कमल किशोर गोयनकाःएक बड़े लेखक का प्रतिबिंब

व्यक्तित्व , , मंगलवार , 31-10-2017


Kamal Kishore Goenka Reflection of a Great Writer

पुष्पिता अवस्थी

जब मैं हिंदी के सुधी लेखक कमलकिशोर गोयनका को याद करती हूँ तो मेरे भीतर 2003 का समय प्रतिबिंबित हो उठता है. मुझे सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन की याद हो आती है, जब मैंने सूरीनाम दूतावास में रहते हुए इसके आयोजन की परिकल्पना की थी और दैव योग से यह संभव हुआ. वहीं कमलकिशोर गोयनका जी से मेरी पहली भेंट हुई. पर वह दर्शन ऐसा था जिसमें न वे मुझे देख सके न मैं उन्हें. अंतर्दृष्टि के करघे पर सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन का पट बुनने में हम दोनों लगे हुए थे. साहित्यिक आयोजनों की दांव पेंच में हम दोनों एक दूसरे को सूनते हुए इस साहित्यिक समारोह की वैचारिक संगति को साधने में लगे हुए थे. कुछ माह पूर्व अपने हृदय की शल्य चिकित्सा करवाने के बावजूद वे संपूर्ण उत्साह से सम्मेलन की सफलता के लिए प्राणपण से लगे हुए थे. रात में भी दिन की तरह जुटे रहते थे. अगले दिन के आयोजन एवं संयोजन की तैयारी में. कहीं कोई छूट न जाए, कहीं ऐसा न हो कि कोई अवसर पाने से न रह जाए, कोई आहत न हो जाए. सब को मौका मिलना चाहिए. पहली बार लगा कि विश्व हिंदी सम्मेलन की अपार भीड़ में एक ऐसा शख्स भी है जो इस पूरे आलम को सहेज कर रखना चाहता है. अपनी इसी चिंता के साथ वे पूरे सम्मेलन में सक्रिय रहे. सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया. 

बीते 11 अक्टूबर को गोयनका जी 79 वर्ष के हो चुके हैं. उन्होंने यों तो प्रभूत साहित्य रचा है. आलोचना, समीक्षा, विवेचन हर दिशा में भी उनका काम बहुविध किस्म एवं मानक कोटि का है. किन्तु पूरे जीवन उनके अध्ययन के केंद्र में प्रेमचंद रहे हैं. अब तक पचास से भी ज्यादा किताबें लिख कर प्रेमचंद का कितना सारा अप्राप्य साहित्य उन्होंने खोजा है, हजारों पन्नों का अनुवाद कार्य कराया है तथा 79 की वय में भी वे प्रेमचंद के अन्वेषण में लगे हुए हैं. अध्यापन के शुरुआती दिनों में ही प्रेमचंद के व्यक्तित्व व कृतित्व की परछाईं गोयनका के जीवन में प्रतिबिम्बित होने लगी थी. प्रेमचंद की साहित्यिक विचारधारा ने उन्हें किसी भी राजनीतिक पार्टी का होने से बचा लिया. प्रेमचंद की गांधीवादी विचारधारा ने उन्हें राष्ट्रसेवक के चरित्र की पहचान दी है. उन्होंने किसानों मजदूरों के जीवन का संघर्षपूर्ण आख्यान लिखने वाले प्रेमचंद के अन्वेषण विवेचन में ही जीवन खपा दिया. 

प्रेमचंद ने लिखा है मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है. जमाने के छल प्रपंच और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है. साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है. प्रेमचंद ने प्रभूत कथा साहित्य से समाज को शिक्षित करने का काम किया है. उनके पारखी चितेरे रहे हैं कमल किशोर गोयनका. प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियों रचनाओं की खोज एवं प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ अभिमन्यु अनत, हरिवंश राय बच्चन, यशपाल व हजारी प्रसाद द्विवेदी और कितने ही सुधी साहित्यकारों के कृतित्व पर केंद्रित उनका विवेचन बहुवस्तुस्पर्शी रहा है. उन्होंने कितनी ही पत्रिकाओं को प्रेरित किया कि वे प्रेमचंद पर विशेष सामग्री प्रकाशित करें या उन पर अंक केंद्रित करें. लगभग पचास पत्रिकाओं को उन्होंने प्रेमचंद संबंधी अप्राप्य व विलुप्त सामग्री प्रकाशन के लिए मुहैया करायी अथवा उन पर अंक निकालने में मदद की. दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहते हुए शोधार्थियों को उन्होंने ऐसे ही विशिष्ट विषयों की ओर शोध कार्य में प्रवृत्त किया जो आगे चल कर शोध और अनुसंधान को अग्रणी दिशा दे सकते थे. 

उन्होंने प्रेमचंद के जीवन, विचार तथा साहित्य के शोध पर लगभग 46 वर्षों से निरंतर कार्यरत तथा शोध एवं अध्ययन की नई दिशाओं का उद्घाटन करते हुए प्रेमचंद पर आलोचकों की पुरानी मान्यताओं को खण्डित करके नई मान्यताओं एवं निष्कर्षों का प्रतिपादन किया है तथा प्रेमचंद के हजारों पृष्ठों के लुप्त तथा अज्ञात साहित्य को खोजकर साहित्य-संसार के सम्मुख प्रस्तुत करने का कार्य किया है. यही नहीं, पहली बार प्रेमचंद की कालक्रमानुसार जीवनी लेखन करने का श्रेय भी गोयनका को जाता है. 

प्रेमचंद के बाद जिस लेखक को उन्होंने केंद्र में रखा, उसे स्थापित किया, वे अभिमन्यु अनत हैं. अनत से बातचीत के साथ उनके साहित्य के प्रकाशन, विवेचन और संयोजन का जो कार्य गोयनका ने किया है वह स्तुत्य है. इस के साथ ही प्रवासी साहित्य को स्थापित करने का श्रेय उन्हें जाता है जो गत कई दशकों से हिंदी साहित्य की मुख्य धारा का अंग बनाने में लगे हैं. अनत के माध्यम से भारतवंशियों के जीवन संघर्ष से रूबरू होने का अवसर पूरे हिंदी जगत को मिला है. इसी के साथ उन्होंने विश्व के प्रवासी भारतीय लेखकों के संघर्ष का अवगाहन किया और अभिव्यक्ति मंच प्रदान करने का अवसर सुलभ कराते रहे. 

गोयनका जी के अन्वेषण, शोध एवं विवेचन की पद्धति पुरानी है. कार्ड पद्धति से हर प्रविष्टि को दर्ज करना और उसी वैज्ञानिक पद्धति से सारे संदर्भों को समेटने का काम कोई आसान नहीं है. पर अपनी भीतरी और श्रमसाध्य लगन के बलबूते गोयनका ने इस कार्य को अपने लिए सुकर बना लिया है. तभी अब तक भारतीय हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचंद के साहित्य को लेकर 400 के लगभग शोध लेख उनके प्रकाशित हुए हैं तथा कई गंभीर मसलों पर वे आज भी उसी निष्ठा से कार्यरत हैं. अचरज है कि प्रेमचंद पीठ पर बैठने वाले साहित्यकारों ने प्रेमचंद  पर नगण्य काम किया और गोयनका ने कभी भी किसी प्रेमचंद पीठ पर आसीन न होने के बावजूद वह कार्य संभव किया है जो बड़ी संस्थाएं भी नहीं कर पाती हैं. जो लोग कई खंडों में प्रकाशित मानसरोवर सीरीज में प्रेमचंद की कहानियां पढ़ते रहे हैं उनके नए आठ खंडों पर गोयनका जी का काम चल रहा है. उनके खाते में यशपाल व हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनेक संस्मरण भी हैं जिन पर उनकी स्वंतत्र पुस्तकें ही प्रकाशित हैं. इसके अलावा अनेक सुधी साहित्यकारों की रचनावलियां व रचना समग्र संपादित कर गोयनका जी ने उनके कृतित्व को नए सिरे से प्रकाशित कराने का बीड़ा उठाया है . 

    अस्सीवें वर्ष में प्रवेश करते हुए गोयनका जी में आज भी एक युवकोचित उत्साह है. वे अभी भी तमाम साहित्यिक परियोजनाओं से संबद्ध हैं. प्रवासी साहित्य की दिशा में समय समय पर उनके प्रयत्न यह दर्शाते हैं कि यदि हिंदी को वैश्विक भाषा बनना है तो वह केवल भारतीय हिंदी लेखकों के बलबूते नहीं, विश्व भर के हिंदी लेखकों को साथ लेकर चलने से बनेगी. कहना न होगा कि गोयनका जी की साहित्यिक यात्रा उनकी अपनी अंतश्चेतना की वीथियों से गुजर कर मंजिल तक पहुंची है तथा अभी भी बहुत सारा कार्य शेष है. जिस तरह निराला पर मात्र अपनी तीन खंडों की आलोचना पुस्तक 'निराला की साहित्य साधना' लिख कर रामविलास शर्मा ने पूरे हिंदी जगत में ख्याति पाई है, प्रेमचंद के विभिन्न पहलुओं पर लगभग पचास पुस्तकें रचने वाले गोयनका ने उससे कम ख्याति और प्रतिष्ठा अर्जित नहीं की है. जिस संजीदगी से उन्होंने अपने उत्तर जीवन को इस ओर एकाग्र किया है वह हिंदी जगत में एक मिसाल है. 


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