आर्थिक पैकेज में गरीबों-बेरोजगारों को क्या मिला?

सरकार ने राहत पैकेज का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कर्ज, ब्याज पर छूट देने इत्यादि के लिए घोषित किया है, जिसका फायदा बड़े बिजनेस वाले ही अभी उठा रहे हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के वित्तीय पैकेज का विवरण देने के कार्य को पूरा कर लिया है.

| डेस्क

गंभीर समचार 04 Jun 2020

सरकार ने राहत पैकेज का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कर्ज, ब्याज पर छूट देने इत्यादि के लिए घोषित किया है, जिसका फायदा बड़े बिजनेस वाले ही अभी उठा रहे हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के वित्तीय पैकेज का विवरण देने के कार्य को पूरा कर लिया है. सीतारमण ने अपने पिछले पांच प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुल मिलाकर 11.02 लाख करोड़ रुपये की घोषणाएं की. इससे पहले वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के तहत 1.92 लाख करोड़ रुपये और भारतीय रिजर्व बैंक ने 8.01 लाख करोड़ रुपये की घोषणा की थी.  इस तरह कोरोना संकट से उबारने के नाम पर अब तक में केंद्र सरकार ने कुल मिलाकर 20.97 लाख करोड़ रुपये की घोषणा की है, जो कि जीडीपी का करीब-करीब 10 फीसदी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘आत्मनिर्भर भारत पैकेज’ नाम दिया है.

प्रथम दृष्टया ऐसा लग सकता है कि सरकार ने जनता की मदद के लिए बहुत ज्यादा राशि की घोषणा की है. हालांकि हकीकत ये है इस राशि का बहुत कम हिस्सा ही लोगों को सीधा आर्थिक मदद या राशन या प्रत्यक्ष लाभ हस्तातंरण के रूप में दिया जाना है, बाकी का पैसा लोन या कर्ज के रूप में दिया जाएगा.  आर्थिक राहत पैकेज के पांचों भागों का आंकलन करने से पता चलता है कुल 20 लाख करोड़ रुपये का 10 फीसदी से भी कम यानी कि दो लाख करोड़ रुपये से भी कम की राशि लोगों के हाथ में पैसा या राशन देने में खर्च की जानी है. ये राशि जीडीपी का एक फीसदी से भी कम है.

कोरोना महामारी के चलते उत्पन्न हुए इस अप्रत्याशित संकट के समाधान के रूप में कई अर्थाशास्त्री और यहां तक की उद्योगपति भी ये बात कह रहे थे कि ऐसे समय में लोगों के हाथ में पैसे देने की ज्यादा जरूरत है, ताकि वे जब उस पैसे को खर्च करेंगे तो खपत बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने में मदद मिलेगी.

हालांकि वित्त मंत्री की घोषणाओं ने इन सभी को निराश किया होगा क्योंकि लोगों के हाथ में राशि देने का अंश बहुत कम है. इसके अलावा सस्ते दर पर कर्ज देने के लिए जो भी घोषणा हुई है उसका फायदा भी बड़े उद्योगों को मिल रहा है. छोटे उद्योगों को कब से लोन मिलना शुरू होगा और वे कब से अपना काम शुरू कर पाएंगे, अभी तक ये स्पष्ट नहीं है. शुरू में आरबीई ने जो लिक्विडिटी यानी कि कर्ज लेने पर ब्याज से कुछ छूट देने की घोषणा की थी, उसका भी सबसे ज्यादा फायदा बड़े उद्योगों जैसे अंबानी, टाटा, बिरला ने उठाया है.  देश में कुल मिलाकर करीब 50 करोड़ मजदूर हैं और इसमें से करीब 12 करोड़ लोग बेरोजगार हैं और अन्य 20 करोड़ ऐसे लोग हैं जो अपनी नौकरी छोड़कर घर चले गए हैं और उन्हें पता नहीं है कि वे दोबारा कब अपना काम शुरू कर पाएंगे.

इस तरह करीब 32 करोड़ लोग घर बैठे हैं और उन्हें पता नहीं है कि अगले तीन-चार महीने उनका जीवन कैसे चल पाएगा. ऐसे में इन लोगों को तत्काल राहत और हाथ में पैसे देने की आवश्यकता थी. इनके हाथ में पैसा आने पर खपत में बढ़ोतरी होती, जिससे अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में काफी मदद मिलती. हालांकि सरकार ने ऐसा नहीं किया.

आर्थिक पैकेज के विवरणों से ये स्पष्ट है कि सरकार रिलीफ की जगह रिफॉर्म कर रही है. जीडीपी की एक फीसदी से भी कम राशि लोगों की रिलीफ के लिए है और बाकी सारा पैसा रिफॉर्म में खर्च होगा. ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि सरकार विदेश की रेटिंग एजेंसियों और विदेशी निवेशकों को खुश कर सके और इसके बदले में वे भारत की आर्थिक रेटिंग में गिरावट न लाएं.

जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) समर्थित भारतीय मजदूर संघ समेत कई संगठन और विशेषज्ञ देश के अंदर ही इसका विरोध कर रहे हैं. बीएमएस ने कहा है कि  आठ क्षेत्रों कोयला, खनिज, रक्षा उत्पादन, हवाई क्षेत्र प्रबंधन, हवाई अड्डे, विद्युत वितरण, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा पर ध्यान दिया गया है, लेकिन सरकार कह रही है कि निजीकरण को छोड़कर इसका कोई विकल्प नहीं है. यह इस बात का को दर्शाता है कि सरकार संकट के समय में आर्थिक हालत सुधारने के उपाय नहीं सोच पा रही है.’ बिना लोगों से बातचीत ऐसा कदम उठाया जा रहा है. जबकि लोगों से बातचीत लोकतंत्र का आधार है. सरकार ट्रेड यूनियनों, सामाजिक प्रतिनिधियों और हितधारकों से बात करने से कतरा रही है जो उनके अपने आइडिया पर विश्वास की कमी को दिखाता है कि और यह निंदनीय है. कोल के निजीकरण के लिए 5000 करोड़ के आवंटन को संगठन घोर निंदनीय बताता है. बीएमएस का कहना है कि हर बदलाव का असर सबसे पहले कर्मचारियों पर पड़ता है. कर्मचारियों के लिये निजीकरणका मतलब बड़े पैमाने पर संबंधित क्षेत्र में नौकरी का नुकसान, निम्न गुणवत्ता से निम्न नौकरियां, लाभ कमाना और शोषण का ही नियम बन जाना है. संगठन ने कहा कि निगमीकरण और पीपीपी से निजीकरण का रास्ता तैयार होता है, और निजीकरण अंतत: विदेशीकरण के लिये जमीन तैयार करता है. संगठन ने कहा है कि अंतरिक्ष, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और अंतरिक्ष खोज के क्षेत्र में निजीकरण का ‘हमारी सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा. इससे पहले भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने भाजपा शासित राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में श्रम कानूनों को स्थगित करने की निंदा की थी और इसके खिलाफ 20 मई को देशव्यापी विरोध की घोषणा की है.

कुल मिला कर देखें तो इस आर्थिक पैकेज में गरीब, मध्यवर्ग जो नौकरी गंवा चुका है, उसे सीधे तौर पर कुछ भी नहीं मिला है. गरीब कल्याण योजना के तहत गरीबों को जो मदद मिली है, वह भी अपर्याप्त है.

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