भारत-चीनः क्या है सैनिकों के बीच झड़प की वजह?

आखिर इन दिनों लद्दाख और सिक्किम में भारतीय और चीनी सेना के सिपाहियों के बीच इतना तनाव क्यों है? हाल के ही कुछ हफ्तों में दोनों पक्षों के बीच झड़प के कम से कम चार प्रकरण हो चुके हैं, जिनमें पांच मई को लद्दाख में और नौ मई को सिक्किम में दोनों तरफ के सिपाहियों के बीच हाथा-पाई तक हो गई थी.

| डेस्क

गंभीर समचार 04 Jun 2020

आखिर इन दिनों लद्दाख और सिक्किम में भारतीय और चीनी सेना के सिपाहियों के बीच इतना तनाव क्यों है? हाल के ही कुछ हफ्तों में दोनों पक्षों के बीच झड़प के कम से कम चार प्रकरण हो चुके हैं, जिनमें पांच मई को लद्दाख में और नौ मई को सिक्किम में दोनों तरफ के सिपाहियों के बीच हाथा-पाई तक हो गई थी. अब लद्दाख के पांगोंग सो लेक में चीनी सेना ने पैट्रॉल नावों की संख्या बढ़ा दी है.  उत्तरी सिक्किम के नाकु ला और पूर्वी लद्दाख के पांगोंग सो लेक इलाके में दोनों सेनाओं के बीच हाथापाई और पत्थरबाजी हुई थी और दोनों तरफ के वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप करने के बाद मामला शांत हुआ था. मीडिया में आई कुछ खबरों में सेना का बयान आया था कि दोनों प्रकरण स्थानीय थे और इनका ना तो आपस में कोई संबंध था और ना किसी और स्थानीय या वैश्विक घटना से. लेकिन यह बात सही है कि इस तरह के प्रकरण आए दिन होते रहते हैं क्योंकि दोनों देशों के बीच की सीमा विवादित है.

भारत और चीन के बीच की सीमा रेखा को लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल कहा जाता है. माना जाता है कि दोनों देशों की सीमा 4000 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी है और कम से कम भारत के पांच उत्तरी और पूर्वोत्तरी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से हो कर गुजरती है - लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश. एलएसी को 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों देशों ने एक समझौते के तहत माना था लेकिन उसकी असल परिभाषा को लेकर दोनों देशों के बीच आज भी विवाद है.  तो सवाल ये उठता है कि जहां सीमा को लेकर झड़पों और छिट-पुट वारदात का इतना लंबा और गंभीर इतिहास है, ऐसे में पिछले कुछ सप्ताह में होने वाले प्रकरणों को कैसे देखा जाना चाहिए? क्या इन्हें सामान्य घटनाएं कहा जाए या ये किसी और चीज की तरफ इशारा करती हैं. कई जानकारों का मानना है कि इस अवधि में हर साल सीमा पर कुछ ना कुछ होता ही है. ऐसा शायद इसलिए होता हो क्योंकि बर्फ पिघलने की वजह से दोनों सेनाएं अपनी अपनी तरफ से सीमा तक पैट्रॉल करने के लिए ज्यादा बार पहुंचती हैं.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ये हर साल होने वाली झड़पों जैसा ही है और इनमें कुछ नया नहीं है. उनका मानना है कि ये प्रकरण 2013 और 2017 में हुई घटनाओं जैसे बिल्कुल भी नहीं हैं और जब तक दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का अंत नहीं हो जाता ये होते रहेंगे. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कि इन झड़पों के पीछे कोई और ट्रिगर हो इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के असेंबली में ताइवान की भागीदारी.

वैसे तो इस मामले के ज्यादा चर्चा मीडिया में ही है लेकिन फिर भी यह तथ्य अपनी जगह हैं कि भारत अब विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड का अध्यक्ष है और ताइवान को आब्जर्वर से सदस्य का दर्जा देने और कोरोनावायरस की स्त्रोत की तलाश के लिए शुरू की गई जांच, दोनों में भारत की अहम् भूमिका रहेगी. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ये मामला पूरी तरह से समझ में नहीं भी आता है क्योंकि भारत चीन को ये लगातार समझाने की कोशिश कर रहा है कि दोनों देशों के कई क्षेत्रों में साझा हित हैं. 

सीमा पर एक और चिंता का विषय है. चीन की तरफ सीमा के काफी पास तक सड़कें और अच्छी व्यवस्था है जिनसे चीनी सिपाही सीमा तक आसानी से पहुंच सकते हैं. नीलोवा बताती हैं कि भारत ने दशकों तक सीमा तक जाने वाले सड़कें, पुल इत्यादि नहीं बनाए थे, इस डर से कि कहीं उनकी वजह से चीनी सिपाहियों का भारत में और अंदर तक घुस आना आसान ना हो जाए. इस डर को भारत ने हाल ही में खत्म किया है और अब सीमा के इस तरफ भी सड़कें, पुल इत्यादि बनाए जा रहे हैं और कुछ जानकार ये आशंका व्यक्त करते हैं कि संभव है कि ये बात चीन को अखर रही हो.शशांक कहते हैं कि संभव है कि चीन इन झड़पों के जरिये इस निर्माण प्रक्रिया में रुकावटें खड़ी करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन ये सड़कें भारत के लिए बहुत जरूरी है और इन पर काम आगे बढ़ना चाहिए. हाथापाई वाली घटना को छोड़ कर इस साल अभी तक तो कोई और बड़ी घटना नहीं हुई है. लेकिन जब तक दोनों देशों के सीमा विवाद का समाधान नहीं हो जाता तब तक इन झड़पों के चलते रहने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

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