा अधूरी ही रह जाएगी. आज भी अंबिकेश जी साहित्य साधना में तन्मयता से निरत हैं. कथाकारों में गिरिराज किशोर, राजेन्द्र राव तथा प्रियंवद ऐसे रचनाकार हैं जिनसे देश-विदेश में कानपुर को जाना जाता है. कानपुर की एक पहचान का कारण ये तीनों रचनाकार भी हैं. गाँधी दम्पत्ति पर पहला गिरमिटिया और ‘बा’ उपन्यासों ने गिरिराज जी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दी है.

कथाकार राजेंद्र राव की कलम ने तो एक समय में जिस तरह शोहरत (और दौलत भी) पाई है, वह अपने आप में अद्भुत है. आज पत्रिकाओं का प्रकाशन 500, 1000, 2000 प्रतियों तक सिमट कर रह गया है, किन्तु वह समय भी था जब ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ की प्रतियाँ दसियों हजार में प्रकाशित होती थीं, मध्यवर्ग के हर दूसरे-तीसरे घर में साप्ताहिक हिंदुस्तान रखना ‘शान’ स्टेटस सिम्बल माना जाता था. ऐसी विशिष्ट पत्रिका के यशस्वी लेखक रहे हैं राजेंद्र जी. साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित होने वाली उनकी धारावाहिक श्रृंखला ‘सूली ऊपर सेज पिया की’ के पारिश्रमिक से राजेंद्र जी ने स्कूटर क्रय किया था, आज एक रचना के पारिश्रमिक से स्कूटर तो बहुत दूर है, साईकिल भी नहीं खरीदी जा सकती. साम्प्रतिक दौर में राजेंद्र राव कथा लेखन की कार्यशाला के रूप में सुविख्यात हैं. पूर्ण निष्पक्षता के साथ प्रतिभावान नए लेखकों को प्रकाशन का मंच देना कोई राजेंद्र जी से सीखे. कानपुर के लेखकीय परिदृश्य पर राजेंद्र जी का कहना है - ‘जहाँ तक रचनात्मक लेखन का सवाल है, तो कानपुर का साहित्यिक परिदृश्य तो अच्छा है, मगर यहाँ उस तरह के आयोजन नहीं होते जैसे दिल्ली व लखनऊ में होते हैं. इन शहरों में संवादी या कथाक्रम जैसे बड़े साहित्यिक आयोजनों में देश के वरिष्ठ साहित्यकारों का पाठकों से सीधा जुड़ाव हो जाता है. इसके बावजूद कानपुर का साहित्यिक माहौल आश्वस्त करता है.’ उपन्यासकार, कथाकार प्रियंवद की कथा ‘खरगोश’ पर इसी नाम से बनी फिल्म भारत की सर्वश्रेष्ठ सौ फिल्मों में से एक है. एकांत साहित्य साधना में तल्लीन प्रियंवद जी के साहित्यिक सरोकार अनुकरणीय हैं. 

कुल मिलाकर कानपुर नगर साहित्यिक दृष्टि तथा हिंदी के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से साहित्य जगत में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है. कानपुर की मिट्टी ने एक ओर गोपालदास ‘नीरज’ को लेखकीय धार दी है, तो दूसरी ओर इसी मिट्टी ने भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेई को राजनीति के साथ-साथ साहित्य के संस्कार भी दिए हैं. 


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