लॉकडाउनः चित मोदी की, पट राज्यों की

कोरोन वायरस संकट से निपटने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन पहली बार हो या फिर दूसरी बार, इसकी घोषणा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्र के सामने आएं, लेकिन तीसरी बार जनता से इसे लेकर रू-ब-रू होना उन्होंने जरूरी नहीं समझा. दरअसल, वह जानते हैं कि लॉकडाउन बढ़ाना हो या उसमें ढील देना, दोनों ही फैसले ऐसे हैं, कि इससे उन्हें कोई खास राजनीतिक लाभ तो नहीं है, लेकिन हां, इसका श्रेय वह जरूर लेना चाहते हैं.

| डेस्क

गंभीर समचार 16 May 2020

कोरोन वायरस संकट से निपटने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन पहली बार हो या फिर दूसरी बार, इसकी घोषणा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्र के सामने आएं, लेकिन तीसरी बार जनता से इसे लेकर रू-ब-रू होना उन्होंने जरूरी नहीं समझा. दरअसल, वह जानते हैं कि लॉकडाउन बढ़ाना हो या उसमें ढील देना, दोनों ही फैसले ऐसे हैं, कि इससे उन्हें कोई खास राजनीतिक लाभ तो नहीं है, लेकिन हां, इसका श्रेय वह जरूर लेना चाहते हैं. हालांकि 24 मार्च से लेकर अब तक लॉकडाउन की अवधि बढाये जाने या फिर नई रियायतें देने के साथ  सरकारी अधिसूचनाओं, आदेशों और दिशा-निर्देशों के रूप में. केंद्र और राज्य सरकारों के निर्देशों को मिलाकर देखें तो आखिरी गिनती तक तकरीबन 3,940 निर्देश आ चुके थे.

तो, अब फैसला राज्यों पर छोड़ दिया गया है कि वे तय करें कि चरणबद्ध तरीके में लॉकडाउन को कब और कहां हटाना है. आप इसे भारत की संघीय व्यवस्था में मोदी के भरोसे के रूप में देखें या उनके निर्विवाद राजनीतिक बुद्धिमता के तौर पर.

मोदी जैसा स्मार्ट राजनेता सबसे बड़े स्वास्थ्य और आर्थिक संकट के दौरान अपनी लोकप्रियता में आए शुरुआती उछाल को खोना नहीं चाहेगा. लेकिन उनके लिए उससे भी अधिक अक्लमंदी है ये जानना कि मंच से दूर हटने, का सही अवसर कौन-सा है.

यदि प्रधानमंत्री मोदी बहुत लंबे समय तक राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की अगुआई करते दिखते हैं, तो उन्हें पता है कि उन्हें मिले श्रेय की चमक लॉकडाउन के कार्यान्वयन, संक्रमण के परीक्षण, अस्पताल में उपलब्ध बेड की संख्या, बीमारी का कर्व सपाट करने, आर्थिक क्षति, भूख और बेरोजगारी आदि के बारे में असुविधाजनक सवालों के साथ धीरे-धीरे मंद पड़ने लगेगी.

केंद्र सरकार ने ‘ज़ोनों के क्रम बदलने का दायित्व राज्यों पर छोड़ा. है. सेक्टरों और रंगों वाले ज़ोनों के आधार पर पाबंदियों की चरणबद्ध समाप्ति का रोडमैप बनाने का दायित्व अब राज्यों पर आ गया है. ऐसा नहीं है कि ये विशुद्ध रूप से राजनीतिक निर्णय हैं. लेकिन इन फैसलों का परिणाम स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में दिखेगा, इसलिए उनकी राजनीतिक कीमत भी होगी और अहर्निश राजनीति में डूबा मोदी जैसा घाघ नेता इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकता.

लोकप्रियता संबंधी सर्वेक्षणों में मोदी अभी भी ऊपर चल रहे हैं, महामारी के दौर में भी जिसके बारे में ट्वीट करने से गृह मंत्री अमित शाह खुद को रोक नहीं पाए.

अमेरिका में, डोनल्ड ट्रंप भी इन राजनीतिक जोखिमों को लेकर पसोपेश में हैं. अंतर केवल इतना है वह मोदी से कम सतर्कता बरत रहे हैं. अमेरिका को दोबारा खोलने के लिए अधीरता बढ़ रही है. जल्दबाजी में लॉकडाउन उठाना भी कम जोखिम भरा नहीं है. अनलॉकिंग प्रक्रिया का सही निर्धारण महत्वपूर्ण है. अगर आपकी टाइमिंग और क्रम ठीक नहीं बैठा, तो फिर आप राजनीति परेशानियों के लिए तैयार रहें.

अप्रैल के अंतिम सप्ताह में फ्रांस में हुए एक सर्वे में पता चला कि सख्त लॉकडाउन का समर्थन पहली बार घटकर 50 प्रतिशत से नीचे आ गया है.

अधिकांश अमेरिकी लॉकडाउन जारी रखने का समर्थन करते हैं और वे आमतौर पर इसका विरोध करने वालों के साथ नहीं हैं. हाल के दिनों में इंटरनेट पर सक्रिय कुछ सामाजिक समूहों, जिनमें बंदूक रखने के अधिकार के हिमायती और टीकों का विरोध करने वाले शामिल हैं, ने अमेरिका के पसंदीदा विषय आजादी के नाम पर लॉकडाउन का विरोध करना शुरू किया है. कैलिफोर्निया में, लॉकडाउन हटाया जाए या नहीं, इस बात पर मेयरों और गवर्नर के बीच खुला टकराव हो रहा है.

यदि मोदी लॉकडाउन की शेष अवधि और पाबंदियों में फेरबदल संबंधी निर्णय मुख्यमंत्रियों पर छोड़ देते हैं, तो वह एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरकर सामने आएंगे जिसने समय रहते फैसले किए, स्थिति को काबू में किया और फिर, सच्ची संघीय भावना से, आगे के फैसले बाकियों पर छोड़ दिया.

लॉकडाउन संबंधी शुरुआती भाषण के बाद, मोदी आगे की घोषणाओं में अधिक संघीय और सलाहकारी नज़र आए.

जोखिमों को आगे बांटना, संकट से बाहर निकलने की उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है. निश्चित रूप से मोदी समर्थक इस बात को उछालेंगे कि उनके आलोचकों को दोनों ही स्थितियों से समस्या होती है, जब फैसले केंद्रीय स्तर पर लिए जाते हों और जब वह इसे राज्यों पर छोड़ते हों. लेकिन यहां बात टाइमिंग की है. भारत को फिर से खोलने का निर्णय राजनीतिक जोखिमों से भरा हुआ है और इसलिए यह साझा निर्णय बन जाता है.

क्या मुख्यमंत्रियों के लिए सभी प्रतिबंधों को हटाना संभव होगा या वे अतिरिक्त सतर्कता बरतेंगे? जिस अधीरता के साथ वे प्रवासी श्रमिकों को अपनी सीमाओं से बाहर करना चाहते हैं (अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे, के. चंद्रशेखर राव) और आवागमन रोकने के लिए जिस तरह सड़कों पर गड्ढे बनाए जा रहे हैं (मनोहरलाल खट्टर), उससे यही संकेत मिलता है कि वे सावधानी बरतेंगे और लॉकडाउन हटाने की जल्दी नहीं करेंगे. खासकर जब लौट रहे प्रवासी पॉजिटिव पाए जा रहे रहे हों और कई राज्यों में ग्रीन ज़ोन कम हो रहे हों.

मोदी सरकार ने भले ही लॉकडाउन को आसान बनाने के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए हों. लेकिन उसका क्रियान्वयन राज्यों में रंगों वाले ज़ोनों और मुख्यमंत्रियों के सतर्क फैसलों पर निर्भर करेगा. हालांकि राज्य इस संबंध में अपना हाथ बंधा हुआ पा सकते हैं.

यदि मौजूदा व्यवस्था काम करती है तो मोदी उसका श्रेय ले सकते हैं, यदि ऐसा नहीं हुआ तो दोष राज्यों और मुख्यमंत्रियों पर मढ़ा जाएगा.

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