अलवर व अजमेर को आजमगढ़ और चिकमगलूर में बदल पायेगी कांग्रेस?

विमर्श , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Congress will convert Alwar and Ajmer into Azamgarh and Chikmagalur

कृष्ण प्रताप सिंह

राजस्थान की अलवर व अजमेर लोकसभा सीटों के उपचुनावों ने राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद देश की सबसे पुरानी और बदहाली में भी विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को पहली ऐसी खुशखबरी दी है, जिससे उसका अपने दुर्दिन के खात्मे की उम्मीद पालना स्वाभाविक लगे. इस खुशखबरी का, जिसके सोने में राज्य की मांडलगढ़ विधानसभा सीट की जीत ने सुहागा कर दिया है, सच सिर्फ इतना ही नहीं है कि कांग्रेस इन सीटों पर केन्द्र और राज्य दोनों में सत्तारूढ़ अपनी प्रबलतम प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी को पटखनी देने में सफल रही है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जतन से गढ़े गये महानायकत्व के लगातार विस्तार के दावों के बीच भाजपा को अजेय घोषित करते हुए अनेक तर्कशास्त्री जिस तरह बार-बार कहते आ रहे थे कि कांग्रेस का निकट भविष्य में उसके खिलाफ जीत का फार्मूला तलाश पाना कठिन है, उसके मद्देनजर कांग्रेस द्वारा इन उपचुनाव क्षेत्रों की 17 विधानसभा सीटों में एक पर भी भाजपा को मुकाबले में न आने देना और भारी अंतर से एकतरफा जीत हासिल करना अगर करिश्मा नहीं तो करिश्मे से कम भी नहीं है. अकारण नहीं कि इसके बाद राजस्थान की राजधानी जयपुर के कई अखबारों ने इस करिश्मे की खबर देने के लिए आम बजट की खबर को सेकेंड लीड बनाया और पहली लीड में ‘भाजपा तीनों खाने चित’ जैसी शब्दावली इस्तेमाल की. इतना ही नहीं, भाजपा की गठबंधन सहयोगी शिवसेना के सांसद संजय राउत यह कहने की हद तक चले गये कि गुजरात विधानसभा चुनाव ट्रेलर थे, राजस्थान के उपचुनाव इंटरवल हैं और पूरी फिल्म हम 2019 में देखेंगे.    

लेकिन बात अखबारों की सुर्खियों और नेताओं के बयानों की ही नहीं है. इन उपचुनाव नतीजों को इस लिहाज से भी लम्बे वक्त तक याद रखा जायेगा कि मतदाताओं ने इनमें लव-जेहाद व गोहत्याएं रोकने के बहाने राजसमंद व अलवर में निर्दोष अल्पसंख्यकों की निर्मम हत्याओं के गुनाहगारों को संरक्षण के भाजपा के साम्प्रदायिक कार्ड को भी धूल चटायी है. गौरतलब है कि कुछ ही महीनों बाद राजस्थान विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं और इन उपचुनावों को उसका सेमीफाइनल माना जा रहा था. ऐसे में इस भिड़ंत में भाजपा जीतती तो उसके नेता इसे न सिर्फ नरेन्द्र मोदी के महानायकत्व और उनकी सरकार की नीतियों बल्कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजमद व अहंकार और उनकी सरकार के किये-धरे पर भी मोहर के रूप में प्रचारित करते. लेकिन गत गुरुवार को उनका ऐसी अप्रिय स्थिति से सामना हुआ कि एक ओर वित्तमंत्री के बजट प्रस्ताव आ रहे थे, दूसरी ओर न सिर्फ राजस्थान बल्कि पश्चिम बंगाल से भी भाजपा के चुनाव हारने की खबरें और उनका यह कहकर हार के सदमे से उबरने की कोशिश करनी पड़ रही थी कि उपचुनावों में मतदाता आमतौर पर ऐसे ही अपनी चौंकाने वाली राय व्यक्त किया करते हैं क्योंकि जानते हैं कि उनके नतीजों से सरकारें नहीं बना-बिगड़ा करतीं. 

ऐसे में उनसे इस सवाल के जवाब की उम्मीद भी कैसे की जा सकती थी कि लोकसभा उपचुनावों में भाजपा की शिकस्त का जो सिलसिला पिछले साल पंजाब की गुरुदासपुर सीट से शुरू हुआ था, वह टूटने को क्यों नहीं आ रहा ? उस पश्चिम बंगाल में भी वह कोई चमत्कार क्यों नहीं कर पा रही, जिसे लेकर वह बड़े-बड़े सपने और मुगालते पालती रहती है ? फिर वह कैसे कह सकती है कि यह सिलसिला मतदाताओं की उस निराशा की अभिव्यक्ति नहीं है, जिसका पता अभी थोड़े ही दिनों पहले एनबीटी-सी वोटर ने देश के 52 शहरों में छः हजार से अधिक लोगों के बीच सर्वे में लगाया था. कई अन्य सर्वेक्षणों में भी कहा गया था कि मतदाताओं की मोदी सरकार के प्रति सकारात्मक में तेजी से कमी आ रही है. न सिर्फ बड़े शहरों बल्कि कस्बों व गांवों में भी क्या युवा, क्या अधेड़ और क्या वृद्ध, सभी आमदनी व रोजी-रोटी की बढ़ती अनिश्चितताओं, महंगाई और नीतिगत मनमानी को लेकर निराश हो रहे हैं.

सत्तारूढ़ दल के रूप में भाजपा से अपेक्षित था कि वह इस निराशा को गम्भीरता से लेती और उनके कारणों को दूर करने में लगती. लेकिन इसके उलट वह इस सहूलियत का इस्तेमाल करने में ही मगन है कि बजट के शोर के बीच उसकी इन हारों पर बहुत चर्चा नहीं हो रही. वह यह देखना तक गवारा नहीं कर रही कि उसके समर्थक विश्लेषक इन उपचुनाव नतीजों को कांग्रेस की जीत से ज्यादा भाजपा की हार के तौर पर देख रहे हैं, जो उसके लिए विरोधी विश्लेषकों के विश्लेषणों से ज्यादा त्रासद है. इन विश्लेषकों के अनुसार इन तीनों ही सीटों पर मतदाता मोदी सरकार की नोटबंदी व जीएसटी जैसी नीतियों के साथ कालेधन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर असफलता के खिलाफ भी मुखर थे.

हां, मेवबहुल अलवर में पिछले साल पहलू खान की हत्या के अभियुक्तों को बरी किये जाने और हरियाणा में चलती ट्रेन में जुनैद को मारे जाने को लेकर भारी नाराजगी तो थी ही, राजसमंद में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मजदूर की नृशंस हत्या के बाद वसुंधरा राजे सरकार की चुप्पी से भी मतदाता क्षुब्ध थे. सो, उन्होंने भाजपा को तीनों खाने चितकर यह बताने में कोई कसर नहीं रखी कि साम्प्रदायिक व धार्मिक ध्रुवीकरण हमेशा के लिए उसकी जीत की गारंटी नहीं हो सकते. अलबत्ता, पिछले साल कथित मुठभेड़ में कुख्यात गैंगेस्टर आनंदपाल की मौत, विवादित फिल्म ‘पद्मावत’ की रिलीज और डांगावास गांव में भूमि विवाद में पांच दलितों की हत्या जैसे मामलों ने भी भाजपा की उम्मीदों के ताबूतों में कीलें ठोंकीं. 

यों उसकी शिकस्त के और भी कारण गिनाये जा रहे हैं. जैसे: खाद व बीज से सब्सिडी घटाकर किसानों और अन्यान्य कारणों से कर्मचारियों की नाराजगी मोल लेना, भ्रष्टाचारी मंत्रियों और अधिकारियों को बचाने के लिए काले कानून की सिफारिश करना और सरकारी मशीनरी को पीपीपी मोड पर देना. 

ये कारण अपनी जगह पर रहें, लेकिन भाजपा के लिए चिंता का बड़ा कारण यह होना चाहिए कि ज्यादातर लोग उसकी हार को इस रूप में व्याख्यायित कर रहे हैं - ‘पिछले चार साल में एक-दो मौकों को छोड़कर कभी नहीं लगा कि राजस्थान में कोई विपक्ष भी है. इस दौरान विपक्षी कांग्रेस केन्द्र व प्रदेश की भाजपा सरकारों की कारगुजारियों की ओर से लगातार मुंह फेरे रही. फिर भी भाजपा से नाराज मतदाताओं ने भाजपा को सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों में हराकर दम लिया. ये वही मतदाता थे, जिन्होंने गत विधानसभा चुनाव में तो उसे भारी बहुमत दिया ही था, लोकसभा चुनाव में भी राज्य की सारी की सारी सीटें उसके नाम कर दी थीं.’ 

इसके बावजूद भाजपा इन्हें उपचुनाव नतीजे कहकर गम्भीरता से नहीं लेना चाहती तो उसे समझना चाहिए कि उपचुनाव नतीजे हमेशा महत्वहीन नहीं हुआ करते. कई बार वे खतरे की घंटी भी बजाते हैं और कोई पार्टी उसे सुनकर भी सुनने से मना कर दे तो उसे बेदखली तक ले जाने से भी नहीं हिचकते. हां, उसे और कुछ नहीं तो 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी की, अपने पूर्वावतार जनसंघ के रूप में जिसकी वह भी एक घटक रही है, विकट आंधी के बाद हुए कर्नाटक की चिकमगलूर और उत्तर प्रदेश की आजमगढ़ लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों को याद करना चाहिए. 

आजमगढ़ के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मोहसिना किदवई और चिकमगलूर के उपचुनाव में स्वयं इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक जीत ने न सिर्फ देश के मतदाताओं पर चढ़े जनता पार्टी के खुमार का अंत कर दिया था, बल्कि कांग्रेस की वापसी की भूमिका भी तैयार कर डाली थी. फिर तो उसकी बुरी तरह शिकस्त खाई नेता श्रीमती गांधी दुगुने उत्साह से अपने काम में लग गई थीं. आगे चलकर कैसे उन्होंने जनता पार्टी में फूट डाली, मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार गिरवाकर कांग्रेस के समर्थन से चौधरी चरण सिंह की सरकार बनवाई, उन्हें लोकसभा का मुंह तक न देखने देकर समर्थन वापस लिया और मध्यावधि चुनाव करवाया, यह अब देश के इतिहास का हिस्सा है. 

हां, कांग्रेस अलवर व अजमेर के नतीजों को आजमगढ़ व चिकमगलूर जैसे अंजाम तक ले जाकर भाजपा व मोदी सरकार के प्रति मतदाताओं की बढ़ती निराशा को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर पायेगी या नहीं, यह इस सवाल के जवाब पर निर्भर करेगा कि वह राहुल गांधी के नेतृत्व में इन्दिरा गांधी जैसा जीवट प्रदर्शित कर पाती है या नहीं. जवाब के लिए उसके पास ज्यादा वक्त नहीं बचा है और अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए उसे वैसे संदेशों और समीकरणों से लगातार बचते रहना होगा, जिनकी बिना पर उसकी अपील सीमित कर भाजपा अपने आधार का विस्तार करती आयी है. 


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