कितने चौरासी चौरासी के फेर में

विमर्श , , चयन करें , 13-11-2017


How many rounds of eighty four

शंभूनाथ शुक्ला

आज से 33 साल पहले मैं दिल्ली में ही था. ठीक 11 बजे एक्सप्रेस बिल्डिंग पहुंच कर अपने कागज-पत्तर मेज पर रखे ही थे कि केबिन के बाहर से कुछ लोगों की जोर-जोर की आवाजें आने लगीं. भागकर अपने केबिन से बाहर आया. देखा कि इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान सम्पादक जार्ज वर्गीज के कमरे के बाहर भीड़ लगी है. मैने एक से पूछा क्या हुआ तो उसने बताया कि इंदिरा गांधी को गोली मार दी गई है. आवाक रह गया. कभी सोचा नहीं जा सकता था कि इंदिरा गांधी जैसी शख्सियत को कोई मार सकता है. असीम शक्ति थी उनके पास और उनकी लोकप्रियता व उनका इकबाल ऐसा कि चाहे कोई आए इंदिरा गांधी के बगैर प्रधानमंत्री के पद की कल्पना नहीं की जा सकती थी. मैंे जब सातवें दर्जे में था तभी इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनी थीं. पढ़ाई पूरी कर और नौकरी में भी आ गया तब तक रेडियो में बस यही सुनते और हर रोज अखबारों में यही पढ़ते आ रहे थे कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा.....! 

मैं कई बार सोचता हूं कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं होती. हम किसी को भी प्यार और दुलार से समझा सकते हैं लेकिन इसके लिए धैर्य चाहिए, साहस चाहिए और निडरता भी. 1984 का जवाब 1984 और फिर 1984 नहीं था. लेकिन तीन बार यह दुर्घटना घटी. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके ही दो अंगरक्षकों ने 31 अक्टूबर 1984 को 'आपरेशन ब्लूस्टार' के पांच महीने के भीतर ही मार दिया. उस इंदिरा गांधी को जिनके बारे में हम रोज अखबारों और रेडियो पर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी उवाच इतनी बार सुन चुके थे कि हमें कभी यह लगा ही नहीं कि इंदिरा गांधी को जाना भी पड़ सकता है. एक सर्वशक्तिशाली महिला जिसने राजाओं के ताज छीन लिए और पूंजीपतियों से उनके बैंक. वह महिला जिसके बारे में उनके विरोधी कहते थे कि “इंदिरा बहिन का है राजरानी, प्यासा न पावै हिन कहूं पानी !” हम इतनी बार सुन चुके थे कि 31 अक्टूबर को सुबह 11 बजे जब मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग पहुंचा और यह बताया गया कि इंदिरा गांधी को किसी ने गोली मार दी है तो कुछ समझ ही नहीं आया. ऐसा कैसे हो सकता है? 1966 की जनवरी से अक्टूबर 1984 तक हम बस इंदिरा-इंदिरा ही सुनते रहे थे. भले बीच में मोरार जी देसाई तथा चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे हों, पर हरदम लगा यही कि अरे ये तो पिन्नी टाइप के नेता हैं जिनकी इंदिरा गांधी को देखते ही फूंक सरक जाया करती थी. चरण सिंह जब गृहमंत्री थे तो इंदिरा जी को गिरफ्तार करने की योजना बनाई. इंदिरा जी जाकर एक पुलिया पर धरने पर बैठ गईं तो खुद यही नेता उन्हें मनाने गए कि बहिन जी आप घर जाओ. कोई आपको नहीं पकड़ेगा. एक ऐसी महिला को कोई मार सकता है भला.

लेकिन वह अफवाह नहीं थी, सच था. बाद में पता चला कि उन्हें गोली मारने वाले उनके सिख अंगरक्षक बेअंत सिंह और सतवंत सिंह थे. मजे की बात कि इन्हें इंदिरा जी के अंगरक्षक पद से हटाने का दबाव था, पर इंदिरा जी ने ऐसा नहीं होने दिया. कुछ ही देर बाद चारों ओर अंधेरा छा गया. अक्टूबर की धूप के बावजूद सूरज दोपहर में ही ढल गया. बताया गया कि जून में हुए आपरेशन ब्लू स्टार का बदला था, लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ वह सोचा तक नहीं गया था. एक पूरी कौम को निशाना बनाकर हमला किया गया. इस खूँरेजी में हिंदू-मुसलमान दोनों ही बराबर के शरीक थे. यहां इंदिरा जी की हत्या का बदला कम लूट की बहुतायत थी. सिख एक मेहनतकश संपन्न कौम रही है. उनके पास पैसा था और उस जमाने में ऐसी-ऐसी चीजें लूटी गईं जो आम मध्यवर्ग कल्पना नहीं कर सकता था. पूरी दिल्ली समेत सारे हिंदी भाषी इलाकों में सिखों के घरों को लूटा जाने लगा. बूढ़े व बच्चों समेत सभी मर्दों की हत्या का खूनी खेल शुरू हो गया. यह कोई दंगा नहीं था, बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों, खासकर हिंदी भाषी इलाकों के, की कुंठा थी. आलसी और मूर्ख लोगों का हुजूम सिखों को लूट रहा था और जो लोग कुछ कर सकते थे वह इसे निस्सहाय से देख रहे थे. लाशों की सड़न से दिल्ली गंधा रही थी. एक सभ्य देश की राजधानी का यह आलम दुखद था.

इंदिरा जी के बेटे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया जो अभी कुछ साल पहले तक सिर्फ जहाज उड़ाया करते थे. इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय की आकस्मिक मौत के बाद उन्हें सहारे के लिए अपने साथ किया हुआ था. तब कैबिनेट में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी वरिष्ठतम थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं देकर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया. राजीव घाघ राजनेता नहीं थे. भोलाभाला चेहरा और राजनीति के चौसर में एकदम सिफर. राजीव प्रधानमंत्री बने तो कारपोरेट हाउसेज ने उन्हें हाथों-हाथ लिया था. यहां तक कि इंडियन एक्सप्रेस समूह ने भी. बाद में यही कारपोरेट हाउस उन्हें सत्ता से बेदखल करने में भी लग गए. जो कल तक राजीव गाँधी के गुण गाते नहीं अघाते थे, वही उन्हें बोफोर्स चोर बताने में लग गए. इसमें अहम भूमिका राजीव गाँधी के ही एक कैबिनेट मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) की रही. बतौर वित्तमंत्री वही करपोरेट घराने वीपी सिंह के साथ हो लिए और उनकी महत्त्वाकांक्षा ने एक अच्छी-भली सरकार को ऐसा फँसा दिया कि राजीव गाँधी अपनी सिधाई और भलमनसाहत की छवि के बावजूद वीपी सिंह की महत्त्वाकांक्षा के शिकार हुए.

हालाँकि इंदिरा गाँधी की हत्या से एक युग का अंत हो गया था. पर उनके जाने के बाद से देश में आतंकवाद ने अपनी जड़ें और पुख्ता कर लीं. नतीजा यह हुआ कि उनके पुत्र राजीव गाँधी भी एक आतंकी हादसे में मारे गए. शायद इसकी वज़ह हो कि आतंक का खात्मा सरकारी दमन से नहीं बल्कि पारस्परिक सौहार्द और वार्ता से होता है.   


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