विकास की राह में आदर्श ग्राम योजना के वेदनामय स्वर

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Vedantic tone of ideal village scheme in the path of development

जय प्रकाश पाण्डेय

प्रधानमंत्री ने लोकनायक जय प्रकाश नारायण की जयंती पर 11 अक्टूबर 2014 को ‘आदर्श ग्राम योजना’ लांच की थी इस मकसद के साथ कि सांसदों द्वारा गोद लिया गांव 11 अक्टूबर 2016 तक सर्वांगीण विकास के साथ दुनिया को आदर्श ग्राम के रूप में नजर आयेगा परन्तु कई जानकारों ने इस योजना पर सवाल उठाते हुए इसकी कामयाबी को लेकर संदेह भी जताया था जो आज सच लगता है. गांव की सूरत देखकर योजना के क्रियान्वयन पर चिंता की लकीरें उभरना स्वाभाविक है. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री का मकसद इस योजना के जरिए देश के 6 लाख गांवों को उनका वह हक दिलाना है जिसकी परिकल्पना स्वाधीनता संग्राम के दिनों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने की थी. गांधी की नजर में गांव गणतंत्र के लघु रूप थे जिनकी बुनियाद पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की इमारत खड़ी है. 

प्रधानमंत्री की अभिनव आदर्श ग्राम योजना में अधिकांश ग्रामों को गोद लिए तीन साल से ज्यादा गुजर गया है पर कहीं कुछ पुख्ता नहीं दिख रहा है. ये भी सच है कि दिल्ली से चलने वाली योजनाएं नाम तो प्रधानमंत्री का ढोतीं हैं मगर गांव के प्रधान के घर पहुंचते ही अपना बोझा उतार देतीं हैं. एक पिछड़े आदिवासी अंचल के गांव की सरपंच हल्की बाई बैगा घूंघट की आड़ में कुछ पूछने पर इशारे करती हुई शर्माती है तो झट सरपंच पति मनीराम बैगा समरहा टोला में पानी की विकट किल्लत की बात करने लगता है - समरहा टोला में नल नहीं लगे हैं, हैंडपंप नहीं खुदे और न ही बिजली पहुंची. आदर्श ग्राम योजना के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम.

मध्यप्रदेश के सुदूर प्रकृति की सुरम्य वादियों के बीच आदिवासी जिला के बैगा बाहुल्य गांव कापा के पड़ोस से कलकल बहती पुण्य सलिला नर्मदा और चारों ओर ऊंची-ऊंची हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा कापा एक पर्यटन स्थल की तरह महसूस होता है परन्तु गरीबी, लाचारी, बेरोजगारी गांव में इस कदर पसरी है कि उसका कलम से बखान नहीं किया जा सकता है. करीब 1400 की आबादी वाले कापा में 80% गरीब बैगा परिवार रहते हैं पूरे मध्यप्रदेश के औसत लिंगानुपात से अधिक कापा में लिंगानुपात देखा जा सकता है, साक्षरता का प्रतिशत बहुत कमजोर और चिंतनीय ह. कापा की बैगा बस्ती दिन के उजाले में भी सायं-सायं करती नजर आती है. 

प्रधानमंत्री की इस योजना में गांव के लोगों को कहा गया है कि वे अपने सांसद से संवाद करें. योजना के माध्यम से लोगों में विकास का वातावरण पैदा हो, इसके लिए सरकारी तंत्र और विशेष कर सांसद समन्वय स्थापित करें. इस बात पर सरपंच पति मनी बैगा बताते हैं कि ‘सांसद बेचारे बहुत व्यस्त रहते हैं और प्रधानमंत्री ज्यादा उम्मीद करते हैं. बेचारे सांसद साल डेढ़ साल तक ऐसे गांव नहीं पहुंच पाते तो इसमें सांसदों का दोष नहीं हैं उनके भी तो लड़का बच्चा हैं.’ बैगा बाहुल्य गांव में घर में शराब बनाने की छूट रहती है और महुआ की शराब एवं पेज पीकर वे अपना जीवन यापन करते हैं पर गांव भर के लोगों को सरकार की मंशा के अनुसार नशा नहीं करने की शपथ दिलाई गई है. 

सरपंच पति ने बताया कि गांव में 50-60% के लगभग जनधन खाते खुल पाए हैं, सुरक्षा बीमा के हाल बेहाल हैं. उज्जवला योजना में गरीब दो चार महिलाओं को मुफ्त एल पी जी कनेक्शन मिले हो सकते हैं पर सभी गरीबी रेखा की महिलाएं हर महीने सिलेंडर खरीदने 800 रुपये कहाँ से पाएंगी? फसल बीमा के बारे में गांव में किसी को जानकारी नहीं है. कुछ शौचालय बने हैं पर खुले में शौच लोग जाते रहते हैं. 

गांव के 40 वर्षीय झोलटी बैगा बताते हैं कि ‘जनधन खाता गांव से 45 किमी दूर के बैंक में खुला है क्योंकि गांव में या उसके आसपास कोई बैंक या कियोस्क नहीं है. प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा में 12-12 रुपये दो बार जमा किया लेकिन कोई रसीद वगैरह नहीं मिली.’ बैंक से मिले ऋण के बारे में उनका कहना है कि एक बार इसके एवज में कोई कंपनी 5000 रुपये का बकरा दे गई. ब्याज सहित पूरे पैसे वसूल लिए गए. बाद में बकरा भी मर गया. गांव के 9 गरीबों को एक-एक बकरा दिया गया था, बकरी नहीं. सब बकरे कुछ दिन बाद ही मर गए. 

तुलसीराम बैगा पांचवीं फेल हैं और उनको किसी रोजगार के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं मिला. मेहनत मजदूरी करके एक टाइम का पेट भर पाते हैं, चेंज की भाजी में आम की अमकरिया डालके 'पेज' पी जाते हैं. सड़क के सवाल पर तुलसी ने बताया कि गांव की मुख्य गली में सड़क जैसी तो बन गई है लेकिन कभी-कभार ही सोलर लाइट चौरास्ते पर जलती दिखती है. कभी-कभी पानी भी नल से आ जाता है पर नलों में टोंटी नहीं है. 

दूसरी पास फगनू बैगा जानवर चराने जंगल ले जाते हैं और खेतों में जुताई करके पेट पालते हैं. जब बीमार पड़ते हैं तो नर्मदा मैया के भजन करके ठीक हो जाते हैं. 

प्राईमरी, मिडिल और हाईस्कूल की दर्ज संख्या के अनुसार स्कूल में शिक्षकों का भीषण अभाव है. 'स्कूल चलें हम' सन्तोषजनक नहीं है. पहली से दसवीं तक के अधिकांश बच्चे जंगल और नर्मदा नदी के इस पार और उस पार से कई मील चलकर आते हैं कई गांव के बच्चे जान जोखिम में डाल कर नाव से स्कूल पढ़ने आते हैं बरसात में नहीं भी आते. यातायात के साधन न के बराबर हैं. अधिकांश बच्चे बैगा जाति के हैं, और वे कहते हैं कि ‘बड़े होकर देश की रक्षा करेंगे.’ 

डिजीटल इंडिया को ठेंगा दिखाता गांव में दूर दूर तक किसी भी प्रकार की दूरसंचार सेवाएं उपलब्ध नहीं है 15-20 किमी के दायरे में मोबाइल के संकेत नहीं मिलते, गांव के पास एक ऊंची पहाड़ी के ऊपर एक खास पेड़ में चढ़ने से मोबाइल के लहराते संकेत मिलते हैं कलेक्टर के कहने पर गांव में एक दिन स्वास्थ्य विभाग का एक स्टाफ कभी-कभार आ जाता है. कुपोषण की आदत गांव के संस्कारों में रहती है. 

देर से ही सही पर अब गांव के विकास में प्रशासन अपनी रुचि दिखाने जैसा कुछ कर रहा है. पर यह भी सच है कि गांधी के सपनों का गांव बनाने के लिए पारदर्शिता सच्ची जवाबदेही और ईमानदार कोशिश की जरूरत होगी. 


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