आर्थिक पैकेज में कृषिः सुधार या राजनीति

कोविड19 की वजह से देश की धाराशायी हुई अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन देते हुए देश को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की. ठीक उसके अलगे दिन से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने विस्तार से इस पैकेज की जानकारी दी. इसी क्रम में 15 मई को सीतारमण ने कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए पैकेज की घोषणा करते हुए उन्होंने दो चीजों पर ध्यान फोकस किया.

| संदीप कुमार

गंभीर समचार 04 Jun 2020

कोविड19 की वजह से देश की धाराशायी हुई अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन देते हुए देश को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की. ठीक उसके अलगे दिन से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने विस्तार से इस पैकेज की जानकारी दी. इसी क्रम में 15 मई को सीतारमण ने कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए पैकेज की घोषणा करते हुए उन्होंने दो चीजों पर ध्यान फोकस किया. पहला-  एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड बनाने और दूसरा- एग्रीकल्चर मार्केटिंग रिफार्म्स को लागू करना. लेकिन इन सबके बावजूद अगर प्रत्यक्ष तौर पर देखा जाए तो इस आर्थिक पैकेज में कृषि पैकेज के नाम पर सरकार ने जो घोषणाएं की उसमें किसानों या कृषि को कोई खास वित्तीय राहत नहीं दी गई.

कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के लिए केंद्रीय कानून लाना और आवश्यक वस्तु अधिनियम में बड़े बदलाव की बात कही गई है. यहां यह कहना जरूरी है कि जो लोग समझ रहे हैं कि केंद्रीय कानून एग्रीकल्चर प्रॉड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट को समाप्त कर देगा, उनको अपने फैक्ट चैक कर लेने चाहिये क्योंकि यह राज्यों के अधिकार में है और उसका समाप्त होना लगभग असंभव है. दूसरे, आवश्यक वस्तु अधिनियम एक ऐसा कानून है जिसमें पिछले तीन दशकों से सुधार चल रहे हैं. इसलिए अब इस आगे कैसे बढ़ा जाएगा यह देखना काफी अहम होगा.

पहले बात उन मार्केटिंग सुधारों की जिनको क्रांतिकारी माना जा रहा है. केंद्र सरकार कृषि उत्पादों के अंतरराज्यीय (इंटर स्टेट) और राज्य के भीतर (इंट्रा स्टेट) मार्केटिंग में बदलाव के लिए एक केंद्रीय कानून लाएगी जो किसानों को प्रतिबंधों और व्यापार बाधाओं से मुक्त कर देगी. असल में इस सुधार को लेकर केंद्र सरकार बहुत गंभीर है और उसके चलते पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान कृषि मंत्रालय, गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय में काफी मंथन हुआ. इस मैराथन मंथन के बाद ही नया कानून लाने की बात तय हुई. इसके पहले राज्यों को कहा गया कि वह एपीएमसी कानून में सुधार करें जिसे शुरू में किसी भी राज्य ने नहीं माना. लेकिन शुरुआती हीला-हवाली के बाद भाजपा शासित गुजरात और कर्नाटक ने इसमें सुधार की शुरुआत कर दी. सूत्रों के मुताबिक इसके पीछे काफी हद तक गृह मंत्रालय की भूमिका रही. अब बात करें नए प्रस्तावित कानून की. संविधान के सातवें शेड्यूल के तहत राज्यों के आयटम नंबर 14 के तहत कृषि राज्यों का विषय है, और राज्य के भीतर कृषि विपणन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है. इसलिए केंद्रीय कानून के बावजूद एपीएमसी के बरकरार रहने की पूरी संभावना है क्योंकि राज्य सरकारें और खासतौर से गैर-भाजपा सरकारें इस पर केंद्र के विरोध में आएंगी, यह लगभग तय है. हालांकि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार काफी सोच-समझ कर आगे बढ़ रही है और इस कानून को लेकर लगातार विधि मंत्रालय से राय ली गई. केंद्र सरकार का मानना है कि कृषि जिन्सों की मार्केटिंग राज्यों का अधिकार है लेकिन ट्रेड में वह कानून लागू कर सकती है. अधिकारियों का मानना है कि कनकरंट लिस्ट की एंट्री 22 और 42 इसमें केंद्र के लिए सहायक हो सकती हैं. हालांकि शुरुआती चर्चा में विधि मंत्रालय की राय लिए बिना ही इस पर आगे बढ़ने की बात चली, लेकिन बाद में उसकी राय लेने का फैसला लिया गया. कुछ मुद्दों पर विधि मंत्रालय की राय बहुत स्पष्ट नहीं रही, हालांकि अंतरराज्यीय मार्केटिंग को लेकर केंद्र का अधिकार स्पष्ट है. साथ ही यह देखना होगा कि मार्केटिंग और ट्रेड की कैसे अलग-अलग व्याख्या की जाती है.

एक पक्ष यह भी है कि एपीएमसी का ज्युरिस्डिक्शन (कैचमेंट एरिया) मंडी की सीमा में ही है, इसके बाहर केंद्र का कानून काम कर सकता है. लेकिन एपीएमसी के तहत मंडी का मतलब केवल मंडी यार्ड की चारदीवारी नहीं होती, बल्कि एक भौगोलिक क्षेत्र होता है. इन सब मसलों को देखते हुए मुद्दा काफी पेचीदा है. इसलिए कानून के आने का इंतजार करना चाहिए. लेकिन यह तय है कि जब इस कानून पर बात आगे बढ़ेगी तो यह बड़ा राजनीतिक विवाद का मुद्दा बनेगा. वैसे कृषि जिन्सों के अंतरराज्यीय व्यापार को फ्री करना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. वे भी ‘एक देश, एक बाजार’ के हकदार हैं क्योंकि उनके लिए राज्यों की सीमाएं कई बार अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की तरह बाधाएं बनकर खड़ी हो जाती हैं, जो किसानों के शोषण का कारण बनती हैं.

अब बात दूसरे बड़े सुधार की, जिसमें आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन की बात कही गई है. यह बात सही है कि यह कानून उपलब्धता के संकट के दिनों के लिए बना था और अब ज्यादातर कृषि उत्पादों के मामले में आधिक्य की स्थिति है और उन्हें मांग व बाजार की दरकार है. वैसे इसमें बड़े सुधार एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान शुरू हुए थे और इसके दायरे से दर्जनों उत्पादों को बाहर कर दिया गया था. लेकिन कुछ माह पहले तक इसका उपयोग हुआ क्योंकि केंद्र सरकार महंगाई पर अंकुश के लिए स्टॉक लिमिट इसी कानून के तहत तय करती है. यही नहीं, कुछ माह पहले प्याज के दाम बढ़ जाने पर प्याज का भंडार रखने वाले किसानों और कारोबारियों पर आय कर के छापे भी डाले गए थे. इसके अधिकांश प्रावधानों को समाप्त करने की बात सरकार कह रही है. सरकारी सूत्रों के मुताबिक नरेंद्र मोदी के दूसरी बार सत्ता में आने के समय से ही इस पर मंथन चल रहा था. अब कोविड-19 संकट के समय इस पर फैसला लेने की घड़ी आई तो इसे संयोग ही कहा जा सकता है. वैसे सरकार अगर अपनी घोषणा के तहत कदम उठाती भी है तो यह देखना दिलचस्प होगा कि प्याज, आलू, तिलहन और दालों के मामले में वह इसे जरूरत पड़ने पर दोबारा लागू करने का लालच छोड़ पाती है या नहीं, क्योंकि ये ऐसे उत्पाद हैं जिनकी एक फसल कमजोर होने पर कीमतों में भारी तेजी की आशंका रहती है. ऐसे में महंगाई के लक्षित स्तर को बरकरार रखने के साथ ही राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए इस कानून के प्रावधानों को लागू करने का मोह सरकार आसानी से नहीं छोड़ पाएगी. कृषि क्षेत्र के इन प्रस्तावित सुधारों को 1991 के आर्थिक सुधारों जैसा भी कहा जा रहा है, लेकिन यह तभी संभव है जब इसके सभी प्रावधान सफलतापूर्वक लागू किए जाएं.

अब बात राहत पैकेज की करें, तो सरकार ने 14 मई को कृषि कर्ज से जुड़ी कई घोषणाएं कीं. किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए मिलने वाले सस्ते फसली कर्ज का आकार बढ़ाने और उसके तहत करीब 2.5 करोड़ अतिरिक्त किसानों को लाने की बात है. यानी इसमें ताजा संकट के लिए कोई सीधे वित्तीय राहत नहीं है. उसी तरह 15 मई को घोषित पैकेज में तमाम केंद्रीय योजनाओं (सीएस) और केंद्रीय मदद वाली योजनाओं (सीएसएस) से जुड़े प्रावधानों का ही दोहराव किया या फिर उनका दायरा बढ़ाने की बात कही. यानी निवेश और कर्ज यही दो केंद्रीय बिंदु इस पैकेज में रहे. केंद्र सरकार कुल 160 योजनाएं कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत चलाती है. इसे मंत्रालय के बजटीय दस्तावेजों में देखा जा सकता है, जिन पर एक लाख 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक के खर्च का प्रावधान है. इनमें सबसे अधिक 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान प्रधानमंत्री किसान कल्याण निधि के लिए है. किसानों को सस्ते ब्याज पर मिलने वाले कर्ज की सब्सिडी 21,175 करोड़ रुपये और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए 15,695 करोड़ रुपये का प्रावधान है. जिस प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जरिए हर खेत को पानी मिलने वाला है उसके लिए केवल चार हजार करोड़ रुपये का प्रावधान है. बाकी योजनाओं के लिए 3,700 करोड़ रुपये से लेकर 500 करोड़ रुपये तक के प्रावधान हैं. यहां यह जानकारी इसलिए देना जरूरी है क्योंकि वित्त मंत्री ने पैकेज का आकार बताते हुए इन योजनाओं से जुड़े तमाम आंकड़े गिनाए हैं.

उन्होंने चालू रबी सीजन में गेहूं और दूसरी रबी फसलों की खरीद के जरिये किसानों को मिले 74,300 करोड़ रुपये का जिक्र भी किया. अब फसलें तो हर साल बिकती हैं, इसका कोविड से क्या लेना-देना. इसी तरह पशुपालन और डेयरी, मत्स्य पालन, और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालयों की योजनाओं को इसका हिस्सा बनाया गया जिनमें से अधिकांश कई साल से चल रही हैं और कुछ नये साल के बजट में घोषित की गई थीं. ऐसा लग रहा था जैसे वित्त मंत्री एक बार फिर बजट पेश कर रही हैं. समाचार माध्यमों को भी इन आंकड़ों पर खबर बनाने से पहले कुछ रिसर्च कर लेनी चाहिए थी. मसलन डेयरी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (डीआईडीएफ) दो साल से है और इसका आकार दस हजार करोड़ रुपये है. इसके तहत एनसीडीसी, नाबार्ड और बैंक ऑफ बड़ौदा सहकारी डेयरी यूनियन, फेडरेशन और निजी डेयरी कंपनियों को सस्ता कर्ज देते हैं. इस पर सरकार जो सब्सिडी देती है वह पांच साल में करीब 1,200 करोड़ रुपये ही बैठेगी. इसमें और अधिक कर्ज दिया जाएगा तो सरकार कुछ सौ करोड़ की सब्सिडी और जोड़ देगी, इससे ज्यादा क्या होगा. इस पैकेज को कोविड पैकेज मानने के पहले बजट दस्तावेजों को पढ़ लेना चाहिए, तभी पता लगेगा कि यह नया है या इनक्रीमेंटल प्रावधानों का पैकेज है. हां, कृषि कर्ज के भुगतान के लिए 31 मई तक का समय देना और उस पर किसी तरह की पेनल्टी के बिना सस्ती ब्याज दरों पर भुगतान की छूट ही सबसे बड़ी सीधी राहत है.

यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि भारतीय कृषि पहले से ही आईसीयू में है. इस कोविड19 के दौर में अगर उसे सीधे-सीधे राहत नहीं मिली तो फिर आत्मनिर्भर भारत के कृषि को स्वनिर्भर बनाना संभव नहीं होगा. उपरोक्त दो सुधारों से बात बनने वाली नहीं है. अगर भारतीय कृषि को आथ्मनिर्भर बनाना है तो नए सिरे से वर्तमान हालात के मद्देनजर समूल नई कृषि नीति को प्रतिपादित करना होगा. तभी कृषि और किसानों का उद्धार संभव है.