विचारों के उबाल से तैयार होती शब्दों की पकवान

व्यक्तित्व , , रविवार , 17-12-2017


The words of the words ready to boil

श्रीराजेश

पाकड़ के पेड़ के नीचे पत्तियों की सरसराहट के बीच स्टोव की मद्धिम आंच पर चाय की उबाल की तरह ही लक्ष्मण राव के जेहन में विचार उबलते रहते हैं. जब ये विचार उबल कर पक जाते हैं तब एक और पुस्तक की शक्ल ले लेते हैं. लक्ष्मण फुटपाथ पर के साहित्यकार हैं और उनके साहित्य में फुटपाथ की ही जिंदगी का अक्स करीने से दृष्टिगोचर होता है. देश की राजधानी दिल्ली के आईटीओ के नजदीक विष्णु दिगंबर मार्ग स्थित हिंदी भवन के सामने उस पाकड़ के पेड़ के नीचे लक्ष्मण राव का चाय का ठिया और उनकी दो दर्जन से अधिक की पुस्तकों का स्टाल मय बैनर पोस्ट को सजाए रखता है. 

शनिवार की वह थोड़ी सर्द शाम थी. मेरे हमपेशा वरिष्ठ टिल्लन रिछारिया ने चाय पीने की इच्छा जतायी तो हम लक्ष्मण राव की दुकान का रुख कर लिये. राव पेड़ से गिरी पत्तियां बुहार रहे थे. स्टोव पर चाय का दोना तो चढ़ा था, लेकिन स्टोव बुझी थी. नजर मिली - दुआ-सलाम हुआ. 

उन्होंने पूछा - 'चाय बनाऊं?'

हमने कहा - 'चाय पीने ही तो आएं है.'

फिर कोई बात-चीत नहीं. लक्ष्मण राव पत्तियां बुहारने में लग गये. हम उनकी पुस्तकों के स्टॉल की ओर बढ़ गये. नई किताब ‘पत्तियों की सरसराहट’ दिखी. उनकी लिखीं किताबें इस स्टॉल से लेकर ऑनलाइन प्लेटफार्म तक उपलब्ध है. हम एक-एक किताबों के आवरण देखते-पलटते रहे. 

इसी बीच उनकी आवाज कान में पड़ी - 'ले लीजिए.'

हम अब उनसे मुखातिब थे. कागज वाली चाय की कप हाथ में लेते हुए हम उनसे पुनः उनकी आपबीती के बारे में बात करने लगे. हालांकि ये बातें इसके पहले भी कई बार हो चुकी है. वह पहले ही बता चुके हैं कि गुलशन नंदा का उपन्यास पढ़ते–पढ़ते उनमें लिखने की ललक पैदा हो गई. यूं तो वे दसवीं तक मराठी माध्यम से ही पढ़े थे, लेकिन उन्होंने हिंदी सीखी तो गुलशन नंदा के उपन्यासों को पढ़ते हुए. बाद में उन्होंने हिंदी साहित्य से एम.ए. भी किया.

अधिकतर लोगों की नजरों में लक्ष्मण अपनी टिन की केतली और कांच और कागज के कुछ कप-गिलास के साथ दिल्ली के फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले एक चायवाले से अधिक और कुछ भी नहीं हैं. लेखन लक्ष्मण का जुनून तो हो सकता है, लेकिन सिर्फ लेखनी के भरोसे वे अपना और अपने परिवार का पेट भरने में नाकाम रहते. ऐसे में अपना जीवन चलाने के लिये वे चाय बनाकर बेच रहे हैं. और ऐसा करते हुए उन्हें हर वक्त यह चिंता सताती रहती है कि कहीं पहले की तरह एमसीडी की टीम आकर उनके चाय के ठिये को उजाड़ न दें. वे बीते 25 वर्षों से चाय बेच रहे हैं ओर इस काम को करने से पहले वे एक बर्तन मांजने वाले, एक मजदूर और घरेलू नौकर के रूप में भी काम कर चुके हैं.

जीवन के इस जद्दोजहद के बावजूद उन्होंने कभी अपने भीतर के लिखने के जुनून को मरने नहीं दिया. वास्तव में उनका जीवन देश के कलाकारों की मार्मिक स्थिति का एक आईना है. राव की गरीबी और गुमनामी की स्थिति की कहानी हमारे देश में अंग्रेजी में लिखने वाले अमीर और नामी-गिरामी लेखकों एवं उनके जैसे हिंदी या अन्य भाषाओं में लिखने वालों के बीच की गहरी खाई को भी रेखांकित करती है तथा लेखन के क्षेत्र में फैली असमानताओं को दुनिया के सामने लाती है.

लक्ष्मण राव को किसी से कोई शिकायत नहीं है. वे एक सच्चे लेखक की तरह ही लोगों को अपनी कृति पढ़ते देखकर खुश हो जाते हैं. पाठकों तक इन किताबों को पहुंचाने की ललक लिए वे साइकिल से दिल्ली के एक छोर से दूसरे पर स्थित शैक्षिक संस्थानों ओर पुस्तकालयों तक का रास्ता नाप देते हैं. उनसे किताबें खरीदने वाले अधिकतर लोगों को शायद ही यह अहसास होता हो कि इन किताबों के लेखक वही हैं.

अपनी किताबों को प्रकाशित करने के लिये लक्ष्मण राव को शायद एक झटके का इंतजार था. जब एक प्रकाशक ने उनकी पुस्तक की पांडुलिपी को देखे बगैर ही खारिज कर दिया और उन्हें अपमानित करते हुए अपने दफ्तर से बाहर निकाल दिया, तो उन्हें धक्का लगा. उन्होंने उसी क्षण अपने दम पर किताब प्रकाशित करने का फैसला कर लिया. एक किताब की 1000 प्रतियों के लिये वे तकरीबन 25 हजार रुपये खर्च करते हैं. वे कहते हैं कि ‘‘एक किताब की बिक्री से जो फायदा कमाता हूँ उसे अगली किताब के प्रकाशन में खर्च कर देता हूँ.’’ लक्ष्मण राव प्रकाशन के काम को लेकर काफी गंभीर हैं और आने वाले वर्षों में अपनी बाकी की 13 किताबों को प्रकाशित करने का पक्का इरादा रखते हैं. साथ ही, आईएसबीएन नंबर प्राप्त करने के अलावा उन्होंने ‘भारतीय साहित्य कला प्रकाशन’ के नाम से एक प्रकाशनगृह भी पंजीकृत करवा रखा है.

प्रकाशकों के अलावा लक्ष्मण राव अपनी लिखी हुई किताबें लेकर साहित्य-समाज के कई कथित ठेकेदारों के दरवाजों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन किसी ने भी इनके काम पर नजर डालने की जहमत नहीं उठाई. अधिकतर इन्हें दुत्कार का ही सामना करना पड़ा. उन लोगों की नजरों में शायद वे कैसे दिखते हैं और क्या पहनते है ही उनके काम को नापने का पैमाना हो. लक्ष्मण ने समाज में स्वीकार्यता पाने की दिशा में स्नातक में दाखिला भी लिया. वे दिन में निमार्णाधीन मकानों में मजदूरी का काम करते और रात में सड़क की रोशनी में पत्राचार से चल रही अपनी स्नातक की पढ़ाई का अध्ययन करते. बहरहाल, विडंबना यह है कि हिंदी में 20 किताबों के लेखक लक्ष्मण राव भारत में हिंदी साहित्य के सबसे बड़े भंडार हिंदी भवन के बाहर सड़क के किनारे चाय बेच रहे हैं. वे एक लगभग अछूत से लेखक हैं और हिंदी भवन का एक विशिष्ट वर्ग के लिये आरक्षित माहौल उन्हें अपनाने को तैयार नहीं है और न ही वे उस माहौल का हिस्सा बनना चाहते हैं.

लक्ष्मण राव किराये के एक कमरे के मकान में अपनी पत्नी रेखा और दो बेटों हितेश और परेश के साथ रहते हैं. यहीं पर वे रात में लिखने का काम करते हैं. राव अपने दोनों बेटों को अधिक से अधिक शिक्षा दिलवाना चाहते हैं. शादी के बाद के प्रारंभिक वर्षों में रेखा अपने पति के लिखने और पढ़ने के जुनून को लेकर काफी उलझन में रहीं, लेकिन इस काम के प्रति उनका समर्पण जल्द ही उनकी समझ में आ गया. वे कहते हैं, ‘‘बहुत से लोगों की नजरों में मैं एक पागल इंसान हूँ. ऐसा समझने वाले अब भी काफी हैं, हालांकि अब उनकी संख्या पहले के मुकाबले कम है.’’ विष्णु दिगंबर मार्ग पर अन्य दुकानदारों और चायवालों की नजरों में अब भी लक्ष्मण को लेकर काफी शंका रहती है. वे कहते हैं, ‘‘मेरे प्रति उनका रवैया बेहद सतर्क और बेचैनी भरा होता है. उन्हें मालूम है कि मैं न तो उनकी तरह एक सामान्य चायवाला हूँ और न ही मैं प्रसिद्धी और भाग्य से धनी लेखक.’’

लक्ष्मण राव का महाराष्ट्र के अमारवती के जिले के एक छोटे से गांव से दिल्ली तक का सफर काफी मुश्किलों भरा रहा. इस बीच मिलों में काम करते रहें, तो कभी भोपाल में 5 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से बेलदार का काम करते रहे. 30 जुलाई 1975 को दिल्ली पहुँचे. यहाँ आकर वे दो वर्ष तक ढ़ाबे पर बर्तन साफ करते रहे. फिर, 1977 में आई.टी.ओ. के निकट विष्णु दिगम्बर मार्ग पर पाकड़ पेड़ के नीचे ही पान, बीड़ी और सिगरेट बेचने लगे. इस बीच दिल्ली नगर निगम अनेक बार इनकी दुकान को उजाड़ती रही, पर हिम्मत के साथ लक्ष्मण राव जी डटे रहे. धीरे-धीरे चाय भी बेचने लगे.

आज हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी सहित अन्य भाषाओं में लक्ष्मण राव के सौ से अधिक साक्षात्कार प्रकाशित हो चुके हैं. वहीं अड़तीस से अधिक साहित्य-सम्मान भी इनको मिल चुके हैं, फिर भी वे बड़े इत्मिनान के साथ चाय बेचकर साहित्य का युद्ध लड़ रहे हैं. इनकी हिम्मत और समर्पण को विदेशी मीडिया ने भी सराहा है और इनका साक्षात्कार प्रकाशित किया है. जिसमें बीबीसी, एएनआई, एएफपी (फ्रांस) ईएफई (स्पेन), एएफपी (पेरिस), टीवीआई (सिंगापूर), न्यू यॉर्क, एशिया वीक (अमेरिका), एशिया वीक (हांग-कांग) सहित अनेक न्युज एजेंसियाँ शामिल हैं.

क्या लक्ष्मण राव की अधिकतर पुस्तकें एक ही व्यक्ति पर आधारित हैं और क्या वे लगभग एक ही संघर्ष के इर्दगिर्द लिखी गई हैं ? जी नहीं.  ये उस वित्तीय संघर्ष को कहीं इंगित नहीं करतीं जिससे लक्ष्मण रोज दो-चार होते हैं. उनके अधिकतर पात्र अमीर हैं और वे विलासिता की सभी वस्तुओं से लैस हैं हालांकि उनका संघर्ष लाक्षणिक है. वे अपने जीवन में प्रेम, कलात्मक योग्यता और महानता जैसी बड़ी चीजों को हासिल करने के लिये संघर्षरत हैं. अंत में वे कहते हैं, ‘‘मेरी लिखी पुस्तकें मेरे जीवन पर आधारित नहीं हैं, लेकिन मुझे लगता है कि मेरी किताबें यथार्थवादी हैं. मैं अपने चारों ओर जो कुछ देखता और पाता हूँ ये उसका एक आईना हैं.’’ 


Leave your comment/अपनी प्रतिक्रिया दे