माहे-रमजान में मुश्किलें तो हैं, मगर...

इस्लामी मान्यता के अनुसार माहे-रमजान सबसे पाक महीना है, जिसमें इबादतों का पुण्यलाभ मिलता है. लेकिन यह ऐसे वक्त में पड़ा है, जब पूरी दुनिया कोरोना संक्रमण के दौर में सामाजिक दूरी की पाबंदियों को झेलने के लिए मजबूर हैं. ऐसे में हज पहले ही कोरोना से प्रभावित हो चुका है. तो वहीं मस्जिदों में प्रवेश निषेध है.

| जावेद रब्बानी

गंभीर समचार 16 May 2020

इस्लामी मान्यता के अनुसार माहे-रमजान सबसे पाक महीना है, जिसमें इबादतों का पुण्यलाभ मिलता है. लेकिन यह ऐसे वक्त में पड़ा है, जब पूरी दुनिया कोरोना संक्रमण के दौर में सामाजिक दूरी की पाबंदियों को झेलने के लिए मजबूर हैं. ऐसे में हज पहले ही कोरोना से प्रभावित हो चुका है. तो वहीं मस्जिदों में प्रवेश निषेध है.

जाहिर है कोरोना महामारी के इस संकटकाल में हम मस्जिदों की रौनकों से महरूम है लेकिन इसे दूसरी तरह से देखा जाए तो लॉकडाउन कई मायनों में हमारे लिए फायदेमंद साबित होने जा रहा है. घर-दफ्तर समेत दुनिया के झमेलों में व्यस्त रहने और समय की किल्लत का शिकवा करने वाले लोगों को आज लॉकडाउन के कारण जितना वक्त मिल रहा है, उतना शायद ही कभी नसीब हुआ हो. ऐसे में अल्लाह से जुड़ने, उसको राजी करने, अपने गुनाहों की माफी मांगने और रमजान की बरकतें हासिल करने का शायद ही इससे बेहतर मौका कभी नसीब हो. कहते हैं इस बरकत वाले महीने में बंदे के जरिए मांगी जाने वाली दुआ अर्श को भी हिला देती है. क्या पता अल्लाह हम में से किसकी दुआ सुन ले और दुनिया को इस महामारी के अजाब से निजात दिला दे.

इसमें कोई दो राय नहीं कि माहे-रमजान में मुसलमान अधिक से अधिक नेक काम करने के लिए उत्साहित रहता है. वह अपनी इच्छाओं को मार कर अपने रब को राजी करने के लिए दिन भर भूखा और प्यासा रहता है. गलत कामों से बचता है. कुरान की तिलावत (पाठ) करता है. सामूहिक तौर पर तरावीह  पढ़ता है. एक तरह से देखा जाए तो रमजान का पूरा महीना अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का ही नाम है. ऐसे में यह लॉकडाउन हमें इफ्तार और सेहरी के समय खाने-पीने की बेहतरीन चीजों के रूप में हासिल होने वाली कई नेमतों से भी बचने का इम्तिहान लेगा. इसको देखते हुए हमें इच्छाओं को मार कर बाजारों में भीड़-भाड़ लगाने से बचना होगा क्योंकि इससे एक तो लॉकडाउन की शर्तों का उल्लंघन होगा और दूसरे बाहरी सामान लाकर खाना-पीना एक तरह से कोरोना संक्रमण को अपने घरों में दावत देने जैसा है.

फिर रमजान के महीने में मुसलमान अपने दस्तरख्वान को बहुत बड़ा करता है और अपने साथ-साथ दोस्त व रिश्ते-नातेदारों को इफ्तार की दावतें देता है. इस बार सोशल डिस्टैंसिंग के नाते हमें इनसे परहेज करना है. बहुत से लोगों ने लॉकडाउन के कारण गरीबों की मदद करने के लिए इस बार रमजान से पहले ही जकात निकाल दी है. ऐसे में उनके पास हो सकता है कि गरीबों की मदद के लिए जकात की रकम उतनी न बची हो. इसके बावजूद इफ्तार जैसे खर्च को बचाकर उनकी मदद को जारी रखना भी ज्यादा पुण्य का काम होगा. हमें ध्यान रखना चाहिए कि इस अवसर पर इन बातों पर अमल न करना और धर्म-कर्म के नाम पर बीमारी फैलाने का माध्यम बनना न केवल शरीअत के उद्देश्यों के विपरीत है, बल्कि दीन की बदनामी का माध्यम भी बना सकता है.

 

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