नीतीश कुमार का ख्याली पुलाव

एक कहावत बड़ी लोकप्रिय है- देखा-देखी पुण्य और देखा-देखी पाप, यह कहावत आज की तारीख में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर फिट बैठती है. जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना संकट को अवसर में बदलने की बात कहते हैं, उन्हीं के नक्शे कदम पर नीतीश कुमार भी अन्य राज्यों से अपने गृहराज्य लौटे प्रवासी कामगारों को अब एक अवसर मान रहे हैं और ख्वाब देख रहे हैं कि इन कामगारों के दम पर वह निवेशकों को बिहार में निवेश के लिए आकर्षित कर लेंगे.

| डेस्क

गंभीर समचार 04 Jun 2020

एक कहावत बड़ी लोकप्रिय है- देखा-देखी पुण्य और देखा-देखी पाप, यह कहावत आज की तारीख में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर फिट बैठती है. जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना संकट को अवसर में बदलने की बात कहते हैं, उन्हीं के नक्शे कदम पर नीतीश कुमार भी अन्य राज्यों से अपने गृहराज्य लौटे प्रवासी कामगारों को अब एक अवसर मान रहे हैं और ख्वाब देख रहे हैं कि इन कामगारों के दम पर वह निवेशकों को बिहार में निवेश के लिए आकर्षित कर लेंगे.

यह वहीं मुख्यमंत्री है जब आरंभ में ये प्रवासी मजदूर गृहराज्य लौट रहे थे, तो इन्होंने भरसक पूरी कोशिश इन्हें रोकने के लिए की. लेकिन जब कोई चारा नहीं बचा तब इन मजदूरों को ही अब अपनी एसेट बता रहे हैं. क्वारंटिन सेंटर में रह रहे कामगारों की इस समय की स्किल मैपिंग की जा रही है. राज्यभर के क्वारंटीन सेंटरों में सर्वे किया जा रहा है, ताकि यह पता चल सके कि इन कामगारों की क्षमता एवं रुचि क्या है. इसी के अनुरुप उन्हें काम दिलाने की योजना है. उनसे फोन नंबर भी लिया जा रहा है. इन निबंधित कामगारों का डाटा तैयार कर उसे वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा. सरकार की सोच है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि राज्य में किस सेगमेंट में कितने कुशल या अर्द्धकुशल कामगार हैं. राज्य में निवेश के इच्छुक उद्योगपतियों को यह बताना संभव हो सकेगा कि उनके लिए किस तरह के श्रम संसाधन यहां मौजूद हैं. अपने स्तर से सरकार राज्य में उद्योग-धंधे लगाने के लिए निवेशकों से बातचीत भी कर रही है. भारत के श्रम कानून को निवेश प्रोत्साहन में बाधक माना जाता है. इसे देखते हुए आवश्यक संशोधन की भी तैयारी हो रही है. बिहार में फिलहाल 36 श्रम कानून हैं. इनमें कुछ में अस्थाई छूट देने का प्रस्ताव है. विभिन्न योजनाओं में रोजगार के मौकों के साथ ही स्किल्ड लोगों के लिए कौशल विकास, कुटीर उद्योग व स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है.

इस तरह क्रिया कलाप का कई विशेषज्ञ प्रशंसा कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह किसी भी राज्य सरकार के लिए शर्म की बात होनी चाहिए कि उसे अपने राज्य के कामगारों की क्षमता तक नहीं पता है और तो औऱ हद तो यह है कि इस सरकार को यह भी ठीक-ठीक पता नहीं है कि उसके राज्य के कितने कामगार देश या विदेश में काम कर रहे हैं या काम करने गये थे. जिस राज्य सरकार के पास इतनी आधारभूत आंकड़े तक ना हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है. नीतीश कुमार बीते डेढ़ दशक से सूबे की सत्ता में हैं, क्या उन्हें बिहार के श्रम संसाधन के बारे में पता नहीं था, क्या उन्हें इसकी कभी जरुरत नहीं महसूस हुई कि वे अपने सूबे के श्रम संसाधनों की मैपिंग करा कर डेटा तक सुरक्षित रखे. ऐसे में उनसे क्या उम्मीद की जानी चाहिए. सूबे में फिलहाल 36 श्रम कानून है. यह भी कम हास्यास्पद नहीं है कि जो राज्य अपने श्रम संसाधनों को संभालने के बजाय दूसरे राज्यों में जाने के लिए बाध्य करता हो, वहां इतने सारे श्रम कानून. राज्य सरकार इन श्रम संसाधनों के बूते राज्य में निवेश लाना का दंभ भर रही है. सवाल उठता है कि नीतीश कुमार पिछले डेढ़ दशक से इस दिशा में क्या कर रहे थे. चलिए मान लेते हैं वर्तमान संकट को वे एक अवसर मान रहे हैं लेकिन क्या सिर्फ श्रम संसाधन के दम पर कोई निवेशक बिहार में उद्योग लगाएगा. निवेश के लिए यह सामान्य सी बात है कि निवेशक कानून-व्यवस्था की स्थिति, बिजली सहित अन्य आधारभूत संरचना की स्थिति का आकलन करने के पश्चात ही निवेश के लिए मन बनाता है. क्या नीतीश कुमार ने निवेश के अनुकूल सूबे को तैयार किया है. फिर एक बार मान लेते हैं कि चलिए जब जगे तभी सवेरा. जब वर्तमान संकट के दौर में चीन से कई कंपनियां अपना कारोबार समेट अन्य देशों में जाने की तैयारी कर रही है, तो भारत में उत्तर प्रदेश औऱ गुजरात जैसे राज्यों ने लैंडबैंक बना कर तथा श्रम कानूनों को सरल कर तथा अन्य नीतीगत सुधार कर निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उन्हें प्रस्ताव दिया. कई वैश्विक कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों से लगातार वार्ता कर रहे हैं. लेकिन बिहार की ओर से ऐसा कोई प्रयास किया जा रहा है. अब तक कोई संकेत नहीं मिला. तो क्या नीतीश कुमार प्रवासी मजदूरों पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का जुगाड़ लगा रहे हैं या फिर ख्याली पुलाव बना रहे हैं?

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