प्राथमिक शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर!

मुद्दा , , चयन करें , 29-03-2018


Worried picture of primary education

सुधीर कुमार

एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट(असर), ग्रामीण भारत के स्कूलों में बच्चों के नामांकन और उनकी शैक्षणिक प्रगति पर किया जाने वाला देश का सबसे बड़ा वार्षिक सर्वेक्षण है. स्वयंसेवी संस्था 'प्रथम' के सहयोग से जिला स्तर पर स्थानीय संस्थाओं से जुड़े कार्यकर्ताओं के जरिये, इस बार देश के 24 राज्यों के 28 जिलों में 14 से 18 वर्ष के किशोरों के मध्य कराये गये सर्वेक्षण की 12 वीं रिपोर्ट से कई चौंकाने वाले 'तथ्य' सामने आये हैं.  यह रिपोर्ट न सिर्फ, देश में बुनियादी शिक्षा की बदहाली की तस्वीर बयां कर रही हैं,  अपितु शिक्षा व्यवस्था में समाहित बुनियादी समस्याओं तथा प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर की तरफ देश के नीति-नियंताओं का ध्यान भी खींचा है.  सर्वेक्षण में देश के 1641 गांवों के पच्चीस हजार से अधिक घरों में रहने वाले करीबन तीस हजार से ज्यादा किशोरों को शामिल किया गया था. 

सर्वेक्षण के बाद, जो तस्वीर उभरकर सामने आई है, उसके मुताबिक 14 फीसदी किशोरों को भारत के मानचित्र की सही जानकारी नहीं है, जबकि 21 फीसदी को अपने राज्य का नाम भी नहीं पता है. 36 फीसदी किशोर ऐसे हैं, जिन्हें देश की राजधानी मालूम नहीं है, जबकि 60 फीसद युवा कंप्यूटर-इंटरनेट के मामले में अब तक निरक्षर हैं. सर्वेक्षण में किशोरों से सामान्य ज्ञान, अंकगणितीय कौशल और दैनिक जीवन से जुड़े प्रश्न भी पूछे गये. सर्वे में शामिल किए गए युवाओं में से करीब 25 फीसद युवा ऐसे हैं, जो अपनी भाषा में एक सरल पाठ को धारा प्रवाह रूप में नहीं पढ़ सकते. इसके अलावा आधे से ज्यादा युवा ऐसे हैं, जो गणित का भाग करने में कठिनाई का सामना करते हैं. इसी तरह, 12वीं के आगे पढ़ाई करने वाले युवाओं में करीब 35 फीसद ऐसे हैं, जो दूसरी कक्षा की भी किताब नहीं पढ़ पाते हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में मौजूदा समय में 14 से 18 आयु वर्ग के करीब 10 करोड़ युवाओं में से 86 फीसद युवा ही ऐसे हैं, जो मौजूदा समय में औपचारिक शिक्षा ले रहे हैं. इनमें करीब 60 फीसद ऐसे हैं, जो उच्च शिक्षा यानी 12वीं के आगे पढ़ने की इच्छा रखते हैं. 12वीं के आगे न पढ़ने वालों में से ज्यादातर ऐसे हैं, जिनके ऊपर पढ़ाई के साथ-साथ काम का भी दबाव है. लगभग 42 फीसद ऐसे किशोर हैं, जो पढ़ाई के साथ काम भी करते हैं. इनमें 79 फीसद खेती का काम करते हैं. तीन चौथाई ऐसे युवा हैं, जिन्हें पढ़ाई के साथ-साथ घर पर प्रतिदिन काम करना होता है. इनमें भी करीब 71 फीसद लड़के हैं, जबकि 89 फीसद लड़कियां हैं. 

प्राथमिक शिक्षा देश की शिक्षा व्यवस्था का आधार है. इसे दुरुस्त किये बिना माध्यमिक और उच्च शिक्षा के स्वर्णिम भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती. दरअसल, प्राथमिक शिक्षा का गुणात्मक विकास करके ही नागरिकों और फिर राष्ट्र को उन्नति के पथ पर अग्रसर रखा जा सकता है. भारत में बुनियादी शिक्षा की कल्पना सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने की थी. 1937 में वर्धा में आयोजित अखिल भारतीय शैक्षिक सम्मेलन में गांधी जी ने भारतीय शिक्षा में सुधार हेतु 'नई तालीम' नामक योजना पेश की थी, जिसे बाद में 'बुनियादी शिक्षा' और 'वर्धा योजना' भी कहा गया. गांधी जी ने बच्चों को राष्ट्रव्यापी, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रस्ताव रखा था. इसके अलावे, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करने तथा रोजगारपरक शिक्षा के हिमायती थे. हालांकि, वर्ष 2009 में संसद से शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) पारित कर, देश में छह से चौदह साल के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की संवैधानिक व्यवस्था लागू तो कर दी गई, लेकिन बच्चों को विद्यालय से जोड़ने तथा शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है. देश को अभी भी नौ लाख शिक्षकों की जरुरत है. कई राज्यों में शिक्षकों की नियुक्तियां अटकी हुई हैं, जिसे भरने में राज्य सरकारें ढूलमुल रवैया अपनाती रही हैं. सरकार ने छात्र और शिक्षक का अनुपात 40:1 निर्धारित किया है, लेकिन कई सरकारी स्कूलों में यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है. कहीं जरुरत भर के शिक्षक नहीं हैं, तो कहीं बच्चों की उपस्थिति ही कम है. समय पर कभी छात्रों तो कभी शिक्षकों का विद्यालय नहीं पहुंचना तथा गैर-शैक्षणिक कार्यों को शिक्षकों के कंधे पर डालना भी शिक्षा व्यवस्था की प्रचलित समस्या रही है. 

दरअसल, बाजारवाद की गिरफ्त में समाती शिक्षा, कुकुरमुत्ते की तरह गली-गली में खुलते निजी विद्यालय तथा सरकारी उपेक्षा की वजह से बुनियादी शिक्षा निरंतर हाशिये पर जाती रही है. सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में कमी की वजह से अभिभावक अपने बच्चों के लिए निजी और कॉन्वेंट स्कूलों की तरफ देख रहे हैं. एक समय था, जब सरकारी स्कूलों को सम्मान की नजर से देखा जाता था, लेकिन आज उसे उपेक्षा के भाव से देखा जा रहा है. मैंने भी अपनी प्राथमिक शिक्षा गांव (राजाभीठा, गोड्डा, झारखंड) के ही सरकारी विद्यालय से प्राप्त की थी. तब स्थिति इतनी चिंताजनक नहीं थी, लेकिन आज स्थिति यह है कि बमुश्किल पांच से सात बच्चे विद्यालय आ रहे हैं. भोजन वितरण (मध्याह्न भोजन) के बाद बच्चों का चंपत हो जाना भी आम बात है. दरअसल, प्राथमिक विद्यालय की निकटतम उपलब्धता के बावजूद, कक्षा में बच्चों की उपस्थिति कम नजर आ रही है. स्कूल के समय, बच्चे या तो खेलते नजर आ जाते हैं, या घर के कामों में बड़ों का हाथ बंटाते. आलम यह है कि 'मध्याह्न भोजन योजना', छात्रवृति तथा मुफ्त पाठ्य-पुस्तकों के वितरण की व्यवस्था भी बच्चों को स्कूल में रोके रखने में सफल नहीं हो पा रही हैं. वहीं, ग्रामीण विद्यालयों में विद्यालय-परित्यक्त छात्रों की संख्या का दिनोंदिन बढ़ना भी चिंता की बात है. सरकारी स्कूलों में आधारभूत संरचना की कमी, शौचालय के न होने या उसकी बुरी स्थिति में होने से लड़कियां स्कूल जाने से कतराती हैं. जबकि, सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न दिये जाने के कारण आज निम्न आय वर्गीय परिवार के अभिभावक भी अपने बच्चों को किसी निजी स्कूलों में भेजना ही श्रेयस्कर समझ रहे हैं. दूसरी तरफ, समाज के उपेक्षित वर्ग के बच्चों की नामांकन संख्या में बढ़ोतरी ना होना भी नीति-निर्माताओं के सिर-दर्द का कारण बन गया है. सच्चाई यह भी है कि देश के सरकारी विद्यालय, दिनोंदिन अपना चमक खोते जा रहे हैं. इन विद्यालयों से अनियमितता की लगातार शिकायतें आ रही हैं. सवाल गंभीर है कि आखिर सरकारी विद्यालयों में करोड़ों रुपये के फंडिंग के बावजूद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बच्चों की पहुंच से कोसों दूर क्यों है? तब जबकि, सरकारी विद्यालयों पर ग्रामीण भारत की एक बड़ी आबादी निर्भर है!

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बहाली का एक असाधारण सुझाव जरुर दिया था, लेकिन उक्त आदेश कितना व्यवहृत हुआ है, समझा जा सकता है. काश! हमारे राजनीतिक, नौकरशाह और अन्य अधिकारी अपने बच्चों को इन विद्यालयों में नामांकन दिलवाते, तो वाकई चंद माह में स्थिति सुधर सकती थी. लेकिन इसकी फिक्र किसे है? परेशानी तो यह भी है कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों का ध्यान केवल बच्चों की विद्यालयी उपस्थिति और राष्ट्र का साक्षरता दर बढ़ाने की है, लेकिन राज्य में पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति है या नहीं? विद्यालयों में नियमित रूप से शिक्षक आते हैं या नहीं? आते हैं तो क्या पढ़ाते हैं? इन सब मुद्दों से किसी नेता या अधिकारी को तनिक भी सरोकार नहीं रहा. नतीजा? 'असर' की मौजूदा रिपोर्ट से जाहिर है. 

एसोचैम की एक रिपोर्ट की मानें, तो भारत यदि अपनी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में प्रभावशाली बदलाव नहीं करता है तो, विकसित देशों की बराबरी करने में उसे छह पीढ़ियां यानी करीबन सवा सौ साल लग जाएंगे. गौरतलब है कि भारत अपनी शिक्षा व्यवस्था पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 3.83 फीसदी हिस्सा ही खर्च करता है जबकि, अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में यह हिस्सेदारी क्रमशः 5.22, 5.72 और 4.95 प्रतिशत की है. हालांकि, इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र संघ का मानक यह है कि हर देश शिक्षा व्यवस्था पर अपनी जीडीपी का कम से कम 6 फीसदी खर्च करे. देश में शिक्षा सुधारों के लिए डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में 1964 में गठित कोठारी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कुल राष्ट्रीय आय के 6 फीसदी को शिक्षा पर व्यय करने का सुझाव दिया था. जबकि, वास्तविकता यह है कि इस क्षेत्र में महज तीन से चार फीसदी ही राशि आवंटित हो पाती हैं. 

प्राथमिक शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर के परिप्रेक्ष्य में देश के काॅलेजों और विश्वविद्यालयों की समस्याओं पर भी गौर करना जरूरी है. दरअसल, कॉलेज और विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा प्राप्ति की दृष्टि से विद्यार्थियों के जीवन का अहम् पड़ाव होता है. देश की प्रगति के लिए उच्च शिक्षा एक रोडमेप तैयार करती है. यह बात दीगर है कि उच्च शिक्षा प्राप्त लाखों लोग बेरोजगार हो रहे हैं. उनके पास डिग्री तो है किंतु, हुनर और कौशल की कमी है. सुबाई कॉलेजों सहित देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शिक्षा की मौजूदा स्थिति किसी से छिपी नहीं है. अपवाद छोड़ दें, तो अधिकांश विश्वविद्यालयों में समय पर कोर्स की पढ़ाई पूरी नहीं पाती हैं. वहीं, राज्य सरकार द्वारा संचालित अधिकतर विश्वविद्यालयों में तीन वर्षों की बैचलर डिग्री पांच वर्षों तक खींची जाती है. सवाल यह है कि उदासीनता क्यों है? क्या सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे संसाधन पर्याप्त नहीं हैं या प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों की शिथिलता के कारण ऐसी ढीली प्रथाएं प्रचलन में आ गयी हैं? युवा विरोध करते हैं, आंदोलित भी होते हैं, परिणामस्वरुप कुछ दिनों तक दिखावे के परिवर्तन तो होते हैं, लेकिन अंततोगत्वा वही पुरानी लीक प्रचलन में आ जाती हैं.  

शिक्षा नागरिकों की मुलभूत आवश्यकता है. सामाजिक बंधनों, बुराइयों और कुरीतियों के खात्मे की दिशा में शिक्षा एक बड़ा हथियार साबित हुआ है. शिक्षा, सामाजिक व वैयक्तिक, शोषण तथा अन्याय के खिलाफ लड़ने व संघर्ष की ताकत प्रदान करता है. यदि, देश के शिक्षार्थियों को नियमित, मूल्यपरक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती है, तो निश्चय ही गरीबी, बेरोजगारी, नक्सलवाद, आतंकवाद और अयोग्य प्रत्याशियों के चुनाव जैसी मुलभूत समस्याएँ देश के विकास में बाधक नहीं बनेंगी. संपूर्ण क्रांति के जनक, जयप्रकाश नारायण के शब्दों में, 'आज की शिक्षा-प्रणाली से, अधिकांश बच्चे 'अनपढ़' और 'अज्ञानी' होते जा रहे हैं'. इसलिए, प्राथमिक से लेकर, विश्वविद्यालय तक की शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए. जयप्रकाश नारायण, देश में ऐसी शिक्षा व्यवस्था के हिमायती थे, जहां शिक्षा का डिग्री से कोई संबंध ना हो तथा डिग्री लेकर कोई नौकरी के लिए ना भटके, इसलिए रोजगारपरक शिक्षा बहाल होनी चाहिए. जे. पी.  का यह क्रन्तिकारी विचार, भारतीय शिक्षा की तस्वीर बदल सकता है. सनद रहे, शिक्षा का उद्देश्य केवल राष्ट्र के नागरिकों को साक्षर बना देना ही काफी नहीं है;लोगों में काबिलियत का विकास कर उसे अपनी योग्यतानुसार रोजगार की चौखट तक पहुंचाना ही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए. शिक्षा व्यवस्था में समाहित समस्याओं से निपटे बिना न तो देश को विकास के पथ पर बरकरार रखा जा सकता है और ना ही 'विश्व गुरु' बनने का गौरव प्राप्त हो पाएगा. 


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