चल, चला चल...

वे चले जा रहे हैं.... पैदल, साइकिल से, रिक्शा से, ट्रक से... जो भी साधन मिला उससे...नहीं मिला तो पैदल... इनकी यात्रा अविश्वास की उपज है. सत्ता का इकबाल इस कदर कुंद हुआ है कि इन्हें अपने जांगर पर तो भरोसा है लेकिन सत्तासीनों पर नहीं, चाहे वह राज्य सत्ता हो या केंद्रीय सत्ता.

| श्रीराजेश

गंभीर समचार 04 Jun 2020

माना कि आप लॉकडाउन के चौथे चरण का बखूबी पालन कर रहे होंगे. बगैर किसी आवश्यकता के आप बाहर भी नहीं निकल रहे होंगे. यदि निकल भी रहे होंगे तो मास्क, सेनेटाइजर, ग्लब्स और दो गज की दूरी का भी ख्याल रख रहे होंगे. चारदिवारी में कैद जब मन अकुलाहट से भरता होगा तो सुबह-शाम बालकनी में भी आ जाते होंगे. भरी दोपहरी में तो खिड़कियों से तिक्ष्ण धूप और गर्म हवा के थपेड़े आपको मोटे पर्दे दरवाजों-खिड़कियों पर डालने के लिए बाध्य करते होंगे. इन सब परिस्थितियों में आपकी बहुमंजिली अपार्टमेंट्स के सामने से गुजरती सड़क सुनी लगती होगी.... इसमें कोई आश्चर्य नहीं.

आपकी तरह ही उन्हें भी सूर्य की चुभती किरणें उन्हें सड़को से दूर करती है. ऊपर से बरसता आग, सांय-सांय चलती लू और नीचे कोलतार की पिघली सड़क उन्हें कदमताल करने से रोकती है. वे निकलते है, झुंड के झुंड, टूटी हवाई चप्पल उनके तलवे के कवच होते हैं, डर तारी होता है, थकान अभी गई नहीं होती... भूख तो भूख है... वह फिर रात को लगेगी. मौसम की गर्माहट उन्हें पानी-पानी किये जा रहा है, फिर भी प्लास्टिक की बोतल में भरा पानी... उन्हें तर करता है. कंधे और पीठ पर गठरी, एक हाथ में बच्चे की उंगली और दूसरे हाथ में पानी का बोतल... यहीं थाती लिये चल देते है... अगले दिन के सूरज उगने के पहले तक के लिए...

गठरी में होते है कुछ जोड़ी कपड़े, कुछ बिस्कुट के पैकेट, कुछ सूखी हुई रोटियां, कुछ नमकीन... यही तो है उनकी थाती. जेब में पड़ा मोबाइल अचानक घनघना उठता है.. ये हेलो बोलते हैं... उधर से पूछा जाता है.. कहां तक पहुंचे.

ये चले जा रहे हैं. पैदल, तो कोई साइकिल से तो कभी कोई सामान से लदा ट्रक मिल गया तो लद बोरियों पर बोरियों की शक्ल में. सुबह पौ फटने के पहले वे कोई जगह टूढते हैं. खाली सी..विरान सी... कोई स्कूल.. कोई धर्मशाला और कुछ नहीं मिला तो पेड़ की छाया. ठहर जाते हैं... कौन सी जगह है... नहीं पता... जरुरत भी नहीं जानने की. गठरी खोलते है... चादर या फिर प्लास्टिक का तिरपाल नुमा चीज या पुराना अखबार. बिछा देते हैं... और पसर जाते हैं बेसूध. जख्मी पैर पर पुराने कपड़े की पट्टी बांध लेते हैं. फिर कुछ घंटे बाद इधर-उधर देखते हैं... तलाशते हैं कोई लंगर... कोई कैंप, जहां मिल जाये भूख मिटाने के लिए आहार.

गुड़गांव से निकले अपने दो बच्चों पत्नी और छोटे भाई के साथ जगलाल, देवरिया जाने के लिए. अभी वे कानपुर पहुंचे.. उम्मीद में है कि अगले दिन कानपुर पार भी कर जाएंगे. जगलाल बताते हैं... वे बारह साल से गुड़गांव में दिहाड़ी में काम करते हैं. होली में गांव गये थे. बच्चे बड़े हो रहे हैं तो सोचा साथ लिए चले, वहां सरकारी स्कूल में अच्छी पढ़ाई होती है, पढ़-लिख लेंगे. भाई को भी साथ ले लिया कि कुछ कमाएगा तो जिंदगी की गाड़ी आसानी से चलेगी. लेकिन अभी आए सप्ताह दिन भी नहीं हुआ कि लॉकडाउन हो गया. दो-चार दिन दौड़ धूप करने पर ठेकेदार ने पैसे दे दिये. जगलाल परिवार के साथ घर पर ही थे. जिम्मेदार नागरिक की तरह वह भी लॉकडाउन का पालन कर रहे थे. दिन बीत रहे थे. राशन रीत रहा था. और एक दिन चावल-आटा के कंस्टर खाली हो गये. पत्नी ने बताया कि राशन का इंतजाम नहीं हुआ तो रात फाके में ही बीतेगी. दो-दो बच्चों के मासूम चेहरे ने जगलाल को विचलित कर दिया था. उन्होंने सून रखा था कि पास के स्कूल में सरकार मुफ्त में राशन बांट रही है. एक झोला उठाये जगलाल स्कूल की ओर चल दिये. लंबी कतार थी. वह भी लग गये. सुबह 11 बजे से कतार में लगने के बाद शाम साढे छह बजे के आस-पास उन्हें चार किलो आटा, एक किलो चावल, 500 मिली तेल मिला. वह घर आए, लेकिन सब्जी नहीं ला पाए. पैसे नहीं थे. वैसे ही रात नमक रोटी के साथ गुजरी. अब पैसे के बगैर तो काम चल नहीं सकता. पत्नी के कान की सोने की बाली उन्होंने पड़ोसी से औने-पौने दाम में बेच दी. सोचा की इसी पैसे से किराया-भाड़ा लगा कर अपने गांव-घर चले जाएंगे. लेकिन ट्रेन-बस चल नहीं रहा था. सोचा कि यहां रहा तो यह जमा-पूंजी भी खत्म हो जाएगी. सो वह भी शामिल हो गये, उन पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों के साथ, जो हजारों की संख्या में थे. चले जा रहे थे.... चले जा रहे थे... जगलाल भी चल दिये...इस पैसे से रास्ते में खाने-पीने का काम चल जाएगा.

लगभग इसी तरह कथा-व्यथा अन्य प्रवासियों की भी है, लेकिन जगलाल की तरह कई प्रवासी मजदूरों के पास बेचने के लिए ‘कान की बाली’ नहीं है. एक मजदूर ने बताया कि उसने सुना कि सरकार और “कुछ अमीर लोग” गरीबों को पैसा दे रहे हैं. साथ ही, विशेष ट्रेनें लोगों को निशुल्क घर पहुंचा रही हैं. उसने सोचा कि ट्रेन के लिए अपनी बारी आने का इंतजार करे. वह कहता है, “लेकिन इसके फायदे कम, नुकसान ज्यादा हैं.” जैसे रात ‌घिरती है, मानो समय दौड़ने लगता है. कुछ दार्शनिक-से अंदाज में वह कहता है, “हम किसी कारण से जीवित हैं. यह रास्ता खत्म नहीं होता.” ढहती आशा के बीच कुछ दम भरकर, लंबी सांस लेकर वह बाहर निकलता है और फिर मानो जिंदगी की कुछ सार्थकता तलाशने रास्ता नापने चल पड़ता है.

गांव-घर की तरफ उनका यह कूच  मार्च के अंतिम सप्ताह से जारी है. 1 मई को आखिरकार इसके लिए स्पेशल ट्रेन सेवाएं शुरू हुईं. 468 स्पेशल ट्रेनें चलाने और 5,00,000 से ज्यादा प्रवासियों को पहुंचाने के बाद 12 मई को भारतीय रेलवे ने ट्रेनों की तादाद 42 से बढ़ाकर रोज 100 की. बहुत-से प्रवासी अपना रिक्शा, किराए की कार या हड़बड़ी में खरीदी गई सेकंडहैंड बाइक से, तमाम नाकों से बचते-बचाते और चक्करदार रास्तों से घूमते-घुमाते अपने दम पर घर पहुंचे गए. गुड़गांव से एक 13 साल की बच्ची अपने चोटिल पिता को साइकिल पर बैठा कर बिहार के दरभंगा तक का सफर नाप दिया.

तमाम प्रवासी अलबत्ता अब भी आमदनी गंवाने और फंसे होने से जूझ रहे हैं. आप्रवास विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन लगाने के पहले उन्हें आने वाली पाबंदियों का इशारा और आने-जाने के लिए हफ्ते भर का वक्त देना चाहिए था. शुरुआत में ही जब देश में महज 500 पॉजिटिव मामले थे, उन्हें यात्रा करने देने की बजाए हमने करीब 40,000 मामले होने तक इंतजार किया. नीति आयोग के एक सदस्य तो कहते हैं कि प्रवासी मजदूरों के दहशत भरे पलायन को कतई बढ़ावा नहीं देना चाहिए था.

यह राष्ट्रीय चिंता का विषय था. फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई को टीवी पर कोविड को लेकर राष्ट्र के नाम अपने पांचवें संबोधन में प्रवासियों की कूच का कोई जिक्र नहीं किया. इस बेरुखी को भांपकर पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कई ट्वीट करके कहा कि वे अर्थव्यवस्था में सरकार के हाथों झोंका गया एक-एक रुपया गिनेंगे और ‘‘सबसे पहली चीज हम यह देखेंगे कि अपने गृह राज्य की सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा करने के बाद गरीब, भूखे और तहस-नहस प्रवासी मजदूर क्या उम्मीद कर सकते हैं.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 14 मई को प्रवासी मजदूरों के लिए कई सारे राहत उपायों का ऐलान किया. इससे पहले तक प्रवासी मजदूर लॉकडाउन के दौरान मोटे तौर पर सिविल सोसाइटी और एनजीओ के भरोसे थे. केरल, तेलंगाना और दिल्ली सरीखे राज्यों ने अस्थायी राशन कार्ड के आधार पर राशन देकर और सीधे नकद वितरण के जरिए संकट को संभाला. झारखंड, बिहार और ओडिशा ने भी सीधे नकदी पहुंचाई, मगर कुछ सावधानियां भी बरतीं—मसलन, अपने गृहराज्य के किसी बैंक में मजदूर का खाता रजिस्टर होना चाहिए. नतीजतन, तमाम मजदूरों को कोई सहायता न मिली.

इंडिया माइग्रेशन नाउ के संस्थापक वरुण अग्रवाल कहते हैं, ‘‘आंतरिक प्रवासी संकट से खराब तरीके से निबटा जा रहा है. प्रवासी कामगारों और औरतों को उनकी गरिमा से वंचित किया जा रहा है. सरकार बेपरवाह है और उसकी प्रवासन की समझ ही गड़बड़ है. घर वापसी के लिए इतने बड़े पैमाने पर प्रवासन में संक्रमण का जोखिम तो होना ही था. इटली, चीन इसकी मिसाल थे.’’

आर्थिक सर्वे 2016-17 के मुताबिक, भारत का अंतरराज्यीय प्रवासन 2001 से 2011 के बीच, सालाना 4.5 फीसद बढ़कर, उससे पहले के दशक के मुकाबले दोगुना हो गया. सालाना अंतरराज्यीय प्रवासन अब नब्बे लाख प्रवासी आंका जाता है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट ‘माइग्रेशन ऐंड इट्स इंपैक्ट ऑन सिटीज’ के मुताबिक, 2017 में ‘भारत में प्रवासियों की आंतरिक आवाजाही राज्यों की अहम आर्थिक असमानताओं से परिचालित है.’ एक नई पद्धति कोहर्ट आधारित माइग्रेशन मीट्रिक से पता चलता है कि बिहार और उत्तर प्रदेश सरीखे कम संपन्न राज्यों से ज्यादा लोग प्रवास पर बाहर जाते हैं, जबकि दिल्ली, महाराष्ट्र और गोवा सरीखे ज्यादा संपन्न राज्य ज्यादा प्रवासियों को अपने यहां आते देखते हैं.

अंतरराज्यीय प्रवासन श्रमिक कानून 1979 नाकाफी है क्योंकि यह केवल ठेका व्यवस्था में काम करने वाले मजदूरों को मान्यता देता है और खुद अपने से काम के लिए प्रवास पर निकले मजदूरों को छोड़ देता है. असल में इस कानून के मुताबिक केंद्र सरकार के लिए कानूनी तौर पर यह जरूरी था कि वह लॉकडाउन के दौरान इनकी मुफ्त यात्रा का पक्का इंतजाम करती, क्योंकि रोजगारों के खत्म होने के लिए उसे जिम्मेदार कहा जा सकता है.

हाल ही में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात सरकारों ने श्रम कानूनों को व्यापक तौर पर शिथिल करने की घोषणा की. कुछ अन्य सरकारों ने भी श्रम कानूनों में कुछ बदलाव किए हैं. यह हमें सौ साल पीछे ले जाने वाला कदम है. दुनिया के बहुत से मजदूरों ने ये कानून दशकों की लड़ाई लड़कर बनवाए थे. यह संवैधानिक ढांचे पर भी आघात है. कैसे कोई राज्य, केंद्र द्वारा बनाए गए कानून को स्थगित कर सकता है? भारत जैसे देश में ये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जहां 93 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. हमें यह समझना चाहिए कि भारत में मजदूरों की दुर्दशा का बड़ा कारण मौजूदा श्रम या अन्य कानूनों का ठीक से पालन न होना भी है. आज अगर अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार कानून का ठीक से पालन हो रहा होता, तो हर सरकार के पास यह आंकड़ा होता कि उनके राज्य में किस जगह से कितने प्रवासी मजदूर हैं. न्यूनतम मजदूरी की लड़ाई नई नहीं है. इस कानून को खत्म करने का मतलब, बंधुआ मजदूरी है. क्योंकि अब काम का अभाव और भुखमरी का फायदा उठाकर कोई भी न्यूनतम मजदूरी से कम में काम करा सकता है. उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के अनुसार भी, कानूनन न्यूनतम मजदूरी से कम देना बंधुआ मजदूरी है. अगर कोई मजदूर उससे कम में काम करता है तो उसको मजबूरी या बेगार माना जाएगा. उद्योग विवाद अधिनियम पर आघात ठेकेदारी को बढ़ावा देगा और पक्की नौकरी के बजाय दिहाड़ी मजदूरों को लगाने का चलन बढ़ेगा. इससे किसी को भी काम पर लगाने और निकालने में पूंजीपतियों की मर्जी चलेगी. कारखाना अधिनियम को स्थगित करने का मतलब है- कार्यस्थल पर श्रमिकों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाएं जैसे, पीने का पानी, बिजली, शौचालय, खाने की व्यवस्था आदि में कटौती होना या न होना. अब इन सुविधाओं की कोई गारंटी नहीं रहेगी. धरातल पर महिला और पुरुष को समान मजदूरी तो हम आज तक नहीं दिला पाए हैं, लेकिन समान पारिश्रमिक अधिनियम को स्थगित करना महिला श्रमिकों के शोषण को और बढ़ाएगा.

लॉकडाउन के दौरान पहली परेशानी दो वक्त की रोटी की थी. आज भी लाखों परिवार ऐसे हैं जो रोज की कमाई से दो वक्त का खाना पाते हैं. इनके रोजगार बंद हो गए. बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं, जिनके पास कोई सरकारी कागज नहीं है. इसके अलावा बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों के राशनकार्ड उनके गृह राज्य के हैं, जबकि वे दूसरे राज्य या प्रदेश में फंसे हुए हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने अब जाकर ‘एक देश, एक राशनकार्ड’ योजना शुरू की है. जो लोग लंबे समय से प्रवासी हैं उनके पास गृह प्रदेश का भी कोई कागजात नहीं है. ऐसी स्थिति में सिर्फ खाद्य सुरक्षा अधिनियम में जुड़े परिवारों को ही राशन दिया जाना समझ से परे है. आज भी बहुत से जरूरतमंद परिवार खाद्य सुरक्षा सूची में नहीं जुड़ पाए हैं. इसके अलावा जनसंख्या बढ़ने के बावजूद केंद्र सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही राज्यों को आवंटन कर रही है.

दूसरी तरफ अन्न भंडार भरे हुए हैं. नई आवक आने से पहले जगह बनाने के लिए इन्हें खाली करना ही पड़ेगा. इन सबको ध्यान में रखते हुए राशन व्यवस्था को लक्षित करने के बजाय सार्वभौमिक किया जाना चाहिए. इससे उन किसानों को भी मदद मिलेगी जिनकी फसल खरीद के इंतजार में पड़ी है. दुनिया में आज भी सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे और एनीमिया से ग्रस्त महिलाएं भारत में ही हैं. लॉकडाउन के कारण इनकी संख्या और बढ़ने की संभावना है. आंगनवाड़ी की मदद से इन्हें पौष्टिक और संतुलित आहार पहुंचाए जाने की जरूरत है. इसके अलावा सार्वजनिक रसोई भी चलाए जाने की जरूरत है, जहां कोई भी भूखा आ कर बिना कोई कागज दिखाए भोजन कर सके.

केंद्र सरकार को भी महामारी के दौरान व्यापक और रचनात्मक मनरेगा कार्यक्रम चलाना पड़ेगा. मनरेगा में एक परिवार को 100 दिन काम के बजाय जितना काम किसी परिवार में चाहिए उतना देना चाहिए. काम के बदले अनाज देने पर भी सरकार को विचार करना चाहिए. रचनात्मक तरीके से नए कामों की श्रेणी भी जोड़ी जानी चाहिए. सामूहिक तरीके से खेतों की मेड़बंदी करना, अपने खेत और घरों में काम करने के साथ मनरेगा को आवश्यक सेवाओं से जोड़ना चाहिए जिससे पंचायत, कोविड-19 का सामना करने में अपने इलाके के श्रमिकों का सहयोग ले सके. यह सब महामारी प्रबंधन रोजगार गारंटी का हिस्सा होना चाहिए. इसके अलावा इस योजना का विस्तार शहरी क्षेत्रों में भी किया जाना चाहिए. आज भी करोड़ों मजदूर श्रम विभाग की योजनाओं से वंचित हैं. इन्हें जोड़ने के लिए प्रक्रिया का सरलीकरण और जानकारी का प्रसार किया जाना चाहिए. मनरेगा में तो सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से इस प्रक्रिया को ऑटोमेट किया जा सकता है. भारत अभी भी कृषि आधारित देश है. यह एक मौका है जब हमें अपने अन्नदाता को ध्यान में रखते हुए यह सोचना चाहिए कि कैसे कृषि घाटे का सौदा न रहे. हम औद्योगिक उत्पादन के बिना शायद काम चला लें लेकिन अन्न के अभाव में कोई नहीं जी सकता. आज के संकट में भी देश और उत्पादन को बचाने वाले किसान ही हैं, जो महामारी के दौरान भी अपने खेतों में काम करते रहे.  श्रम कानूनों को शिथिल करना इसके विपरीत है. लॉकडाउन के दौरान शासक तंत्र और अमीर वर्ग का सबसे असंवेदनशील चेहरा दिखा. कुछ प्रभावशाली लोग राजनीतिक फायदे के लिए धर्म के आधार पर लोगों को बांटने पर उतारू हैं. यह सब समाज और देश को बहुत नुकसान पहुंचाएगा और हमारा भविष्य खतरे में डालेगा. जन आंदोलनों के आधार पर ही देश और संविधान बना है. आज दोबारा व्यापक जन आंदोलन की जरूरत है, जो हमारे मिले हुए हक और संविधान को बचाए और नई परिस्थिति में सबसे कमजोर और पीड़ित तबके के हकों को बढ़ाए. यदि हमें मिलजुल कर अपने भविष्य को सुधारना है तो हमें न्याय और समानता के आधार पर ही यह रचना करनी पड़ेगी. हमें दोगले मापदंड हटाकर एक-दूसरे के दुख-दर्द और हकों को सम्मान देना पड़ेगा. हर इंसान अपने हक के बारे में सोचता ही है, लेकिन इस समय यदि हम मजदूरों और किसानों की आवाज को ऊपर रखेंगे तो, शायद हम सबका फायदा होगा और इस अंधेरे से देश के लिए ठीक रास्ता निकलेगा.

लेकिन स्थितियां बिल्कुल इसके उलट है. इन प्रवासी मजदूरों के नाम पर सियासत गर्म है. शुरुआत तब हुई जब इन मजदूरों के लिए स्पेशल ट्रेन चलाने की बात हुई. मजदूरों से किराया लिये जाने को लेकर बहस जारी था तभी कांग्रेस की अतंरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रस्ताव दिया कि कांग्रेस मजदूरों का किराया देगी. इसे लेकर राजनीति गर्म होनी शुरू हुई तो फिर प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश सरकार से एक हजार बसे उपलब्ध कराने की अनुमति मांगी ताकि इन प्रवासी मजदूरों के इनके घर तक छोड़ा जा सके. योगी सरकार ने बसों की सूची व अन्य विवरण मांगा तो कांग्रेस द्वारा दिये गये विवरण के अनुसार उनमें से कई नंबर जो आरटीओ से पंजीकृत थे, वे बस के बजाय ऑटोरिक्शा से लेकर स्कूटर तक के निकले. इस पर भाजपा ने कांग्रेस को घेरा और जम कर राजनीति हुई. रही –सही कसर तब पूरी हुई जब गोरखपुर जाने वाली ट्रेन राउलकेला पहुंच गई. इस रेलवे के साथ केंद्र सरकार की भद्द पिटी. कुल मिला कर अब प्रवासी मजदूर राजनीति के मोहरे बन गये. जो राजनीतिज्ञ इनके प्रति संवेदनशीलता दिखाते तो है, लेकिन वगैर किसी संवेदना से राजनीति करने से बाज नहीं आते.

प्रवासियों के हितों की हिफाजत करने के लिए एक सर्वांगीण नीति बनाने में केंद्र और राज्य सरकारों की हद दर्जे की नाकामी भी प्रवासी मजदूरों की मौजूदा दुर्दशा की वजह रही है. राज्यों के बीच व्यवस्थाओं का न होना और नियोक्ताओं तथा श्रमिक ठेकेदारों को अनौपचारिक इंतजाम करने देना इस सरकारी उदासनीता की वजह है. भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था हर साल करोड़ों रुपए के मेहनताने की चोरी की भी गवाह बनती है. ऐसा खासकर निर्माण, स्मॉल मैन्युफैक्चरिंग, हेडलोडिंग और ऐसी दूसरी गतिविधियों में होता है जिनमें रोजगार की कोई औपचारिक शर्तें तय नहीं है.

खास तौर पर राज्य सरकारों और शहरी स्थानीय निकायों ने लॉकडाउन के दौरान बहुत बड़े पैमाने पर हुए श्रमिकों से जुड़े कानूनों के उल्लंघन के मामलों को रोकने का पहले से कोई जतन नहीं किया. आदर्श तो यह होता कि शिकायत निवारण की व्यवस्थाएं वार्ड और ब्लॉक स्तरों पर बनतीं ताकि कामगारों को शुरुआती महीनों के उनके बकाया वेतन और मेहनताने का भुगतान करवाया जाता. ऐसे हालात में लॉकडाउन में ढील देने या हटाए जाने के बाद प्रवासी मजदूरों का जल्दी लौटना अनिश्चित बना हुआ है.

गतिशीलता कभी उनकी ताकत थी, अब कमजोरी है. धन की बुरी तरह जरूरत होते हुए भी वे अब उतनी दूर जाना नहीं चाहेंगे. अपने मूल राज्य के बाहर बेहतर शर्तों पर वे तमाम काम करते रह सकते हैं, जिन्हें वे गंदे, खतरनाक और गैरइज्जतदार मानते हैं, लेकिन महानगरों और शहरों में उनके आगमन में कमी आएगी. बिहार लौटे प्रवासी मजदूरों के हुनर का सर्वे करवा रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें घर पर ही स्थायी रोजगार की बात की है.

आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और राहत कोष (पीएम-केयर्स फंड) ने प्रवासी मजदूरों के लिए 1,000 करोड़ रुपए तय किए हैं और कहा है कि हरेक राज्य को तय रकम का कम से कम 10 फीसद मिलेगा, जबकि अतिरिक्त अनुदान रकम का फैसला राज्य की आबादी (50 फीसद भारांश) और उसमें कोविड-19 के मामलों की संक्चया (40 फीसद भारांश) के आधार पर किया जाना है. विशेषज्ञों का कहना है कि बंटकर यह रकम बहुत कम हो जाएगी.

कोविड के बाद उभरता हुआ फलक क्या होगा? नए प्रवासन नेटवर्क और गलियारे बनेंगे. साथ ही, 'एक राष्ट्र एक राशन कार्ड’ योजना पर जोर देना और इसे जल्द से जल्द अमल में लाना चाहिए. सामाजिक सुरक्षा की पोर्टेबिलिटी को लेकर बहस का समय अब खत्म हुआ; अब इसके लागू होने की जरूरत है. अगर घर लौटते और फंसे हुए प्रवासियों की चिंताओं का हल नहीं निकाला जाता है, तो वे सामान्य हालात कायम होने पर फिर शहरों का रुख करने में हिचकिचाएंगे.

ऐसे में श्रमिकों का संकट पैदा हो सकता है और शहरी अर्थव्यवस्था तथा आर्थिक वृद्धि पर इसके लंबे वक्त के लिए खराब असर पड़ेंगे. अभी तक अदृश्य रहे प्रवासी मजदूर अब जब चर्चाओं के केंद्र में आ गए हैं, संभावना यही है कि उनकी स्वास्थ्य देखभाल, रहने का इंतजाम और उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई उनके कोई भी काम स्वीकार करने की पूर्व शर्तें होंगी. हो सकता है कि उन्हें भेजने और उनका स्वागत करने वाले राज्यों को अपने लोगों की सुरक्षा को लेकर आपसी सहमति पत्र पर दस्तखत करने पड़ें. केंद्र सरकार की भूमिका सीमित है क्योंकि इसमें उसे कोई फायदा नहीं होना है, मगर विशेषज्ञों का कहना है कि वह पहरुए या रखवाले की भूमिका अदा कर सकती है.

प्रवासी कामगार भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल में रहे हैं. ये कामगार उद्योग एवं व्यापार जगत की संपत्ति हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 5.6 करोड़ अंतरराज्यीय प्रवासी हैं, जिनमें से चार करोड़ शहरी क्षेत्रों में रहते हैं और इनमें से 3.4 करोड़ असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों में काम करते हैं. मोटे तौर पर भारत के 79 फीसदी प्रवासी मजदूर कारखानों या निर्माण स्थलों में दैनिक मजदूरी के लिए काम करते हैं. कोरोनावायरस महामारी और उसके बाद हुए लॉकडाउन के कारण उत्पन्न हालात में हजारों प्रवासी मजदूरों को नौकरियों से बाहर कर दिया गया है.

प्रवासी मजदूरों के सामने आजीविका का साधन ज्वलंत समस्या है. राज्य सरकारें मनरेगा के तहत कार्य प्रदान करने की बात कर रही हैं, लेकिन यह कितना हो पाएगा? स्ट्रीट वेंडिंग जैसे क्षेत्र, जिसे शहरों में कभी भी नगर पालिकाओं ने गरीबों की आजीविका का साधन समझ प्रमुखता नहीं दी, अब यह शहरों में वापस लौट रहे प्रवासी मजदूरों के सामने रोजगार के साधन का विकल्प हो सकता है. शहरों के साथ कस्बों पर भी आजीविका का दबाव बनने की पूरी संभावना है. अनौपचारिक अर्थव्यवस्था भी बेपटरी हो रही है. सरकार से मजदूरों का भरोसा उठ गया है. इसका विपरीत प्रभाव आने वाले दिनों में बड़े उद्योगों और निर्माण क्षेत्रों पर भी पड़ेगा. इसकी आंच मजदूर वर्ग से उठकर मध्यम और उच्च वर्ग तक पहुंचेगी. कर्नाटक सरकार शायद इस परिस्थिति को भांप रही है, तभी वह प्रवासी मजदूरों की घर वापसी मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है. लेकिन श्रमिकों के इस तरह के पलायन से न सिर्फ राष्ट्रीय मंदी पर असर पड़ेगा बल्कि यह संक्रमण समाप्त होने के बाद भी परिस्थितियों को सामान्य होने में देरी का एक बड़ा कारण बनेगा.

ऐसे में, जरूरी है कि सरकार स्थायी समाधान की ओर अग्रसर दिखे. सरकार को ऐसी ठोस रणनीति बनानी चाहिए कि आने वाली किसी भी आपदा या संकटकालीन स्थिति से निपटने के लिए राजनीति से परे प्रवासी मजदूरों के जीवन और आजीविका के अधिकार को संरक्षित किया जा सके. सत्ता तंत्र के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह मजदूरों और गरीबों में अपना खोया हुआ विश्वास फिर से अर्जित करे.

 

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