महुआः समृद्धि की लौ

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में भोर होते ही अधिकांश ग्रामीण आदिवासी परिवार की महिलाएं जंगल, देहात, गांव के नजदीक ‘‘महुआ’’ पेड़ के नीचे फूल चुनते देखी जा सकती है. जिले में पायी जाने वाली प्रमुख वनोपजों में महुआ भी प्रमुख है. पतझड़ का मौसम शुरू होने के साथ ही महुआ के पेड़ों में फूल आने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

| प्रज्ञा प्रतीक्षा तिवारी

गंभीर समचार 04 May 2020

. महुआ की मदमादी सुगंध, भला किसे ना मदहोश कर दे. भोर की लालिमा और मंद-मंद बसंती बयार के बीच इसकी मदहोश करने वाली सुगंध प्रकृति प्रेमी के लिए यह अविस्मरणीय क्षण होता है लेकिन जहां पेट की आग धधक रही हो वहां यह सौंदर्य गौण हो जाता है. छत्तीसगढ़ के जंगलों, गांवो में अनगिनत महुआ के पेड़ है और गांव वालों तथा आदिवासी परिवारों के आय का यह एक प्रमुख जरिया है.

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में भोर होते ही अधिकांश ग्रामीण आदिवासी परिवार की महिलाएं जंगल, देहात, गांव के नजदीक ‘‘महुआ’’ पेड़ के नीचे फूल चुनते देखी जा सकती है. जिले में पायी जाने वाली प्रमुख वनोपजों में महुआ भी प्रमुख है. पतझड़ का मौसम शुरू होने के साथ ही महुआ के पेड़ों में फूल आने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. जिले में ज्यादातर ग्रामीणजन खेती-किसानी के बाद खाली है. ऐसे में ग्रामीण आदिवासी परिवार के लोग जिसमें ज्यादातर महिला भोर होते ही महुआ पेड़ तले पहुंच जाती है. महुआ फूल गिरने की शुरूआत हो चुकी है. महुआ के फूल मार्च-अप्रैल में आना शुरू हो जाते है. मई-जून में महुआ में फल आने लगता है. पेड़ के पत्ते, छाल, फूल, बीच की गिरी सभी औषधीय रूप में उपयोगी की जाती है. दूरस्थ अंचल में रहने वाले ग्रामीण परिवार विशेषकर आदिवासी परिवार की आय का मुख्य जरिया वनोपज है, इसमें महुआ का स्थान भी महत्वपूर्ण है. संभाग में भारत सरकार द्वारा जिन सात वनोंपजों, चिन्हांकित है, जिसमें साल बीज, हर्रा, इमली, महुआ बीज, चिरौजी, गुठली, कुसमी लाख और रंगीन लाख शामिल है.

छत्तीसगढ़ के किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में जाएँ अथवा नगरीय सीमा के बाहर किसी भी सड़क पर निकल जाएं महुआ का वृक्ष आपको हर तरफ मिल ही जायेगा. यदि आप यहाँ फरवरी से मई माह के बीच गए हैं तो हर तरफ आपको एक विशेष गंध का आभास होगा, जो महुआ वृक्ष के फूलों की महक के कारण चारों ओर फैलती है. इस समय प्रत्येक गांव में भोर के समय में महिलाओं और बच्चों को केवल एक ही काम होता है, महुआ वृक्षों से झड़े हुए फूलों को चुनना. वे धूप में गर्मी बढ़ने से पहले ही फूलों को चुन लेने चाहते हैं. जगह जगह महुआ फूलों के ढेर और उनसे भरी बांस की टोकरियां नजर आती हैं. झोपड़ियों के छप्परों और आंगनों में लोग महुआ फूलों को सूखने के लिए रखते हैं. प्रत्येक ग्रामीण परिवार इस समय अधिक से अधिक महुआ फूल एकत्रित कर लेना चाहता है ताकि वह उसे बाद में अनेक प्रकार से उपयोग में ला सके.

महुआ एक भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों समेत जंगलों में बड़े पैमाने पर पाया जाता है. इसका वैज्ञानिक नाम मधुका लोंगफोलिया है. यह तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है. जो लगभग 20 मीटर ऊंचाई तक बढ़ सकता है. इसके पत्ते आमतौर पर पूरे साल भर हरे-भरे रहते है. इस वृक्ष की खासियत है कि यह शुष्क पर्यावरण के अनुकूल अपने आप को ढाल लेता है. छत्तीसगढ़ के अधिकांश इलाकांे में यह पाया जाता है. बस्तर संभाग में यह बहुत तादात में पाया जाता है.

महुआ छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार है. यह न केवल दैनिक जीवन में भोजन और पेय के लिए उपयोग में लाया जाता है बल्कि इसे बेचकर नकद पैसा भी प्राप्त किया जाता है. घर में रखा हुआ महुआ एक संपत्ति के समान होता है जिसे कभी भी नकदी में बदला जा सकता है.

बस्तर में यह एक आम कहावत है कि 'बस्तर के आदिवासी और उनके देवी-देवताओं को समाप्त करना हो तो यहाँ से महुआ का पेड़ समाप्त करदो, वे अपने आप खत्म हो जायेंगे.'

महुआ छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों के लिए इस लोक एवं परलोक दौनों में महत्वपूर्ण है, वह मनुष्य और देवी-देवताओं सभी का प्रिय है. यह मानवों के लिए मदमस्त कर देने वाला पेय और देवों के लिए सर्वश्रेष्ठ अर्पण है. मृत पितरों एवं सोए देवताओं को जाग्रत करने वाला अनुष्ठानिक द्रव्य है. आदिवासी समुदायों के सामाजिक समारोहों का आवश्यक अंग और प्रत्येक हर्षोल्हास के अवसर का साथी है.

बस्तर क्षेत्र के निवासियों के लिये महुआ वृक्ष इतना महत्वपूर्ण होते हुए भी यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि इसका पौध कोई भी रोपता नहीं है, जो पौधे अपने आप उगते हैं उन्हें ही रहने दिया जाता है. इनके उगने में पक्षी मत्वपूर्ण भूमिका निबाहते हैं, वे इसके फल-फूल खाते हैं और उनके बीज इधर-उधर छोड़ देते हैं, वही बीज उगते हैं और महुआ वंश का विस्तार करते हैं. हल्बी बोली में महुआ को महु कहते हैं.

महुआ वृक्ष बस्तर की आदिवासी संस्कृति और उनके आर्थिक जीवन का एक अहम् अंग है. इसके तने की छाल, इसके फूल और फल सभी काम आते हैं. जिसके पास दस महुआ वृक्ष हों उसे गांव में संपन्न व्यक्ति माना जाता है. एक महुआ वृक्ष साल भर में दो से पांच क्विण्टल फूल और पचास-साठ किलो फल देता है. इसके तने की छाल का उपयोग पेट सम्बन्धी बीमारियों में औषधि के रूप में किया जाता है. इसकी छाल को रात भर पानी में भिगोकर रखा जाता है और सुबह उस पानी को रोगी को पिलाया जाता है. महुआ का फल टोरी कहलता है ,इसके अंदर से निकलने वाले बीज को सुखाकर उससे तेल निकाला जाता है. महुआ बीज का तेल, ठंडक पाकर नारियल के तेल के समान जम जाता है. इसे खाने के काम में लिया जाता है, सब्जी-भाजी छोंकने में इसे प्रयोग किया जाता है. यह तेल त्वचा के लिए उत्तम माना जाता है, ठण्ड के मौसम में त्वचा को फटने से बचाने के लिए इसे शरीर पर लगाया जाता है. पहले मुरिया-माड़िआ आदिवासी सरई और खुरसा के साथ महुआ फूल की सब्जी बनकर भी खाते थे.

महुआ का वृक्ष वर्ष में एक बार फूलता है, फूल फरवरी माह से जून माह तक झड़ते हैं. अलग-अलग वृक्षों में आगे-पीछे फूल आते हैं. इसके फूल बीनकर जमा कर लिए जाते हैं और उन्हें सुखाकर उनसे मंद  बनाई जाती है. पहले फूलों से बनाई गयी मंद, सर्वप्रथम घर के देवी-दवताओं को अर्पित की जायेगी उसके बाद लोग उसका पीना आरम्भ करते हैं. बस्तर में देव-धामी में महुआ मंद सर्वोपरि है, इसे अर्पित किये बिना किसी भी देवी-देवता को प्रसन्न करना संभव नहीं है.

विवाह मंडप में महुआ डार गाढ़ना एक आवश्यक रिवाज है, इसको स्थापित किये बिना विवाह संपन्न नहीं हो सकता.

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में महुआ से शराब बनाना एक साधारण कार्य है. सामान्यतः अधिकांश लोग अपने लिए और कुछ लोग बेचने के लिए देशी तरीके से शराब घर ही में बना लेते हैं. यहाँ के कुम्हार इस कार्य हेतु एक विशेष प्रकार की मिट्टी की हांड़ी बनाते हैं. यहाँ के लगभग प्रत्येक साप्ताहिक हाट बाजार में यह हंडियां बिकती हैं. प्रत्येक हाट बाजार में नशीले पेय बेचने हेतु एक अलग खंड होता है, जहाँ स्त्रियां महुआ, सल्फी, लांदा आदि लिए बैठी रहती हैं.

गर्म इलाकों में इसकी खेती तेलीय बीजों, फूलों, और लकड़ी के लिए की जाती है. कच्चे फलों की सब्जी भी बनाई जाती है. पके हुए फलों का गूदा खाने में मीठा होता है. वृक्षों की आयु के अनुसार साल में 20 से 200 किलो के बीच बीजों का उत्पादन किया जा सकता है. छत्त्तीसगढ़ में इसका ज्यादातर उपयोग शराब के उत्पादन में किया जाता है. कई भागों में पेड़ औषधीय गुणों के लिए उपयोग किया जाता है. इसकी छाल को औषधीय प्रयोजनों के लिए भी प्रयोग किया जाता है. कई आदिवासी समुदायों में इसकी उपयोगिता की वजह से इसे पवित्र माना जाता है. महुआ वृक्ष के फल, फूल, बीज, लकड़ी सभी चीजें काम में आती है. इसका पेड़ 20-25 साल में फल-फूलने लगता है, और सैकड़ों सालों तक फलता-फूलता रहता है.

 

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