चुनौतियों से जूझते यूपी-बिहार

कोविड-19 की वजह से जारी लॉकडाउन के बीच भारी संख्या में बिहार-उत्तर प्रदेश में प्रवासी मजदूर लौटे हैं. इन मजदूरों के गृहराज्य लौटने के बाद उन्हें किस प्रकार क्वारंटिन किया जा रहा है या अन्य व्यवस्थाएं किस प्रकार संचालित की जा रही है, इसकी पड़ताल करती 8 अप्रैल, 2020 को इंडियास्पेंड ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की. पढ़े यह रिपोर्ट...

| सौरभ शर्मा एवं उमेश कुमार राय

गंभीर समचार 16 May 2020

गणेश प्रसाद (40) उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के रहने वाले हैं. गणेश दिल्ली के रोहिणी में पिछले 10 साल से जुराबें बनाने का काम करते हैं. वह रोहिणी से 25 मार्च को पैदल निकले थे और चार दिन लगातार चलने के बाद 29 मार्च को लखनऊ पहुंचे.

कोरोनावायरस के मद्देनज़र देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से देश की राजधानी दिल्ली और दूसरे महानगरों से हज़ारों की संख्या में प्रवासी मज़़दूर अपने-अपने गांवों की ओर निकल पड़े. जिसे कोई सवारी नहीं मिली वो पैदल ही चल पड़ा.

भले ही दिल्ली से वापस अपने गांवों की तरफ़ पलायन करने वाले लोगों की संख्या का सही-सही पता नहीं हो लेकिन इनमें से 17 लोग ऐसे थे जिन्होंने अपने घर पहुंचने के प्रयास में बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया, द वायर की 30 मार्च 2020 की रिपोर्ट ने बताया.

गणेश बताते हैं कि लखनऊ पहुंचने के लिए उन्हें काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा. लखनऊ पहुंचने पर उन्हें गोरखपुर की बस पकड़ने से पहले ही पुलिस ने एक बस में बैठाकर उन्हें क्वारंटाइन सेंटर भेज दिया.

“उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश है कि बाहर से आने वाले सभी मज़दूरों को 14 दिन के लिए क्वारंटाइन में रखा जाएगा उसके बाद ही वह अपने घर जा पाएंगे,” गणेश को बस में बैठाने वाले सब-इंस्पेक्टर शिव प्रसाद, जो गोमती नगर की पुलिस आउट पोस्ट पर तैनात हैं, बताते हैं.

 गणेश की ही तरह ऐसे लाखों लोग हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार से अपने घरों को छोड़ कर दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में आजीविका कमाने गए थे लेकिन अब इस महामारी के डर के बीच या तो अपने गांव लौट गए हैं या फिर लौटना चाहते हैं.

देश भर में कुल 45.6 करोड़ प्रवासी हैं, इसी साल 11 फ़रवरी को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा. इनमें उत्तर प्रदेश के 5.6 करोड़ (12.3%) और बिहार के 2.7 करोड़ (5.9%) दूसरे राज्यों में रहते हैं.

दिल्ली से निकलकर उत्तर प्रदेश और बिहार के अपने गांवों में पहुंचने वाले प्रवासी मज़दूरों की संख्या की कोई ठीक-ठीक जानकारी तो नहीं है मगर दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर 27 और 28 मार्च को जमा हुई भीड़ को पैमाना माना जाए तो यह संख्या एक लाख से ज़्यादा हो सकती है.

क्या उत्तर प्रदेश और बिहार इतनी बड़ी संख्या में बाहर से आने वाले लोगों की सही देखभाल और क्वारंटाइन की सुविधाएं दे पा रहे हैं ये एक बड़ा सवाल है. चूंकि दिल्ली से बिहार का रास्ता भी उत्तर प्रदेश से होकर ही जाता है इसलिए यह समस्या उत्तर प्रदेश में ज़्यादा है.

 “यूपी सरकार ने इस बीमारी को रोकने के लिए सभी ग्राम प्रधानों को पहले ही टेलीफ़ोन पर आदेश दे दिया था कि बाहर से आने वाले सभी लोगों की सूचना पुलिस को दी जाए और उन्हें तुरंत क्वारंटाइन में रखा जाए और उनकी जांच हो,” उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुख्य सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने बताया.

बाहर से आए सभी मज़दूरों को अब हर ज़िले में बने सरकारी स्कूल और अन्य जगहों पर क्वारंटाइन में रखकर जांच की जा रही है, मृत्युंजय ने आगे बताया.

उत्तर प्रदेश के सरकारी नुमाइंदे वही बात करते हुए दिखाई देते हैं जो की प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 21 मार्च को की थी. नई क्वारंटाइन सुविधाओं के नाम पर वह नए सेंटर्स की जानकारी देते हैं लेकिन वहां की मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में कोई बात नहीं करते .

“जांच में लगी टीमों ने इन मज़दूरों की थर्मल स्क्रीनिंग करने के बाद उन्हें सेनेटाइज़ किया, उसके बाद इन्हें 14 दिन के लिए क्वारंटाइन में भेजा गया और अगर इनमें कोरोनावायरस के कोई लक्षण नहीं दिखे तो इन्हें घर जाने की इजाज़त होगी,” लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी नरेन्द्र अग्रवाल बताया.

ज़मीनी हक़ीक़त का पता लगाने के लिए जब हमने बाराबंकी ज़िले के जैदपुर गांव में जाकर पड़ताल की तो पाया कि वहां क्वारंटाइन के नाम पर सरकारी स्कूलों में केवल बिस्तर लगवा दिए गए हैं. आगे क्या करना है इसके बारे में ग्राम प्रधान को कोई निर्देश नहीं मिला है.

नाम ना छापने की शर्त पर एक अन्य ग्राम प्रधान ने बताया कि सरकार ने निर्देश तो दे दिया है कि बाहर से आने वाले लोगों को गांव के बाहर रखा जाए लेकिन अभी तक इस बात की कोई सूचना नहीं दी गई है कि इन मज़दूरों के खाने-पीने का इंतज़ाम कहां से होगा.

“अगर नियमों को देखें तो हम मिड-डे मील का पैसा इस्तेमाल नहीं कर सकते लेकिन बाहर से आए लोग इतने ग़रीब हैं कि इनके लिए एक वक़्त के भोजन का इंतज़ाम भी मुश्किल है और हम इन्हें भूखा नहीं देख सकते. हमने अपने पैसों से कुछ राशन की व्यवस्था कर दी है और इन्हें खाना दे रहे हैं,” बाराबंकी की एक ग्राम सभा के प्रधान ने बताया.

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में बाहर से आए मज़दूरों को एक जगह इकट्ठा कर सेनेटाइज़ करने एक वीडियो काफ़ी वायरल हुआ और मामले ने काफी तूल पकड़ा. बाद में ज़िलाधिकारी नितीश कुमार ने अपने ट्विटर हैंडल के माध्यम से एक बयान जारी किया.

इस वीडियो की पड़ताल की गई, प्रभावित लोगों का सीएमओ के निर्देशन में उपचार किया जा रहा है. बरेली नगर निगम और फ़ायर ब्रिगेड की टीम को बसों को सेनेटाइज़ करने के निर्देश थे, पर अति सक्रियता के चलते उन्होंने ऐसा कर दिया. संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं. हालांकि मास सेनेटाइज़ेशन का यह तरीक़ा दुनिया के कई देशों में अपनाया जा रहा है. इसे करते वक्त और सावधानी बरती जानी चाहिए थी और सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए था जिससे लोगों को परेशानी महसूस नहीं होती," ज़िलाधिकारी ने कहा.

“स्वास्थ्य विभाग ने कोरोनावायरस की रोकथाम के लिए हर ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को निर्देश दिया है कि बाहर से आने वाले हर एक व्यक्ति की जांच सुनिश्चित करें और संदेह होने पर तुरंत व्यक्ति को क्वारंटाइन कर इलाज शुरू करें.,” उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव अमित मोहन प्रसाद ने टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत में इंडियास्पेंड को बताया.

“सरकार के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है और प्रदेश के हर एक ज़िले में आइसोलेशन वार्ड बना कर तैयार किये जा चुके है,” मोहन ने आगे बताया.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के रतसर कला गांव की प्रधान स्मृति सिंह बताती हैं कि नियमों की वजह से उन्होंने ग्राम पंचायत की सरकारी निधि की बजाय अपने निजी बैंक खाते से दस हज़ार रुपए की रक़म प्राथमिक/सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर आवश्यक सेवाओं के लिए दी है.

“हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल में क्वारंटाइन के लिए 20 बेड बनवाए गए हैं जिसमें सेनेटाइज़र समेत ज़रूरत की सभी चीज़ें रखी गई हैं. यहां क़रीब 20 लोग बाहर से आए थे जिन्हें अभी क्वारंटाइन किया गया है और उन्हें हर सुविधा दी जा रही है,” स्मृति ने बताया.

 बिहार में 10 मार्च से 23 मार्च के बीच विदेश से लौटे व्यक्तियों की जांच होनी अभी बाकी है, लेकिन इसी बीच हज़ारों की संख्या में प्रवासी मज़़दूर बसों में भरकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश से बिहार के अपने गांवों को लौट चुके हैं.

बिहार सरकार ने पहले तो इन मज़दूरों को वापस भेजने को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर की, लेकिन बाद में बेमन से उनकी वापसी को तैयार हो गए.

बिहार की सीमा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश से मिलती है. बिहार के 6 ज़िले पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, बक्सर, सारण और कैमूर उत्तर प्रदेश से लगे हुए हैं. इनमें से पांच ज़़िलों--गोपालगंज, सीवान, सारण, कैमूर और बक्सर--की सीमा पर बिहार सरकार ने रिलीफ़ कैंप बनाए. इन कैंपों में दूसरे राज्यों से आने वाले मज़दूरों की जांच की गई. इसके अलावा हर एक चेक पोस्ट पर जांच के लिए डॉक्टरों की टीम तैनात थी.

“24 घंटों में 50 हज़ार से ज़्यादा लोग बिहार आए. इन सभी की स्क्रीनिंग की गई. दूसरे राज्यों से आने वाले किसी भी व्यक्ति को बिना स्क्रीनिंग के नहीं जाने दिया जाएगा,” बिहार के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार ने 30 मार्च को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बताया.

 “स्क्रीनिंग के तहत केवल इन्फ़्रारेड थर्मोमीटर सेंसर से जांच की जा रही है. चूंकि भारी संख्या में लोग आए, तो लोगों की लंबी कतारें भी लगी,” कैमूर जिले के एक पत्रकार मैनुद्दीन ने बताया.

बिहार सरकार ने पहले तय किया था कि दूसरे राज्यों से लौटने वाले सभी कामगारों को सीमा के आसपास बने आइसोलेशन सेंटर्स में 14 दिन तक रखा जाएगा और इसके बाद उन्हें उनके घर जाने के लिए छोड़ दिया जाएगा. लेकिन, वहां ठहरे कामगारों ने भोजन, पानी व अन्य सुविधाओं की किल्लत का हवाला देते हुए छोड़ने की मांग की थी.

आइसोलेशन सेंटर में रखे गए कामगारों ने धमकी भी दी थी कि अगर उन्हें नहीं छोड़ गया, तो वे आत्महत्या कर लेंगे. इस धमकी के बाद बिहार सरकार ने स्क्रीनिंग कर उन्हें उनके गृह ज़िले में भेजने का फ़ैसला लिया, हिन्दुस्तान टाइम्स की 29 मार्च 2020 की इस रिपोर्ट के कहा.

दिल्ली-यूपी से बिहार आने का एक अहम रास्ता एनएच-2 है. सड़क कैमूर ज़िले के दुर्गावती से बिहार में प्रवेश करती है. 29 मार्च तक इस रास्ते से 3,000 कामगार आ चुके थे.

 “यहां 11 कैंप बनाए गए थे. इनमें खाने-पीने और रहने की सुविधा दी गई. इनकी क्षमता 3 हज़ार लोगों को रखने की है. जो यात्री क्वारंटाइन पीरियड यहां के कैंप में बिताना चाहते हैं, उन्हें यहां रखा गया है और जो अपने गृह ज़िले में जाना चाहते थे, उन्हें बसों के ज़रिए भेजा जा गया. इसके लिए हमने पर्याप्त बसों की व्यवस्था की,” कैमूर के एसपी मो. दिलनवाज़ अहमद ने 30 मार्च 2020 को इंडियास्पेंड को बताया.

उत्तर प्रदेश से बक्सर की सीमा भी लगती है. “यहां जो भी कामगार आए, उनकी शुरुआती जांच कर उन्हें उनके ब्लॉक में भेज दिया गया और इसकी सूचना ब्लॉक के अधिकारियों की दे दी गई, ताकि वे उन कामगारों की दोबारा जांच कर उन्हें 14 दिन के लिए क्वारंटाइन कर सकें,” बक्सर की सिविल सर्जन डॉ ऊषा किरण वर्मा ने हमें बताया.

गोपालगंज की सीमा पर 9 क्वारंटाइन सेंटर बनाए गए. “आने वाले यात्रियों की पहले जांच की जा रही है और फिर ज़रूरत के हिसाब से उन्हें या तो क्वारंटाइन सेंटर या उनके अपने ज़़िलों में भेजा गया है,” गोपालगंज के सिविल सर्जन डॉ नंद किशोर प्रसाद ने इंडियास्पेंड को बताया.

हालांकि, क्वारंटाइन सेंटर उन्हीं जगहों पर बनाए गए हैं, जहां कामगारों की आमद ज़्यादा है. जहां से कम संख्या में लोग आए, वहां चेक-पोस्ट पर ही स्क्रीनिंग कर उन्हें उनके गृह ज़िले में भेजा गया है. लेकिन, यह ज़रूर है कि ऐसे सभी प्वाइंट्स पर राज्य सरकार ने स्वास्थ्य कर्मियों और पुलिस की तैनाती की.

मसलन, गोपालगंज के हथुआ से होकर बहुत कम लोग आते हैं, लेकिन वहां भी मेडिकल की टीम तैनात थी. "दिन में इस रूट से 67 लोग आए, लेकिन मेडिकल टीम ने उनकी भी स्क्रीनिंग की. इसके बाद उन्हें उनके घर भेजा गया और इसकी सूचना संबंधित ब्लॉक के अधिकारियों को भी दी गई," हथुआ के एसडीओ अनिल कुमार रमण ने बताया.

हज़ारों प्रवासी मज़दूरों के अपने गांवों को लौट जाने के बावजूद अभी भी महानगरों में लाखों प्रवासी मज़दूर फंसे हुए हैं. लॉकडाउन से आमदनी बंद होेने से इनके सामने आजीविका का बड़ा संकट पैदा हो गया है. इस समस्या से निपटने के लिए प्रवासी मज़दूरों के लिए देश भर में 27,661 राहत शिविर और आश्रय गृह बनाए गए हैं जिनमें 12.5 लाख लोग रह रहे हैं. इनमें 75 लाख लोगों के खाने का इंतज़ाम किया गया है, 5 अप्रैल को गृह मंत्रालय के हवाले से पीआईबी की एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया.

इस दौरान बिहार में एक अनोखी बात जो सामने आई वह यह कि कोरोनावायरस के संक्रमण के डर से कुछ जगह से ‘गांवबंदी’ की भी ख़बरें आई हैं. लोगों ने अपने गांवों में आने वाली सड़कों को बंद कर दिया है और बाहर से लौटने वाले मज़दूरों को गांवों में प्रवेश नहीं करने दिया. ग्रामीणों के विरोध को देखते हुए सरकार ने गांवों के बाहर स्कूलों को क्वारंटाइन सेंटर बना दिया.

(सौरभ लखनऊ में और उमेश पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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