यूपी के 1.8 बच्चों को नहीं मिल रहा मिड-डे-मील

कोरोना संक्रमण की वजह से जारी लॉकडाउन की वजह से पूरे देश में स्कूल बंद है. इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के स्कूल भी बंद है. आम तौर पर देश में रोजाना 12 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील दी जाती है, लेकिन बीते 13 मार्च से ही यूपी में स्कूल बंद चल रहे है. इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में मिड-डे मील की व्‍यवस्‍था ठप पड़ी है.

| डेस्क

गंभीर समचार 16 May 2020

कोरोना संक्रमण की वजह से जारी लॉकडाउन की वजह से पूरे देश में स्कूल बंद है. इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के स्कूल भी बंद है. आम तौर पर देश में रोजाना 12 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील दी जाती है, लेकिन बीते 13 मार्च से ही यूपी में स्कूल बंद चल रहे है. इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में मिड-डे मील की व्‍यवस्‍था ठप पड़ी है.

लॉकडाउन के बढ़ने के बाद स्कूलों के जल्दी खुलने की संभावना नहीं लग रही है. प्रदेश में कक्षा 1 से 8 तक के छात्रों को बिना परीक्षा के ही अगली कक्षा में  दिया गया है. देखा जाए तो 13 मार्च के बाद से ही अब तक बच्चों को मीड-डे मील नहीं मिला है.

उत्तर प्रदेश के 114,460 प्राथमिक विद्यालयों और 54,372 उच्च प्राथमिक विद्यालयों में मिड-डे मील योजना चल रही है. इन विद्यालयों में प्राथमिक स्तर पर 1.23 करोड़ और उच्च प्राथमिक स्तर पर 57.05 लाख छात्र हैं. यानी इन स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 1.80 करोड़ बच्चे मिड-डे मील का लाभ लेते हैं, उत्तर प्रदेश मिड-डे मील प्राधिकरण की वेबसाइट यूपीएमडीएम के के आंकड़ों में कहा गया है. इन 1.80 करोड़ छात्रों में से औसतन 86.81 लाख (49%) रोज़ाना मिड-डे मील खाते हैं.  यूपी मिड-डे मील प्राधिकरण के उप-निदेशक उदय भान का कहना है कि जब स्कूल खुलेंगे तो फिर से मिड-डे मील बनना शुरू हो जाएगा.

मिड-डे मील योजना, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर चलाती हैं. यह योजना 15 अगस्त, 1995 को शुरू हुई थी. पहले इस योजना का लाभ प्राथमिक विद्यालयों (कक्षा 1 से 5 तक) में पढ़ने वाले उन बच्चों को मिलता था जिनकी उपस्थिति 80% होती थी. शुरुआत में हर महीने तीन किलो गेहूं या चावल दिए जाने की व्यवस्था थी, लेकिन परिवारों को मिलने वाले इस अनाज का पूरा लाभ बच्चों को नहीं मिलता था. ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि प्राथमिक विद्यालयों में पका हुआ भोजन उपलब्ध‍ कराया जाए. इस आदेश के बाद एक सितम्बर 2004 से प्राथमिक विद्यालयों में ही मिड-डे मील बनने लगा. बाद में इस योजना का दायरा बढ़ाकर उच्च प्राथमिक विद्यालयों को भी इसमें शामिल कर लिया गया.

“मिड-डे मील से बच्चों को करीब 30 से 40% कैलोरी मिल जाती है, बाकी का पोषण उसे घर के खाने से मिलता है. अब जबकि ग़रीब तबके के पास काम नहीं है, उनकी ख़रीदने की क्षमता नहीं है, खाने की कमी है, ऐसे में बच्चों के लिए यह 30 से 40% का पोषण बहुत ज़रूरी हो जाता है. बहुत से ग़रीब परिवारों के बच्चों के लिए मिड-डे मील उनके खाने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया है,” कोरोनावायरस से पहले ही देश में 5 साल से कम उम्र के करीब 38% बच्चे कुपोषित हैं. इस स्थिति को देखते हुए लगता है कि बच्चों को मिड-डे मील न मिलने से आने वाले वक्त में कुपोषण के मामले और बढ़ेंगें.”

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