बीटीसी चुनाव को लेकर दबाव की राजनीति

असम के बोडोलैंड क्षेत्र में बोड़ो टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के चुनाव की अधिसूचना जारी किये जाने के बावजूद लॉकडाउन की वजह से रद्द करने की घोषणा करनी पड़ी थी. हालांकि दूसरे लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही बीटीसी चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों ने बयानबाजी शुरू कर दी थी.

| अनिरुद्ध प्रसाद

गंभीर समचार 16 May 2020

बीते 27 अप्रैल को असम के बोडोलैंड क्षेत्र में बोड़ो टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) का कार्यकाल समाप्त हो गया. भाजपा के घटक दल बोड़ो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के हाथों में शुरू से ही बीटीसी का प्रशासन था. इसके नेता तथा बीटीसी के मुख्य कार्यकारी सदस्य हग्रामा महिलारी तबतक कांग्रेस के साथ गठबंधन में थे, जबतक राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. लेकिन, भाजपा का पलड़ा भारी देखते ही उन्होंने अपना पाला भी बदल लिया था और वे भाजपा के साथ हो लिए थे. कलतक तरुण गोगोई की शान में कसीदे गढ़ने वाले हग्रामा अब सर्वानंद सोनोवाल की तारीफ करते देखे जा रहे थे.

यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था, लेकिन मामला तब बिगड़ गया जब बीपीएफ ने राज्य की भाजपा सरकार पर इस बात के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया कि कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद उन्हें एक्सटेंशन दिया जाना चाहिए और बीटीसी का प्रशासन राज्यपाल के हाथों में नहीं सौंपना चाहिए. लेकिन क्षेत्र के अन्य दल एवं संगठन इसका विरोध कर रहे थे. ये सभी बीटीसी का प्रशासन राज्यपाल के हाथों में देने की मांग कर रहे थे. मामला तब और अधिक गंभीर हो गया जब 27 अप्रैल को सर्वानंद मंत्रिमंडल की बैठक में बीपीएफ नेता तथा राज्य की समाज कल्याण मंत्री प्रमीला रानी ब्रह्म ने सरकार के सामने दो शर्तें रख दी. या तो बीपीएफ को बीटीसी में एक्सटेंशन देकर बने रहने दिया जाये या फिर लॉकडाउन के बावजूद वहां चुनाव करवाए जाएं. आखिरकार मंत्रिमंडल ने वहां चुनाव करवाने की घोषणा मंत्रिमंडल की बैठक समाप्त होते ही औपचारिक रूप से कर डाली. लेकिन, बीपीएफ की इस प्रकार की दबाव की राजनीति भाजपा को रास नहीं आयी और इस घोषणा के दो घंटे के अंदर ही बीटीसी में राज्यपाल शासन लगाने की घोषणा कर दी गई. बीपीएफ इसको बर्दाश्त नहीं कर सकी और उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की धमकी दे डाली. लेकिन, पार्टी ने भाजपा के साथ अपना गठबंधन तोड़ने की घोषणा नहीं की. क्योंकि, इससे भाजपा सरकार की सेहत पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था. बल्कि, उल्टे बीपीएफ के मंत्रियों को ऐसा करने की स्थिति में सरकार से अलग होना पड़ता, जो बीपीएफ के लिए आत्मघाती कदम साबित होता.

सवाल यह उठता है कि भाजपा ने मंत्रिमंडल की बैठक में लिए गए निर्णय को बदलते हुए बीटीसी में राज्यपाल का शासन क्यों बहाल कर दिया. इसे समझने के लिए बीते कुछ महीनों में बोडोलैंड में घटित राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालने की जरूरत है. उल्लेखनीय है कि फरवरी महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत में बीटीसी मुख्यालय कोकराझाड़ में बृहत आयोजन किया गया था. जिसमें, पांच लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया था. केंद्र और राज्य सरकार के पहल की वजह से पूरे असम में लंबे समय तक आतंक का पर्याय रहे नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के सभी गुट हथियार डालकर देश की मुख्यधारा में लौट चुके हैं.  शांति समझौता पर हस्ताक्षर किया गया था, जिसमें पृथक बोड़ो राज्य की मांग को लेकर लंबे समय से संघर्षरत ऑल बोड़ो स्टूडेंट्स यूनियन के नेता भी पृथक राज्य की मांग छोड़कर राज्य की राजनीति में शामिल हो गए थे. ऐसे में निश्चित ही इन सभी की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं. जो इस चुनाव के दौरान पूरा होना था. यदि सरकार बीपीएफ के दबाव में आकर बीटीसी प्रशासन की बागडोर कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी राज्यपाल के हाथ में नहीं देती तो इससे अन्य गुटों में असंतोष बढ़ सकता था.

यह असंतोष न सिर्फ बोड़ो शांति समझौते को प्रभावित कर सकता था, बल्कि इससे क्षेत्र में शांति की प्रक्रिया भंग हो सकती थी. क्योंकि, अन्य सभी गुटों का आरोप रहा है कि हग्रामा महिलारी के कार्यकाल में बोडोलैंड में लूट-खसोट मची है और बीटीसी का प्रशासन उनके हाथों में रहते हुए बीटीसी का निर्वाचन साफ-सुथरे तरीके से नहीं हो सकता. ऐसे में भाजपा ने झुकने के बदले कड़े फैसले लेना ही श्रेयस्कर समझा और मंत्रिमंडल द्वारा निर्णय लिए जाने के बावजूद बोडोलैंड में राज्यपाल का शासन लागू कर दिया. इसमें कोई शक नहीं कि बीपीएफ का भी क्षेत्र में अपना एक बड़ा जनाधार है, जहां हग्रामा महिलारी की अच्छी-खासी लोकप्रियता भी है. लेकिन, भाजपा ने ऐसे मौके पर सभी गुटों को संतुष्ट करना ही उचित समझा. अब देखना यह है कि आनेवाले समय में बीटीसी की राजनीति क्या रुख अख्तियार करती है.

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