खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

सन् 1857 का समय था. अंग्रेज अपना आधिपत्य देशभर में जमाने को आतुर थे. उन्होंने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की भी पेशवाई खत्म कर दी थी और उन पर अनेकानेक मनमानी शर्तें लगा दी थीं। रानी ने साठ हजार रुपए खर्च कर इंग्लैण्ड के बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत किया लेकिन न्याय नहीं मिला. इतना ही नहीं सर ह्यूज रोज विशाल सेना लेकर 22 मार्च 1858 को झांसी के निकट आ पहुंचा. चन्देरी पर कब्जा करके वह झांसी की ओर आक्रमण करने के लिए बढ़ा.

| डॉ विभा खरे

गंभीर समचार 16 May 2020

सन् 1857 का समय था. अंग्रेज अपना आधिपत्य देशभर में जमाने को आतुर थे. उन्होंने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की भी पेशवाई खत्म कर दी थी और उन पर अनेकानेक मनमानी शर्तें लगा दी थीं। रानी ने साठ हजार रुपए खर्च कर इंग्लैण्ड के बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत किया लेकिन न्याय नहीं मिला. इतना ही नहीं सर ह्यूज रोज विशाल सेना लेकर 22 मार्च 1858 को झांसी के निकट आ पहुंचा. चन्देरी पर कब्जा करके वह झांसी की ओर आक्रमण करने के लिए बढ़ा.

दूर तक थी ‘कड़क बिजली’, ‘घन गर्जन’ तथा ‘भवानी शंकर’ की मार

          अंग्रेजी सेना के आने से पूर्व ही रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी के चारों ओर दूर-दूर तक के सारे इलाके  को जन-शून्य कर दिया था ताकि अंग्रेजों को रसद नहीं मिल सके. आक्रमण से पूर्व लक्ष्मीबाई ने स्वयं विप्लवकारियों के विरुद्ध कमान संभाल ली तथा किले की दीवारों पर तोपें चढ़वा दीं. किले में कुल पन्द्रह तोपें थीं जिनमें ‘कड़क बिजली’, ‘घन गर्जन’ तथा ‘भवानी शंकर’ की मार दूर तक थी. पच्चीस मार्च को दोनों पक्षों ने गोलाबारी प्रारम्भ कर दी. छब्बीस मार्च की दोपहर को अंग्रेज सेना ने नगर के दक्षिणी फाटक पर इतनी ज्यादा गोलाबारी की कि वहां रुकना मुश्किल हो गया. इसके जवाब में पश्चिम फाटक के तोपची ने अपनी गोलाबारी से अंग्रेजों के सबसे अच्छे तोपची को उड़ा दिया. रानी ने उस तोपची को सोने का कड़ा इनाम में दिया. गोलाबारी के सातवें दिन अंग्रेज सेना ने नगर के बाईं ओर की दीवार का कुछ भाग गिरा दिया किन्तु रक्षकों ने रात्रि में कम्बल ओढ़कर उसकी मरम्मत कर दी. रानी रात्रि भर जागकर चारों ओर व्यवस्था स्वयं करतीं.

शेरों की भांति लड़े रानी लक्ष्मीबाई के सैनिक

 31 मार्च को झांसी की सहायतार्थ तात्या टोपो बीस हजार सैनिकों के साथ पहुंच गए. सर ह्यूज रोज ने झांसी का घेरा उठाने के बजाय आधी फौज से उसका सामना किया. यदि तात्या डटकर सामना करते तो उनकी विजय निश्चित थी और अंग्रेजी सेना दो पाटों के बीच में फंस जाती किन्तु तात्या टोपे अधीर होकर मैदान छोड़ बैठे. अंग्रेजों को उसकी तोपें तथा युद्ध सामग्री और मिल गई. तात्या के आकर चले जाने से रानी की स्थिति अत्यधिक नाजुक हो गई किन्तु रानी तथा उसके साथियों का मनोबल नहीं गिरा. सर ह्यूज रोज ने स्वयं लिखा है ‘रानी लक्ष्मीबाई के साथ झांसी की सैकड़ों स्त्रियां तोपखानों तथा शस्त्रागारों में आती-जाती तथा काम कर रही थीं.’

मैं अपनी झाँसी कभी नहीं दूँगी

तीन अप्रेल को अंग्रेज सेना ने किले पर चारों ओर से हमला किया. रानी घोड़े पर सवार होकर सिपाहियों, सेनानायकों व अन्य अधिकारियों के हौंसले बढ़ाती हुई, उनमें इनाम, जेवर बांटती हुई बिजली की तेजी से चारों ओर तेजी से आ-जा रही थीं. अंग्रेजों ने किले पर चढ़ने के लिए उत्तरी दीवार पर सीढ़ियां लगाईं किन्तु उन पर चढ़ने वाले काट दिए गए इसके बाद किसी विश्वासघाती ने दक्षिणी दरवाजे को खोलकर शत्रु सेना को किले में घुस आने दिया. इसी समय सदर दरवाजे की रक्षार्थ तैनात  तोपची गुलाम गौस खां तथा खुदाबक्श मारे गए. अब किले के कमरे-कमरे में तलवारों से युद्ध प्रारम्भ हो गया. रानी के सैनिक शेरों की भांति लड़े. महल पर कब्जा हो जाने के दो घण्टे बाद तक युद्ध चलाता रहा. झांसी वालों ने भागकर जान बचाने की नहीं सोची. विजेताओं ने चारों ओर लूट मचानी शुरू कर दी. रानी ने अपने सैनिकों से कहा - ‘‘आप भागकर जान बचा लें. मैं गोला बारूद के ढेर पर बैठकर आग लगा लूंगी, मगर झांसी छोड़कर नहीं जाऊंगी.’’

दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर रानी झांसी गई कालपी

          रानी के साथियों ने उसको समझाया कि स्वाधीनता युद्ध चालू रखने के लिए उनका जीवित रहना आवश्यक है. रात्रि के अंधकार में अपने दत्तक पुत्र दामोदर को पीठ पर बांधकर रानी मर्दाने वेष में कुछ अफगान सैनिकों के साथ घोड़े पर कालपी की ओर चलीं लेकिन शत्रु सेना ने पीछा किया. रानी के कुछ सैनिकों ने उनका रास्ता रोका ताकि वह जा पाएं. रानी तेजी से गईं और कालपी जाकर ही रुकीं.

राव साहब को स्वीकार नहीं था रानी लक्ष्मीबाई का नेतृत्व

          उस समय नाना साहब का भतीजा राव साहब कालपी में था. कालपी का किला मजबूत था. युद्ध सामग्री तथा सेना भी पर्याप्त थी, किन्तु योग्य नेतृत्व न था. रानी के कालपी पहुंचने पर सबको आशा हो गई थी. रानी संगठन मोर्चा बंदी तथा व्यवस्था का महत्व समझती थीं, किन्तु राव साहब एक नारी का नेतृत्व स्वीकार करने को तत्पर नहीं थे. रानी कालपी में अंग्रेजों का सामना करने के पक्ष में थीं लेकिन राव साहब तथा तात्या के निर्णय के अनुसार कालपी से बढ़कर कांच में अंग्रेजों से लड़ा गया और उन्हें पराजित होकर वापस कालपी भागना पड़ा. 23 मार्च को अनेक युद्धों विद्रोहियों को कालपी भी छोड़ना पड़ा.

ग्वालियर के राजा सिंधिया ने दिया लक्ष्मीबाई को धोखा

          कालपी से पलायन के बाद राव ने ग्वालियर की ओर कूच किया. राव साहब तथा विद्रोहियों का मत था कि सिंधिया उनका स्वागत करेगा किन्तु उसने उन पर आक्रमण कर दिया. जब रानी तथा राव साहब की सेना ने सामना किया तब सिंधिया के अधिकांश सैनिक अपने मालिक को छोड़कर उनके साथ हो गए. सिंधिया आगरा की ओर चले गए. इस प्रकार बिना रक्तपात के विद्रोहियों का ग्वालियर पर एक जून को अधिकार हो गया. नगर में किसी भी प्रकार की लूटमार नहीं की गई. जो अधिकारी भागे नहीं थे उनको पुराने पदों पर रखा गया. सिंधिया के खजाने में से 19 लाख रुपया निकाला गया. उसके सैनिकों को वेतन तथा इनाम के रूप में नौ लाख राव साहब की सेना को साढ़े सात लाख, नवाब बांटा को साठ हजार तथा रानी लक्ष्मीबाई को बीस हजार रुपये दिए गए. राव साहब ने 15 हजार स्वर्ण मुद्राएं स्वयं रख लीं.

राव साहब ने गद्दी पर बैठते ही आरम्भ कर दिए विजयोत्सव मनाने

          ग्वालियर पर विद्रोहियों के अधिकार से अंग्रेज अत्यधिक चकित हुए. उन्होंने इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी. अब यदि विद्रोही ग्वालियर से रुपये लेकर दक्षिण की ओर तुरंत निकल जाते तो अंग्रेज सेना उनको इतनी शीघ्रता के परास्त नहीं कर पाती क्योंकि दक्षिण पेशवाओं की मातृभूमि थी तथा नर्मदा पार करते ही दर्जनों छोटे-बड़े राजा अधिकरी तथा साधारण जनता उनके साथ हो लेती किन्तु राव साहब ने तो ग्वालियर की गद्दी पर बैठते ही विजयोत्सव मनाने आरम्भ कर दिए. रानी वरिष्ठ सरदारों के इन कार्यकलापों से परेशान थी. वह जानती थी कि सेनापति रोज ने गत छह माह में नर्मदा से यमुना तक का प्रदेश पुनः जीत लिया हे. वह शीघ्र ही हमला करेगा और ग्वालियर हाथ से निकल जाने पर विद्रोहियों के पैर सदैव के लिए उखड़ जाएंगे.

घोड़े पर सवार रानी लक्ष्मीबाई पूरे रणक्षेत्र पर छाई रहीं

          ह्यूज रोज विलम्ब के नुकसान को जानता था. अतः उसने छः जून को कालपी से कूच कर दिया तथा सोलह जून को ग्वालियर के पास पांच मील दूर मुरार पहुंचा. वहां विद्रोहियों की सेना ने तात्या टोपे के सेनापतित्व में उसका सामना किया. विद्रोही सेना के पांव उखड़ गए. राव साहब घबरा गए। रानी लक्ष्मीबाई ने फिर एक बार सेना में नए जीवन का संचार किया. उन्होंने सेना की व्यूह रचना की तथा ग्वालियर नगर के पूर्व फाटक की रक्षा का भार संभाल लिया. 17 जून, 1858 को एक दूसरी फौज जनरल स्मिथ की कमान में ग्वालियर के पूर्व में कोटा की सराय पहुंच गई. पड़ाव डालने से पूर्व ही पहाड़ियों के सहारे रानी ने तोपें लगवा दीं. शत्रु सेना को आक्रमण के लिए कटिबद्ध देखकर स्मिथ घबराया. उसकी सेना तथा शत्रु सेना की दूरी केवल 1500 गज थी. जैसे ही स्मिथ की सेनाएं आगे बढ़ीं विद्रोही सेना की तोपों ने आग उगलनी शुरू कर दी. स्मिथ को रुकना पड़ा. उसने घुड़सवार तथा पैदल सैनिकों को आगे बढ़ाया किन्तु रानी के नेतृत्व में विद्रोही सैनिकों ने इतनी भयंकर मार-काट मचाई कि अंग्रेज सेना को 17 जून, 1858 को पीछे हटना पड़ा. मर्दानी पोशाक में घोड़े पर सवार रानी पूरे रणक्षेत्र पर छाई रहीं तथा बीसियों शत्रु सैनिकों को उसने अपनी तलवार के वार से यमलोक पहुंचा दिया. उनकी प्रिय सहेलियां काशी तथा मन्दरा उनके साथ थीं.

 झाँसी की रानी के मुंह में घोड़ी की रास व दोनों हाथों में तलवारें थीं

          18 जून, 1858 का दिन था. उस दिन पूर्वी मोर्चे पर जनरल स्मिथ की सहायता सर ह्यूज रोज ने भी की. प्रातः वह रणक्षेत्र में अपनी सहेलियों के साथ थीं. उस समय आस-पास लगभग पांच सौ सैनिक थे. इतने में उन्हें आक्रमण की सूचना मिली.

          वह घोड़े पर चढ़ शत्रु सैनिकों की ओर लपकीं. उनके मुंह में घोड़ी की रास तथा दोनों हाथों में तलवारें थीं. उनके एक ओर काशी तथा दूसरी ओर मन्दरा तलवारें चला रही थीं. रानी की सेना कई भागों में शत्रु सेना से बिंध गईं. उसके सैनिकों की संख्या निरन्तर कम होती जा रही थी. वह शत्रु सेना को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी. उनके सैनिक भी उनकी वीरता तथा निडरता से प्रभावित होकर शत्रुओं का संहार करने लगे. शत्रु सैनिक आधुनिकतम हथियारों से सुसज्जित थे तथा युद्ध विद्या में प्रशिक्षित थे जबकि रानी के सैनिकों में अधिकांश के पास पुराने हथियार थे. उनमें पेशेवर योद्धा कम तथा मातृभूमि के लिए जीवन की आहूति देने के इच्छुक व्यक्ति अधिक थे.

वीर योद्धा थीं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

          ऐसे में तेईस वर्षीय रानी कब तक सर ह्यूज रोज जैसे तपे हुए सेनापति से मुकाबला करती जो कि गत चालीस वर्षों में मिश्र से मुरार तक सैकड़ों युद्ध लड़ चुका था. व्यक्तिगत वीरता व साहस में रानी की कोई बराबरी नहीं कर सकता था किन्तु उसके सैनिक तथा साथी अनुभवहीन थे. कई घण्टों तक भयंकर मार-काट हुई. अंत में रानी के सैनिकों के पैर उखड़ गए. शत्रु सैनिकों ने उनको चारों ओर से घेरना प्रारम्भ कर दिया. उनके पास 15-20 घुड़सवार तथा दोनों सहेलियां ही रह गईं. उन्होंने घोड़े को सरपट दौड़ाया तथा शत्रु सेना को चीर कर अपनी सेना के मुख्य भाग की ओर दौड़ीं. शत्रु सैनिक उनके पीछे लपके किन्तु वह तलवार से रास्ता बनाती हुई बढ़ती ही गईं. अचानक एक गोली उनकी सहेली मन्दरा के लगी तथा वह उसी समय मर गई. रानी ने तलवार के एक वार से उस अंग्रेज को खत्म कर दिया जिसने मन्दरा को मारा था. रानी फिर आगे बढ़ीं. सामने एक नाला था. रानी ने घोड़े को ऐड़ देकर नाला कुदाना चाहा किन्तु घोड़ा ठिठक गया. पिछले युद्ध में उनके कई घोड़े मर चुके थे, अतः यह घोड़ा नया था. नाले पर उसने छलांग नहीं लगाई. यदि वह नाला कूद जाता तो रानी अंग्रेजों के हाथ किसी भी प्रकार नहीं आतीं लेकिन घोड़े के रुकते ही शत्रु सैनिकों ने उन्हें घेर लिया. रानी की टांग में एक गोली लगी. फिर भी वह अकेली ही तलवार से शत्रुओं से लड़ती रहीं. इतने में ही एक शत्रु सैनिक ने पीछे से उसके सिर पर तलवार का वार किया जिससे उसके मस्तिष्क का दायां भाग अलग हो गया. रानी मुड़ीं और तलवार चलताी रहीं. दूसरा वार उनके सीने में लगा. अचेत होकर गिरने से पूर्व उन्होंने आक्रमणकर्ता का हाथ काट दिया. फिर वह गिर पड़ीं. ऐसे गिरीं कि सर ह्यूज रोज जैसे सेनापति ने उन्हें शत्रु पक्ष की सबसे योग्य तथा वीर योद्धा माना.

नारी-शौर्य का प्रतीक थीं रानी लक्ष्मीबाई

          रानी का विश्वासपात्र सेवक रामचन्द्र राव देशमुख उनके पास था. वह उनको पास ही स्थित बाबा गंगादास की कुटिया में ले गया. बाबा ने रानी को शीतल जल पिलाया तथा कुटिया में लिटा दिया. कुछ ही क्षणों में रानी के प्राण पखेरु उड़ गए. उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार रामचन्द्र राव ने घास की एक छोटी-सी चिता बनाई तथा रानी के पार्थिव शरीर का दाह संस्कार कर दिया. जब शत्रु सैनिक रानी की तलाश में वहां पहुंचे तब उनके हाथ कुछ न लग पाया, वहां तो कुछ अस्थियां तथा तपिश मात्र शेष थी. मन ही मन नारी-शौर्य की प्रतीक रानी लक्ष्मीबाई के प्रति श्र;ावनत होते हुए वे शत्रु सैनिक वहां से खाली हाथ लौट आए थे. आज भी नारी-शौर्य का प्रसंग चलते ही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम अनायास ही सामने आ जाता है.