साहित्य - २०१७ः एक जायजा

साहित्य 2017 एक जायजा , , रविवार , 25-03-2018


Literature 2017 An Overview

गंभीर समाचार डेस्क

हिंदी में हर साल हजारों पुस्तकें छपती हैं विभिन्न अनुशासनों और विधाओं की. इनकी अपनी खपत और अपने पाठक हैं. इनमें साहित्यिक विधाओं - कविता, कहानी, उपन्यास व कथेतर गद्य (आत्मकथा, जीवनी, आलोचना, संस्मरण, यात्रावृत्त आदि) का बोलबाला ज्यादा होता है. साहित्य की इन सभी विधाओं का जायज़ा लें तो जहां एक तरफ पाठकों के अभाव की चर्चा होती है वहीं बेस्टसेलर पुस्तकों के पाठकों का अपना फूलता फलता वर्ग है. साहित्य के प्रकाशक अपनी स्तरीयता बनाए रखने के लिए हर साल अपनी सूची में अच्छे लेखकों को जगह देते हैं तो ऐसी पुस्तकों के प्रकाशक उन युवा लेखकों की तलाश में रहते हैं जो नए जमाने की किस्सागोई सामने ला सकें. पर सच यह है कि तमाम बेस्टसेलर पुस्तकों को एक बार से ज्यादा नहीं पढ़ा जा सकता. यूज-एंड-थ्रो कल्चर के इस जमाने में भी साहित्य में प्रेमचंद, शिवानी, कमलेश्वर, बच्चन, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, सुरेन्द्र वर्मा का क्रेज अब भी है. पर जैसे जैसे समाज में मूल्यों का क्षरण और आधुनिकता हावी होती गयी है, युवाओं में जान एलिया, सुरेंद्र मोहन पाठक, दिव्यप्रकाश दुबे, निखिल सचान, सत्य व्यास आदि की पुस्तकों के प्रति रुझान बढ़ा है. वे बहुत संजीदा किताबों में नहीं समय व्यर्थ करना चाहते. अब आत्मकथाओं, संस्मरणों और डायरी आदि विधाओं में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है.

साल 2017 में साहित्यिक पुस्तकों का जायजा लें तो कविता के खाते में कई उल्लेखनीय पुस्तकें रही हैं. राजकमल प्रकाशन समूह के कविता संग्रहों में विष्णु खरे, दिनेश कुमार शुक्ल, गीत चतुर्वेदी, आर चेतनक्रांति, प्रेमरंजन अनिमेष व विवेक निराला की पुस्तकें श्रेष्ठ कविता का उदाहरण हैं. साहित्य भंडार ने राजेंद्र कुमार का संग्रह ‘लोहा लक्कड़’ छापा है. ज्ञानपीठ के अव्वल संग्रहों में घनश्याम कुमार देवांश का संग्रह ‘आकाश में देह’ है तो रश्मि भारद्वाज व सुजाता के संग्रह भी पठनीय हैं. यहीं से मरणोपरान्त प्रकाशित कैलाश वाजपेयी का संग्रह ‘हंस अकेला’ भी कवि का आखिरी उपहार-सरीखा है. साहित्य अकादमी से प्रकाशित अविनाश मिश्र का संग्रह ‘अज्ञातवास और अन्य कविताएं’ गौरतलब है. परिकल्पना प्रकाशन से आया वरिष्ठ कवि मलय का संग्रह ‘दिन भौंहें चढ़ता है’ भी ध्यातव्य है. बोधि प्रकाशन ने कई अच्छे संग्रह छापे हैं : ‘गुलमकई’, ‘पीठ पर आंख’, ‘कोई क्षमा नहीं’, तो किताबघर से नीलेश रघुवंशी का संग्रह ‘इतने दिनों बाद’ आया है. वाणी प्रकाशन ने सालों से अप्राप्य दुष्यंत कुमार का संग्रह ‘जलते हुए वन का वसंत’ छाप कर पाठकों का उपकार किया है तो श्योराज सिंह बेचैन का ‘चमार की चाय’ छाप कर दलित कविता को केंद्रीयता दी है. प्रभात प्रकाशन से साल के आखिर में पटना की कवयित्री भावना शेखर का संग्रह 'मौन का महाशंख' आया जो पटना पुस्तक मेले में छाया रहा. 

गीत नवगीत की अच्छी कृतियां इस साल कम आईं. अनुभव प्रकाशन से सोम ठाकुर का गीत संग्रह ‘प्रेम बेल बोई’ बरसों की प्रतीक्षा के बाद छपा तो लोकभारती से यश मालवीय संग्रह ‘वक्त का मैं लिपिक’ उन्हें एक बेहतरीन गीतकार के रूप में स्थापित करता है. ग़ज़लों में वाणी से आए गुलजार के संग्रह ‘कुछ तो कहिए’ को चर्चा मिली तो जान एलिया के ‘मैं जो हूँ जान एलिया हूँ’ व एनीबुक से आए ‘गुमान’ व ‘लेकिन’ को भी खूब पाठक मिले. मुनीर नियाजी, राहत इंदौरी व डॉ. हरिओम के संग्रहों को भी खासी सराहना मिली. रामदरश मिश्र की गजलें ‘सपना पलता रहा’ नाम से आईं तो मुनव्वर राना की गजलों एक चयन मंजुल प्रकाशन ने ‘मुनव्वरनामा’ नाम से छापा. 

कथा साहित्य में कहानी में इस साल कई अच्छी कृतियां जुड़ीं. आधार से मनोज कुमार पांडेय का संग्रह ‘खजाना’, राजकमल से अल्पना मिश्र का ‘स्याही में सुरखाब के पंख’ व पंकज मित्र के संग्रह ‘वाशिंदा @तीसरी दुनिया’, सामयिक से आया आकांक्षा पारे काशिव का ‘बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान, हिंदयुग्म से मानव कौल का ‘प्रेम कबूतर’, ज्ञानपीठ से श्रद्धा थवाइत का ‘हवा में फड़फड़ाती चिट्ठी’ व ‘अमरबेल की उदास शाखें’ अच्छे संग्रहों में हैं. प्रवीण कुमार का 'छबीला रंगबाज' का शहर कुछ अलग किस्म की कहानियों का संग्रह है.

उपन्यासों में वाणी से आए बालेन्दु द्विवेदी के उपन्यास ‘मदारीपुर जंक्शन’ की धूम रही. रागदरबारी के लेखक से प्रभावित बालेंदु ने ग्राम प्रधान के चुनाव के बहाने आज के गांवों के हालात को व्यंग्य और विट के साथ मूर्त किया है. आशा प्रभात के उपन्यास ‘मैं जनकनंदिनी’ सीता पर केंद्रित पठनीय उपन्यास है. ‘मेरा यार मरजिया’ के बहाने अमित ओहलाण ने भ्रूण हत्या को लुप्त होते कीकर के आईने में देखा है तो महानगर और एनसीआर में कामकाजी स्त्रियों के साथ होनी अनहोनी को ज्ञानप्रकाश विवेक ने ‘डरी हुई लड़की’ में विजुअलाइज किया है. इंटरनेट के फेर में धोखा खाती युवा पीढ़ी की किस्सागोई नासिरा शर्मा ने अपने उपन्यास ‘शब्द पखेरू’ में बुनी है तो दामोदर खडसे ‘बादल राग’ में बैंक की अंदरूनी दिनचर्या को सामने लाते हैं. ख्यात कवि नरेश मेहता की पत्नी महिमा मेहता ने पहली बार उपन्यास ‘परछाइयां’ लिखा है तो योगिता यादव (ख्वाहिशों के खांडववन) व सूर्यनाथ सिंह (नींद क्यों रात भर नहीं आती) के उपन्यास चर्चा में हैं. किताबघर से आए संजय कुंदन के तीन ताल से काफी आशाएं हैं. भावना प्रकाशन से आया ‘दगैल’ (रुप सिंह चंदेह) व राधाकृष्ण से आया ‘छप्पर’ (जयप्रकाश कर्दम) भी किस्सागोई की दृष्टि से अच्छे उपन्यास हैं. ज्ञानपीठ से आए संस्कृत के सुधी लेखक राधावल्लभ त्रिपाठी के उपन्यास ‘और फिर’ में एक अलग आस्वाद है. इसके अलावा गोविंद मिश्र का शाम की झिलमिल, सुषमा वेदी का पानी केरा बुदबुदा व संजीव बख्शी का खैरागढ नांदगांव भी अच्छे उपन्यासों में गिने जाएंगे. मीरा फाउंडेशन पुरस्कार से सम्मानित प्रज्ञा का ‘गूदड़बस्ती’ भी ध्यातव्य उपन्यास बन पड़ा है.

कथेतर गद्य में पुरलुत्‍फ अंदाज में लिखा अशोक भौमिक का ‘जीवनपुर हाट जंक्शन’ बेहतरीन स्मृति आख्यान है. साल के शुरुआत में ‘वह सफर था कि मुकाम था’ (संस्मरण) लिख कर मैत्रेयी पुष्पा ने खासी चर्चा बटोरी. राजेन्द्र यादव इस बहाने कुछ दिनों चर्चा में रहे. नंद किशोर नवल की ‘मूरतें : माटी और सोने की’ के संस्मरणों की चर्चा भी हो रही है. अजित कुमार के निधन से पहले उनकी किताब ‘गुरुदेव बच्चन से दूर’ आई. साहित्य भंडार से दूधनाथ सिंह का संस्मरण ‘सबको अमर देखना चाहता हूँ’ एक बार फिर उनकी सुपरिचित संस्मरण अदायगी का परिचय देता है. बिहार के लेखक श्रीभगवान सिंह का ‘गांव मेरा देस’ भी सरस स्मृति आख्यान बन पड़ा है.

मुक्‍तिबोध पर केंद्रित अपनी पुस्तक में कृष्णा सोबती ने उन्हें सलीके से व्याख्यायित किया है तो कमल किशोर गोयनका ने प्रेमचंद पर अपनी नई पुस्तक में उनकी कमानियों में भारतीयता की तलाश की है. कुंवर नारायण की इस साल दो किताबें आईं : एक ‘लेखक का सिनेमा’ (सिने समीक्षा) की तो दूसरी विदेशी कविताओं के अनुवाद की पुस्तक ‘न सीमाएं न दूरियां’. गांधीवादी लेखक अनुपम मिश्र के जाने के बाद उनकी किताब अच्छे विचारों का अकाल भी पठनीय पुस्तकों में रही. हम यूरोपीय अमेरिकी कवियों से तो बखूबी परिचित हैं पर मध्य एशियाई, मध्य पूर्वी व अफ्रीकी देशों के कवियों से नहीं. हिंदी के पाठकों को इस साल नासिरा शर्मा ने जबर्दस्त उपहार दिया है अफ्रोएशियाई साहित्य का. लोकभारती से प्रकाशित छह खंडों के ‘अफ्रोएशियाई साहित्य’ के छह खंडों में अफ्रोएशियाई कविताएं, कहानियां, उपन्यास, नाटक व बुद्धिजीवियों से बातचीत संकलित है. इसमें नेपाल, अफगानिस्तान, इथियोपिया, सोमालिया, कुवैत, फिलिस्तीन, ईरान, सीरिया, इराक, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, लेबनान के ऐसे सैकड़ों कवियों, कथाकारों की कविताओं एवं कमानियों को पहली बार नासिरा जी ने हिंदी अनुवाद और अपनी टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत किया है जो अभी तक हिंदी की पाठचर्या में नहीं आ सके थे. 

रज़ा फाउंडेशन भी 2018 से प्रकाशन में लगभग दो दर्जन पुस्तकों के साथ पदार्पण कर रहा है. इनमें कविता कला विचार आलोचना सभ्यता व संस्कृति विमर्श की पुस्तकें शामिल हैं. परिदृश्य यह है कि आज बड़े प्रकाशक भी बाजार केंद्रित लेखन को बढ़ावा दे रहे हैं जबकि उनके पास क्लासिकी का खजाना है. देखना है कि आगे की प्रकाशन की दुनिया बाजार के सामने घुटने टेक देगी या मूल्यवादी पुस्तकों का दौर कायम रहेगा.

 


Leave your comment/अपनी प्रतिक्रिया दे