कोविंद की जीत तो भाजपा ने तय ही कर ली थी

आकलन , , मंगलवार , 01-08-2017


kobind ki jeet to BJP ne tay hi kar li thee

शंभूनाथ शुक्ल

अब यह तो तय ही था कि एनडीए के उम्मीदवार श्री रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति का चुनाव जीत जाएंगे. हालांकि सत्तारूढ़ दल के पास अपने वोट कम थे पर विरोधी दलों में एकता नहीं होने और परस्पर फूट पड़ जाने के कारण श्री कोविंद को लगभग 65 प्रतिशत वोट मिले जबकि वोटिंग महज 90 फीसदी ही हुई. यानी 90 प्रतिशत वोटिंग के बावजूद वे आधे से अधिक मत प्राप्त करने में सफल रहे. इसका साफ मतलब है कि श्री कोविंद को जिताने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा ने काफी तगड़ी घेरेबंदी की हुई थी. अगर भाजपा के सूत्रों की मानें तो एनडीए के उम्मीदवार को न सिर्फ भाजपा समेत सहयोगी दलों के विधायकों और सांसदों के वोट मिले उलटे पश्चिम बंगाल में तृणमूल के विधायकों ने क्रास वोटिंग की और उधर यूपी में समाजवादी पार्टी के विधायकों और सांसदों ने भी. अलबत्ता विपक्ष यह मानकर खुश हो सकता है कि यूपीए की प्रत्याशी मीरा कुमार को गुजरात राज्य में कुछ भाजपा विधायकों के वोट भी मिले.  यानी दोनों तरफ क्रास वोटिंग हुई. अंतर सिर्फ इतना था कि सत्तापक्ष में कम और विपक्ष में बहुत ज्यादा. यूं भी तेलांगना कांग्रेस और अन्नाद्रमुक का पनीर सेल्वम गुट तो पहले से ही विपक्ष से दूर था एवं ओड़ीसा का बीजद भी. ऐसी स्थिति में मीरा कुमार की हार निश्चित थी. वे तो बस नाम के लिए लड़ रही थीं. यूं भी मायावती ने कह ही दिया था कि उन्हें मीरा कुमार अथवा रामनाथ कोविंद से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जीतने वाला होगा तो दलित ही. एक तरह से वे कहना चाह रही थीं कि चित भी मेरी पट भी मेरी. मगर यह उनका दिलासा भर ही हो सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह सुनहरा दौर है. उनका हर दांव सही पड़ रहा है. मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने सारी चीजें अपने अनुकूल कर ली हैं. तीन साल हो गए मोदी सरकार को पर विपक्ष अभी तक कोई ऐसा मौका नहीं तलाश सका है, जिससे मोदी सरकार को घेरा जा सके. इसके ऊपर विपक्ष के पास कोई सर्वमान्य नेता नहीं है. नीतिश ने दांव दे दिया और मुलायम सिंह प्रतिपक्ष के प्रति वैसे भी उदासीन हैं. उनके पुत्र जरूर कांग्रेस के साथ हैं पर पिता-पुत्र की लड़ाई में उनकी पार्टी ही धंसी हुई है. इसके अलावा सीबीआई के निशाने पर मुलायम का पूरा कुनबा है. यही हाल मायावती और उनकी पार्टी का है. मायावती सीबीआई के निशाने पर हैं और उनकी पार्टी बिखर चुकी है. एक जमाने में उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा में शामील हो कर आज उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं. बिहार में लालू यादव के दिन गर्दिश में हैं. हालांकि वहां पर सत्तारूढ़ महागठबंधन में उनकी पार्टी सबसे बड़ी है मगर सीबीआई ने उन्हें इस तरह घेर लिया है कि वे खुद तो सासत में हैं ही, उनकी पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी भी निशाने पर हैं. उनके बेटे और मौजूदा बिहार सरकार में उप मुख्यमंत्री तेजस्वी बुरी तरह फंस चुके हैं. किसी भी रोज उनकी गद्दी जा सकती है. उनकी बेटी के दिन भी खराब चल रहे हैं. ऐसे में विपक्ष रहा कहां. कांग्रेस अपनी देखे या अपने सहयोगी दलों को.  उसके नेता को विदेश जाने से फुर्सत नहीं है और कांग्रेस धीरे-धीरे रसातल को जा रही है. ऐसे में भला भाजपा के नेतृत्त्व वाले एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को कौन जीतने से रोक सकता था.

इसलिए भाजपा की जीत पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए. उलटे यह देखना चाहिए कि आने वाले दिनों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के संबंध कैसे होंगे. क्या राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद संविधान की मर्यादा के अनुकूल स्वयं को प्रधानमंत्री के प्रति क्रिटिकल रखेंगे अथवा जो प्रधानमंत्री कहेंगे उसे जस का तस मान लेंगे. भारत की संवैधानिक परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति यदि सरकार द्वारा पारित बिल से संतुष्ट नहीं है तो वह उस बिल को वापस कर सकता है. ऐसे में सरकार या तो दोबारा बिल पास करवाए अथवा राष्ट्रपति को कठघरे में खड़ा कर उनके विरुद्ध अवमानना का प्रस्ताव लाए या खारिज किए गए बिल को कानून बनाने की बजाय उसे अध्यादेश बनाकर लागू करे. मगर यह अध्यादेश छह महीने से ज्यादा नहीं चल सकता. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कई बार बिल वापस किए थे और जब बार-बार अध्यादेश लाने लगी तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना कि अध्यादेश के भरोसे सरकार चलाना उचित नहीं. यूं प्रणब मुखर्जी ने कभी सरकार से टकराव नहीं मोल लिया पर सरकार की मंशा पर बार-बार वे प्रश्नचिन्ह लगाते रहे. अब क्या मौजूदा राष्ट्रपति सरकार की मनमानी पर अंकुश लगा पाएंगे? यह सवाल अहम है. 

(लेखक सुपरिचित संपादक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं.)


Leave your comment/अपनी प्रतिक्रिया दे