जगन्नाथ मंदिर के ध्वज में आग का मतलब, क्या अनिष्ट के संकेत हैं?


जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा राज्य के पुरी शहर में स्थित वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख स्थल है. इस मंदिर को हिन्दूओं के चारों धाम में से एक माना जाता है. यह मंदिर वैष्णव परंपराओं तथा संत रामानंद से सम्बन्धित है. इस स्थान को नीलगिरी, नीलांचल और शाकक्षेत्र भी कहा जाता है. पुराणों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने पुरी में अनेक लीलाएं की थीं और नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए थे.

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| विजया लक्ष्मी

गंभीर समचार 04 Jun 2020

धरती का बैकुंठ कहे जाने वाले जगन्नाथ पुरी का हिन्दू धर्म में खास महत्व है. जगन्नाथ पुरी में भगवान श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलराम की पूजा होती है और यहां विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा होती है 

जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा राज्य के पुरी शहर में स्थित वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख स्थल है. इस मंदिर को हिन्दूओं के चारों धाम में से एक माना जाता है. यह मंदिर वैष्णव परंपराओं तथा संत रामानंद से सम्बन्धित है. इस स्थान को नीलगिरी, नीलांचल और शाकक्षेत्र भी कहा जाता है. पुराणों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने पुरी में अनेक लीलाएं की थीं और नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए थे.

जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी कथा 

इस मंदिर के बनने से जुड़ी एक कथा प्रचलित है. कथा के अनुसार भगवान जगन्नाथ की नीलमणि से जुड़ी मूर्ति वृक्ष के नीचे मिली थी. मालवा नरेश को यही मूर्ति सपने में दिखी थी. तब उस राजा ने भगवान विष्णु की तपस्या की. विष्णु जी ने राजा को बताया कि पुरी में समुद्र तट के किनारे लकड़ी मिलेगी उसी से मूर्ति बनवाएं. राजा ने ऐसा ही किया. उन्हें कारीगर के रूप में विश्वकर्मा से मिले. विश्वकर्मा जी ने शर्त रखी थी वह एक महीने में मूर्ति बनाएंगे लेकिन कोई उस कमरे में कोई प्रवेश नहीं करेगा और दरवाजा बंद रहेगा. राजा मान गए और इस तरह मूर्ति का निर्माण शुरू हो गया. ऐसा कहा जाता है कि रोज राजा आते थे और कमरे से मूर्ति बनाने से आवाज सुनते थे. लेकिन महीने के आखिरी कुछ दिनों में उन्होंने कमरे से मूर्ति बनने की आवाज नहीं सुनी तो कमरे का दरवाजा खोल दिया. तब एक वृद्ध कारीगर बाहर आया और उसने कहा कि मूर्तियां अभी पूरी नहीं बनी है बल्कि अधूरी हैं. यह सब भाग्यवश हुआ है. अब ऐसे ही यह मूर्तियां स्थापित होंगी और पूजी जाएंगी. उसके बाद कृष्ण, सुभद्रा और बलभद्र की मूर्तियां स्थापित की गईं.

ओड़िशा में पुरी के भगवान जगन्नाथ मंदिर के ऊपर लगी पताका में एक दिन पहले आग की घटना को लेकर पूरे देश में तरह-तरह की बातें हो रही हैं. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है. कई लोग इसे देश के लिए बड़ा अपशकुन बता रहे हैं. गुरुवार को ही कोरोनावायरस के खतरे के चलते मंदिर में श्रद्धालुओं के आने पर रोक लगाई गई थी, इसके कुछ घंटे के अंदर हुई इस घटना से कोहराम मच गया. हजारों लोग मंदिर के आसपास जमा हो गए. लोग इसे आने वाले बड़े अनिष्ट का संकेत मान रहे हैं. क्योंकि इससे एक दिन पहले ही ध्वज में गांठ भी पड़ गई थी, जो कि आम तौर पर कभी नहीं होता है. इन दोनों बातों का क्या मतलब है जानने के लिए आपको ये पूरी रिपोर्ट पढ़नी होगी.

ध्वज में कैसे लगी आग?

गुरुवार को पापनाशक एकादशी के मौक़े पर श्रीमंदिर के अंवला परिसर में महादीप लगाया गया था. अचानक हवा चलने से ध्वज उड़कर महादीप पर चला आया और देखते ही जल गया. श्रीमंदिर का ध्वज हर दिन शाम 4 से 5 बजे के बीच बदला जाता है. एक सेवायत ऊपर जाकर ध्वज को पूरे विधि-विधान के साथ बदलता है. यह दृश्य देखने को लोगों की भारी भीड़ मौजूद रहती है. सेवायत के हाथ में एक जलता हुआ दीपक भी होता है. श्रीमंदिर चुनरा सेवक निजोग के अध्यक्ष कृष्णचंद्र महापात्रा ने कहा है कि महादीप की लौ इधर उधर जा रही थी, इसी बीच ध्वज और लौ का संपर्क हो जाने से यह घटना हुई है.

मुख्य ध्वज में आग नहीं

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि आग मंदिर के शिखर पर लगे मुख्य ध्वज तक नहीं पहुँच पाई. इस मुख्य ध्वज को स्थानीय बोलचाल में “पतित पावन बाना” कहा जाता है. आग दरअसल उसके नीचे की तरफ़ फहराने वाली पताका में लगी, जिसे “मानसिक बाना” बोला जाता है, ये वो ध्वज होता है जो श्रद्धालुओं की तरफ़ से भेंट किया जाता है. जो वीडियो वायरल हुआ है उसमें भी आप देख सकते हैं कि ऊपर का मुख्य ध्वज पूरी तरह से सुरक्षित है. बहुत सारे लोग इसे राहत की बात मान रहे हैं. नीचे आप इस वीडियो देख सकते हैं:

रहस्यमय है मंदिर का ध्वज

भगवान जगन्नाथ मंदिर की इस पताका से जुड़ी एक रहस्यमय बात यह भी है कि ये हवा के विपरीत दिशा में लहराता है. जिस दिशा में हवा चलती है उसके उलटी दिशा में ये झंडा रहता है. करीब 20 फीट का तिकोने आकार का ये झंडा होता है जिसे बदलने का जिम्मा एक परिवार पर है. झंडे को बदलने के लिए एक पुजारी 45 मंजिला शिखर पर जंजीरों के सहारे चढ़ता है. उससे पहले वह नीचे अग्नि जलाता है और धीरे-धीरे गुंबद तक पहुंच कर पुराने ध्वज को हटाकर नया लगा देता है. चाहे जैसा भी मौसम हो हर शाम ध्वज को बदलने की ये परंपरा 800 सालों से चली आ रही है. कहा जाता है कि अगर झंडा रोज़ ना बदला जाए तो मंदिर 18 सालों के लिए अपने आप बंद हो जाएगा.

सुदर्शन चक्र भी है रहस्यमय

मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र लगा हुआ है जिसे पूरे पुरी शहर में कहीं से भी देखा जा सकता है. इस चक्र की खास बात ये है कि इसे जहां से भी देखो वो आपको अपनी ओर ही दिखाई देगा. दिन के किसी भी समय मंदिर के इस चक्र या शिखर की ज़मीन पर कोई परछाईं नहीं बनती. इतना ही नहीं, जगन्नाथ मंदिर के ऊपर इतना शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र है कि कोई पक्षी वग़ैरह इसके ऊपर से नहीं उड़ते. यहाँ तक कि विमान या ड्रोन भी इसके ठीक ऊपर से नहीं निकल पाते और ख़ुद ब ख़ुद कुछ डिग्री मुड़ जाते हैं.

 

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