नाच लौंडा नाच

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का वह क्षेत्र जिसे भोजपुरिया पट्टी के रूप में जाना जाता है. इस क्षेत्र की एक लोकनृत्य विधा ‘लौंडा नाच’ है, जिसे भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर ने एक नया आयाम और पहचान दिलायी थी, यह लोकनृत्य विधा अब तकनीक और उदारीकरण के दौर में दम तोड़ रही है. इस प्रतिकूल माहौल में ‘लौंडा नाच’ को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरीमामयी पहचान दिलाने में लगे युवक राकेश कुमार आजकल सुर्खियों में हैं. राकेश कुमार इसी भोजपुरिया पट्टी के सीवान जिले के संजलपुर गांव के रहने

| श्रीराजेश

गंभीर समचार 04 May 2020

माधुरी दीक्षित की एक फिल्म आई थी- ‘आजा नाचले’. उसके किरदार से अगर आप खुद की तुलना करें तो कहां पाते हैं?

इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक नृत्यशाला स्थापित करने के लिए नायिका को घर-समाज सबसे संघर्ष करना पड़ रहा है. मेरी स्थिति भी लगभग वहीं है. खास कर भोजपुरी पट्टी में ‘लौंडा नाच’ करने वाले को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती बल्कि उन्हें नचनिया कह कर उनका उपहास उड़ाया जाता है और यहीं कारण है कि यह लोककला धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है. कोई कला के नजरिये से इसे नहीं अपनता बल्कि समाज का निचला तबका रोजगार के रूप में इसे करता है औऱ सामाजिक उपेक्षा झेलता है. जबकि यह इस क्षेत्र की विख्यात लोककला है और इसका संरक्षण व संवर्द्धन होना चाहिए.  

आपको लौंडा नाच ने काफी लोकप्रियता दीलौंडा नाच परफार्म करने का आइडिया कैसे आया?

मैं सीवान जिले के एक गांव संजलपुर का रहने वाला हूं. स्वाभाविक तौर पर वहां शादी-ब्याह में, बारात में नाच होता था और लौंडा (स्त्री की भेष-भूषा में नृत्य प्रस्तुत करने वाले पुरुष) नाचते थे. मैं देखने जाता था और उनकी नकल कर नाचता था. स्कूल में गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रा दिवस या फिर सरस्वती पूजा के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे, उसमें मैं भाग लेता था और लड़कियों के रोल करता था. सराहना भी मिलती थी और साथी छात्र मुझे छेड़ते भी थे. लेकिन मेरा मन इसमें लगता था तो मैं करता था. दुर्गापूजा के अवसर पर गांव में ड्रामा होता था, कई गांव के लोग जुटते थे. उसमें भी मैं लड़कियों वाले किरदार निभाता था. जब मैं राष्ट्रीय नाट्य अकादमी में अभिनय की शिक्षा ले रहा था तो वहां प्रति वर्ष रंग महोत्सव का आयोजन होता है और अकादमी के छात्र भी अंतिम दिन ‘अद्वितीय’ कार्यक्रम होता है, उसमें अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं. वहां कहा गया कि छात्र अपने यहां के किसी लोककला को केंद्र में रख कर अपनी प्रस्तुती दे. मेरे ध्यान में ‘लौंडा नाच’ घुमड़ रहा था और मैंने वहां लौंडा नाच की प्रस्तुती दी जिसे काफी सराहा गया. इस तरह इसकी विधिवत शुरुआत हुई.

लौंडा नाच को भोजपुरिया पट्टी में हिकारत की नजर से देखा जाता हैक्या आप मानते हैं कि इस कला को लेकर अब लोगों का नजरिया बदल रहा है?

जी हां, लोगों में कला को लेकर जागरुकता बढ़ी है. लेकिन अब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इसे हिकारत की नजर से देखते हैं लेकिन एनएसडी के प्लेटफार्म से लौंडा नाच की प्रस्तुती ने इसे एक अलग मुकाम दिया है. लोगों की सोच में बदलाव आया है. यही बदलाव इस लोककला को विलुप्त होने से बचा सकता है.

आपके अलावा और कोई भी हैजो इस लोककला के संरक्षण के लिए काम कर रहा है?

अभी तक तो मेरी नजर में ऐसा कोई नहीं है. हां, गांवों में अभी कई लोग है जो लौंडा नाच करते हैं लेकिन वह इसके संरक्षण के लिए नहीं बल्कि रोजगार के लिए पेशे के रूप में करते हैं.   

भोजपुरिया पट्टी के इस लोकनृत्य को आप एक अलग पहचान दिला रहे हैंलेकिन क्या इसके परफार्म करने के लिए कला संगठनों की ओर से आपको आमंत्रण मिलता है या फिर आप अपने स्तर पर ही करते हैं?

जी हां, भोजपुरी कला-संस्कृति के लिए सक्रिय कई संगठन हैं जो मुझे लौंडा नाच के लिए आमंत्रित करते हैं. इसमें आखर नामक एक संस्था है जो प्रति वर्ष ऐसा आयोजन करती है, लेकिन आर्थिक समस्या एक बड़ी दिक्कत है इस वजह से मैं सभी जगह पहुंच नहीं पाता. ये सब संगठन छोटे-छोटे हैं, आने-जाने, रहने इत्यादि का खर्च खुद ही उठाना पड़ता है, जो हमेशा संभव नहीं हो पाता. संस्थाओं के पास भी सीमित फंड होते हैं या फिर होते ही नहीं है तो वे भी हर बार इन खर्च को उठा पाने में सक्षम नहीं होते.

आपने थियेटर में भी काम किया हैफिल्मों में भी कर रहे हैंआप फिल्मों की व्यस्ता के बीच इस नृत्य कला को कितना समय दे पाएंगे?

हमारी विशेषज्ञता अभिनय में हैं और मैं कई फिल्मों और धारावाहिकों में अभिनय कर रहा हूं, लेकिन लौंडा नाच मेरा पेशा नहीं, पैशन है. इसलिए स्वाभाविक है कि मैं इसे ता उम्र करता रहूंगा और लौंडा नाच के संरक्षण के लिए हमेशा अपने स्तर पर प्रयास करता रहूंगा. इसे लेकर मेरी योजना भी है- एक टीम भी मैं बना रहा हूं. कई लोगों ने इसमें रुचि दिखायी है. जिससे कि भविष्य में इस विलुप्त हो रही कला का संवर्द्धन किया जा सके.

जब आपने लौंडा नाच शुरू किया तो परिवार वालों और आपके जानने वालों की क्या प्रतिक्रिया रही?

नहीं, परिवार वालों की ओर से मुझे कोई रोकटोक नहीं झेलना पड़ा. हां गांव में शुरू-शुरू में लोग मजाक उड़ाते थे लेकिन मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया.

जब आपके पिता जी ने पहली बार 500 रुपये का पुरस्कार स्वरूप दिया तो आपको कैसा लगाउस भाव को शब्दों में जरा व्यक्त करें.

मेरे पिता जी एक फौजी है. कड़क स्वभाव के है. गांव में मुझे प्रस्तुती देनी थी. पिताजी के सामने लौंडा नाच की प्रस्तुती देने से मैं डर भी रहा था. हिचक भी थी. लेकिन जब मैंने प्रस्तुती दी तो पिता जी ने गांव वालों के सामने ही बतौर पुरस्कार पांच सौ रुपये दिये. यह मेरे लिए ग्रीन सिग्नल था. हौसला परवान चढ़ाने वाला था. पांच सौ का नोट मैंने लंबे समय तक डायरी के बीच रखे रहा. पिता जी ने कहा भी कि तुम्हें जिस क्षेत्र में करियर बनाना है बनाओ, लेकिन मन लगा कर काम करना. इस शब्द ने मेरा उत्साह बढ़ाया.

आप अपने बारे में बताएंकैसे आपने इस ओर रुख किया?

मीडिल स्कूल तक मेरी पढ़ाई-लिखायी गांव में ही हुई. उस दौरान स्कूल व गांव में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेता था. उसके बाद आगे की पढ़ाई भी चलती रही. राष्ट्रीय नाट्य अकादमी ज्वाइन किया. कत्थक सीखा, मार्शल आर्ट और ताइक्वांडो सीखा. पहले ही बता चुका हूं कि कैसे राष्ट्रीय नाट्य अकादमी के अद्वीतीय कार्यक्रम से लौंडा नाच की नये सिरे से शुरुआत हुई.

अभी कौन-कौन सी फिल्में कर रहे हैं?

जगजीवन मांझी के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘खग्रास’ और नवीन चंद्र गणेश के निर्देशन में ‘लिपिस्टिक मैन’ में काम कर रहा हूं. साथ ही नितिन चंद्रा की फिल्म में भी काम करने के अलावा एंड टीवी पर एक धारावाहिक है ‘शादी के स्यापे’ में हूं.

क्या किसी भोजपुरी फिल्म में भी काम कर रहे हैं?

नहीं, भोजपुरी फिल्म जो आज-कल बन रहे हैं, उसे आप देख ही रहे हैं. परिवार के साथ आप उसे नहीं देख सकते. अश्लीलता भोजपुरी फिल्मों की पहचान से चस्पा हो गई है. अगर कोई साफ-सूथरी फिल्म का ऑफर मिलेगा तो जरूर करूंगा. नितिन चंद्रा लौंडा नाच को लेकर एक फिल्म बनाने की सोच रहे हैं. उनसे इस विषय पर मेरी बात भी हुई है. अगर भविष्य में ऐसा कुछ होता है तो देखा जाएगा.